आखिरकार एम.जे. अकबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना ही प़डा। देश के नामी संपादक-लेखकों में शुमार रहे अकबर विदेश राज्यमंत्री की हैसियत से उस समय विदेश यात्रा पर थे, जब उनकी पूर्व सहयोगी महिला पत्रकारों ने एक के बाद एक उन पर यौन उत्पी़डन के आरोप लगाये। हालांकि केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह अतीत में ब़डे गर्व के साथ टिप्पणी कर चुके हैं कि यह यूपीए सरकार नहीं है कि बात-बात पर मंत्री इस्तीफा देते रहें। फिर भी माना जा रहा था कि भाजपा महिला सहकर्मियों से दुर्व्यवहार के आरोपी अकबर से विदेश यात्रा से लौटते ही इस्तीफे के लिए कहेगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। इसके उलट अकबर ने टिप्पणी की कि उनके विरुद्ध आरोप चुनाव पूर्व तूफान ख़डा करने की सुनियोजित साजिश है। जाहिर है, एक मंजे हुए राजनेता की तरह अपने विरुद्ध आरोपों को उन्होंने राजनीति प्रेरित करार दिया। उसके बाद अपनी घोषणा के मुताबिक उन्होंने खुद पर आरोप लगाने वाली एक महिला पत्रकार प्रिया रमानी के विरुद्ध अदालत में मानहानि का मुकदमा भी दायर कर दिया। इसे आरोप लगाने वाली महिला पत्रकारों को डराने की कोशिश माना जा रहा था, लेकिन हुआ उलटा। अकबर के विरुद्ध २० महिला पत्रकार एकजुट हो गईं्। तब अचानक, मानहानि मुकदमे की सुनवाई से एक दिन पहले, बुधवार को अकबर ने केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। इस्तीफा देते हुए अकबर ने कहा है कि वह अपने विरुद्ध आरोपों से अदालत में निजी रूप में ल़डना चाहते हैं्। बेशक यही उचित भी है, लेकिन इसका अहसास उन्हें देर से हुआ। अगर वह विदेश यात्रा से लौटते ही आरोपों के विरुद्ध निजी हैसियत से ल़डाई का ऐलान करते हुए इस्तीफा दे देते तो उनके और सरकार, दोनों के लिए बेहतर होता। इसलिए यह अनुमान गलत नहीं कि ऊपरी इशारे पर ही अब इस्तीफा दिया गया है। यह कहना भी गलत नहीं होगा कि अगर यह इशारा पहले ही दे दिया जाता तो सरकार भी फजीहत से बच सकती थी। यह स्वाभाविक ही है कि मी टू अभियान चलाने वाली महिलाएं, खासकर अकबर के विरुद्ध आरोप लगाने वाली पत्रकार इसे अपनी जीत बतायें। अकबर के इस्तीफे से उनके हौसले भी बुलंद हुए होंगे, लेकिन इस इस्तीफे का एक ब़डा कारण राजनैतिक और नैतिक दबाव भी है, वरना अन्य आरोपियों के मामले में अभी तक ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। यौन उत्पी़डन के आरोपों में एक मंत्री का इस्तीफा भारत के लिए निश्चय ही ब़डी घटना है, लेकिन नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे किसी भी मामले का अंतिम एवं तार्किक निपटारा अदालत में ही होता है, जहां बरसों पुराने आरोपों को साबित कर पाना आसान तो हरगिज नहीं होगा। फिर भी मी टू अभियान और इस इस्तीफे से जरूरी सबक अवश्य सीखे जाने चाहिए। इसके साथ यह भी नहीं भूला जाना चाहिए कि चाहे वह मी टू अभियान हो या कोई और अभियान, इसमें कहीं सलेक्टिव अप्रोच तो हावी नहीं हो रही? इस पक्ष को भी नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

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