pune session court
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पुणे। भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में पुणे सत्र अदालत ने आरोपी अरुण फरेरा और वेरनन गोंजाल्विस को झटका दिया है। अदालत ने इन्हें 6 नवंबर तक पुलिस हिरासत में भेजने का आदेश दिया है। इस मामले में शुक्रवार को आरोपी सुधा भारद्वाज की भी गिरफ्तारी हुई। सुधा भारद्वाज को पुलिस फरीदाबाद स्थित घर से लेकर गई। उन्हें भी 6 नवंबर तक पुलिस हिरासत में भेजा गया है। इस तरह इन आरोपियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं।

शुक्रवार को ही पुणे की सत्र अदालत ने अरुण फरेरा, वेरनन गोंजाल्विस और सुधा भारद्वाज की जमानत याचिका को खारिज किया था। जमानत याचिका खारिज होने के बाद पुलिस द्वारा इन्हें हिरासत में लेने का रास्ता साफ हो गया। ये तीनों नजरबंद थे। कानूनी वजहों से पुलिस द्वारा इन्हें हिरासत में लेना संभव नहीं था। अब इनकी जमानत याचिका खारिज होने के बाद ये हिरासत में ले लिए गए हैं। अदालत में पेशी के बाद इन्हें पुलिस हिरासत में भेजा गया। एक रिपोर्ट के अनुसार, सुधा भारद्वाज ने फाइव स्टार सुविधाओं की मांग की है, जैसी कि भगोड़ा विजय माल्या मांग चुका है।

इन तीनों कार्यकर्ताओं को कथित रूप से नक्सल समर्थक माना जाता है। इस साल के शुरुआत में ही जब महाराष्ट्र में भीमा-कोरेगांव हिंसा हुई तो उक्त तीनों वामपंथी कार्यकर्ताओं की पी वरवरा राव और गौतम नवलखा के साथ गिरफ्तारी हुई। इसके बाद महाराष्ट्र पुलिस ने कई सबूतों का दावा कर कहा कि इनके ताल्लुकात माओवादियों से हैं।

वहीं पुणे सत्र अदालत की सरकारी वकील उज्ज्वला पवार ने कहा कि अरुण फरेरा और वेरनन गोंजाल्विस के 14 दिनों की न्यायिक हिरासत की मांग की गई थी। दूसरी ओर बचाव पक्ष के वकील सिद्धार्थ पाटिल ने अदालत में तर्क दिया कि उच्चतम न्यायालय के आदेश के अनुसार उनकी नजरबंदी 26 अक्तूबर को खत्म होने वाली थी और रात के 12 बजे यह समय सीमा खत्म हो गई है। उन्होंने पुलिस पर न्यायालय की अवमानना का आरोप लगाया।

बता दें कि उच्चतम न्यायालय भी इतिहासकार रोमिला थापर की पुनर्विचार याचिका खारिज कर चुका है। उन्होंने याचिका दायर ​की थी, जिसके तहत एसआईटी को भीमा कोरेगांव हिंसा मामले की जांच करने से रोकने और महाराष्ट्र पुलिस को अपनी जांच जारी रखने की मांग की गई थी। लिहाजा यहां से भी इन वामपंथी कार्यकर्ताओं को कोई राहत नहीं मिली।

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