श्रवणबेलगोला/दक्षिण भारत तपोभूमि प्रणेता श्री प्रज्ञासागरजी मुनि के आशीर्वाद एवं प्रेरणा से उज्जैन के महावीर तपोभूमि ट्रस्ट द्वारा श्रवणबेलगोला में गोम्मटेश्वर श्री बाहुबली स्वामी के महामस्तकाभिषेक का आयोजन व नेतृत्व करने वाले मठाधीश स्वास्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामीजी को युगपुरुष अलंकरण से सम्मानित किया गया। १०० से अधिक साधु आर्यिकाओं के सान्निध्य में मंगलवार को आयोजित इस सम्मान समारोह में सबसे पहले आचार्य श्री वर्धमानसागरजी महाराज के साथ सभी आचार्यो की पादपूजा व पाद प्रक्षालन किया गया । ट्रस्ट के सभी सदस्यों ने चारुकीर्ति भट्टारक स्वामीजी को पग़डी पहनाई तथा अंगवस्त्र, शॉल, रजत श्रीफल, पिच्छी, अभिनंदन पत्र एवं पुष्पहार प्रदान कर सम्मानित किया। भट्टारक पट्टाभिषेक के ४९ वर्ष पूर्ण होने के मौके पर देश भर से आए श्रद्धालुओं ने ४९ थालों में विभिन्न प्रकार की भेंट चारुकीर्तिजी को अर्पण की। समारोह में आचार्य वर्धमानसागरजी, वासूपूज्यसागरजी, सुविधिसागरजी, देवसेनसागरजी, निजानंदसागरजी, पंचकल्याणक सागरजी, तीर्थनंदीसागरजी आदि ने मिलकर सामूहिक रुप से स्वास्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामीजी को युगपुरुष अलंकरण प्रदान किया। मुनिश्री प्रज्ञासागर जी ने चारुकीर्तिजी को ’’युगपुरुष’’ की उपाधि मैडल तथा दैवीय शक्ति का प्रतीक एवं अपनी साधना से अभिमंत्रित दैवीय दंड भी प्रदान किया। अपने सम्मान के मौके पर स्वास्तिश्री चारुकीर्ति भट्टारक स्वामीजी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ये सम्मान मेरा नहीं, बल्कि श्रवणबेलगोला का सम्मान है। उन्होंने कहा कि उज्जैन का श्रवणबेलगोला से पुराना रिश्ता है। २३०० वर्ष पूर्व आचार्य भद्रबाहु स्वामीजी १२००० शिष्यांे के साथ उज्जैन से विहार कर श्रवणबेलगोला आये थे और यहाँ के विंध्यगिरी और चंद्रगिरि पर्वत पर तपस्या की थी और आज उन्हीं की तपस्या से श्रवणबेलगोला पुनीत और पावन हो गया है। भट्टारकजी ने कहा कि आज मुनिश्री प्रज्ञासागर जी महाराज ने एक बार फिर श्रवणबेलगोला का रिश्ता उज्जैन से जो़ड दिया। आज महावीर तपोभूमि तीर्थ द्वारा मेरा सम्मान नहीं, बल्कि श्रवणबेलगोला का सम्मान कर श्रवणबेलगोला का मान ब़ढा दिया है।इस अवसर पर श्री प्रज्ञासागरजी मुनि ने अपने प्रवचन में कहा कि स्वामीजी श्री चारुकीर्ति जी जैसा व्यक्तित्व किसी सम्मान के लिए नहीं, बल्कि सम्मान के साथ युगों तक याद रखने वाला व्यक्तित्व है। यह उनका सम्मान उनके गुणों का सम्मान है । श्रवणबेलगोला का महामस्तकाभिषेक का सफल आयोजन हमें यह सीख देता है आज देश के हर तीर्थों के पास एक-एक भट्टारकजी होना चाहिए, जिससे हमारी जैन संस्कृति जीवित और संरक्षित रह सके। आज यदि दिगम्बर जैन साधु की संस्कृति जीवित और सुरक्षित है तो चारुकीर्ति स्वामी जी जैसे भट्टारकों की वजह से ही है। चारुकीर्ति जी के सान्निध्य में अब तक चार महामस्तकाभिषेक सम्पन्न हुए हैं और सभी ऐतिहासिक रहे और यही मुख्य कारण बना उसे युगपुरुष अलंकरण प्रदान करने का।

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