बेंगलूरु। यहां श्री पार्श्वसुशील धाम सुराणा नगर में नवकार महामंत्र की अनुज्ञा स्वरुप महामंगलकारी उपद्यान तप की आराधना करा रहे आचार्यश्री रत्नसेनसूरीश्वरजी ने मंगलवार को ‘श्रावक जीवन के कर्त्तव्य’’ विषय पर अपना उद्बोधन दिया। इस अवसर पर आचार्यश्री ने कहा कि मोक्ष मार्ग की साधना में आगे ब़ढने के लिए चतुर्विध संघ को प्रतिदिन छह आवश्यक कार्य क्रमशः सामायिक, चउविसत्थो, वंदन, प्रतिक्रमण, कायोत्सर्ग व प्रत्याख्यान अवश्य करने चाहिए। उन्होंने कहा कि समता की साधना के लिए सामायिक अनिवार्य है। इसी प्रकार चौबीस जिनेश्वरों की उपासना भी जरुरी है। परमात्मा का हम पर असीम उपकार है इस उपकार की कृतज्ञता स्वरुप उनकी स्तवना अवश्य करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि देव और धर्म तत्व की सच्ची पहचान कराने वाले गुरु ही हैं, उन्हीं के माध्यम से हमें मोक्षमार्ग की प्राप्ति होती है व हो रही है। ऐसे उपकारी संतों को त्रिकाल वंदन करना चाहिए। दिन अथवा रात्रिकृत पापों की शुद्धि के लिए प्रतिक्रमण को जरुरी बताते हुए रत्नसेनजी ने कहा कि प्रतिक्रमण की प्रक्रिया घाव पर मरहम पट्टी के समान कार्य करती है। उन्होंने कहा कि काया की ममता के निवारण के लिए प्रतिदिन थो़डा बहुत कायोत्सर्ग अवश्य करना चाहिए। इस प्रकार आत्मा के अणाहारी मूल स्वरुप की अनुभूति के लिए प्रतिदिन नवकारसी, आयंबिल व चौविहार आदि का प्रत्याख्यान अवश्य करना चाहिए। आचार्यश्री ने यह भी कहा कि जब तक आत्मा प्रमाद अवस्था मंे है तब तक प्रमाद के शोधन के लिए उसे प्रतिक्रमण की आवश्यकता रहती ही है।

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