चेन्नई/दक्षिण भारतयहां साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में चातुर्मासार्थ विराजित मुनिश्री संयमरत्नविजयजी एवं मुनिश्री भुवनरत्नविजयजी ने बुधवार को अपने दैनिक प्रवचन में कहा कि काम और धन की प्राप्ति में मूलभूत कारण ’’धर्म’’ ही है, ऐसा जानकर जो मानव हमेशा धर्म करता रहता है वे जगत में विरले ही होते हैं। उन्होंने कहा कि क्लेश के आवेश से भरे इस संसार में शुद्ध बुद्धि का मिलना ब़डा ही दुर्लभ है। मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति की जिस क्रिया से दूसरे लोग भी प्रभावित हांे, वही वास्तविक प्रभावना है। समान रूप से व सम्मानपूर्वक बैठकर दिया जाने वाला दान ही वास्तविक दान कहलाता है। उन्होंने कहा कि श्मशान, समुद्र, पेट और लोभ का खड्डा यानी यह चार खड्डे कभी भी भरते नहीं है। वस्तु का जो अपना स्वभाव है, वही उसका धर्म है। मुनिश्री ने कहा कि अपने स्वभाव में रहना धर्म है और पर-भाव में जाना अधर्म है। समय को साधने वाला अवसर को जान लेता है। उन्होंने यह भी कहा कि आलसी व्यक्ति पर अवसर कोई असर नहीं होता। अवसर को पहचानने वाले को भगवान के दर्शन हो जाते हैं।

Facebook Comments

LEAVE A REPLY