नई दिल्ली। अगर किसी में अपनी हुनर को साबित करने का जज्बा हो तो सफलता एक न एक दिन उसके कदम जरुर चूमती है। महिलाओं के लिए पारंपरिक रेडीमेड परिधानों के निर्माण में मौजूदा समय में देश के अग्रणी बीबा ब्रांड की संस्थापिका मीना बिंद्रा की कहानी भी कुछ ऐसी है जो उपुर्यक्त पंक्तियों को एकदम सही साबित करती है। मीना ने खाली समय का उपयोग करने के लिए शुरु किए गए एक कार्य को जाने माने ब्रांड और एक सफल उद्योग में रुप में स्थापित करने का कार्य है जिससे समाज की अन्य महिलाएं भी प्रेरणा ले सकती हैं।
लगभग 33 वर्ष पूर्व मीना ने यह सफर बैंक से मात्र 8000 रुपए के मामूली कर्ज से शुुरु किया था। दरअसल मीना जब घर का सारा कार्य कर लेती थी तो उनके पास काफी खाली समय रहता था और इसी समय का उपयोग करने के लिए उन्होंने खुद कपड़े बनाने और उसके बाद इसे बाजार में रेडीमेड कपड़े के तौर पर बेचने का निर्णय लिया। उनके द्वारा शुरु किया गया कारोबार आज काफी सफल है और उनका ब्रांड ‘बीबा’ देश के साथ ही विदेशों में भी काफी पसंद किया जाता है।
मीना का जन्म दिल्ली के एक व्यापारी परिवार में हुआ था। मीना जब महज 9 वर्ष की थी तो उनके पिता का निधन हो गया था। उन्होंने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली से पूरी करने के बाद दिल्ली के ही मिरांडा कॉलेज हाउस कॉलेज से ईतिहास विषय में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। मात्र 19 वर्ष की उम्र में मीना का विवाह एक नौसेना अधिकारी के साथ हो गया। शादी के बाद मीना 20 वर्ष तक अपने घर के कार्यों में व्यस्त रहीं। हालांकि जब उनके बच्चे थोड़े बड़े हुए और घर के कार्यों का बोझ थोड़ा कम हुआ तो उन्होंने अपने खाली वक्त का उपयोग करने का निर्णय लिया।
मीना ने अपने व्यापारिक सफर की शुरुआत के बारे में एक वेबसाइट से बातचीत के दौरान कहा कि उन्हें कपड़ों के रंग और डिजाइन के बारे में कुछ औपचारिक जानकारियां तो थी लेकिन कभी उन्होंने इसके बारे में समुचित प्रशिक्षण नहीं लिया था। इसी दौरान वह कपड़ों पर ब्लॉक प्रिंट करने का व्यवसाय करने वाले देवेश नामक व्यापारी के संपर्क में आईं और नियमित तौर पर उनकी फैक्ट्री जाकर इस कार्य की बारीकियों को सीखना शुुरु कर दिया। जब मीना को लगा कि उन्हें कपड़ों और प्रिंट के बारे में कुछ जानकारी हो गई तो उन्होंने अपने पति के सामने अपना कार्य शुरु करने की बात रखी जिसके बाद उनके पति ने उन्हें सिंडिकेट बैंक से 8000 रुपए का कर्ज दिलाकर इस कार्य को शुरु करवाने में मदद की।
बैंक से कर्ज मिलने के बाद मीना ने लगभग 40 सेट सलवार सूट तैयार किए। इन सभी सूटों की कीमत 200 रुपए से भी कम रखी और अपने घर पर ही इसकी सेल लगा दी। इससे मीना को लगभग 3000 रुपए का मुनाफा हुआ और उनका उत्साह भी बढा। इसके बाद उन्होंने मुनाफे में प्राप्त हुई राशि से कुछ और कपड़े बनाए और वह भी जल्द बिक गए। धीरे-धीरे आसपास के इलाकों में उनके बनाए कपड़ों का नाम होना शुरु हो गया और व्यापार में प्रगति होने लगी। कुछ थोक कपड़ा विक्रेता भी मीना द्वारा तैयार किए गए कपड़ों को पसंद करने लगे। अपने व्यापार को स्थापित करने के लिए उन्हें एक ब्रांड नाम की आवश्यकता महसूस हुई और उन्होंने इसके लिए बीबा नाम का चयन किया क्योंकि पंजाब में लड़कियों को बीबा कहकर पुकारा जाता है।इसके बाद धीरे-धीरे यह ब्रांड पूरे बाजार में छा गया।
कुछ समय बाद ही उन्हें अपने व्यवसाय के लिए नई जगह की आवश्यकता महसूस होने लगी। इस दौरान उनके पुत्र संजय ने भी अपनी पढाई पूरी कर ली और मां के कार्य में हाथ बंटाने लगे और मां-बेटे के इस जोड़ी ने वर्ष 1993 आते-आते भारतीय पारंपरिक परिधानों के बाजार में अपनी एक नई पहचान कायम कर ली। 90 के दशक में शॉपर्स स्टॉप ने भी भारतीय बाजार में प्रवेश किया और उन्होंने पारंपरिक कपड़ों के लिए बीबा से संपर्क किया। कुछ समय बाद उनके छोटे बेटे भी हावर्ड से पढाई करने के बाद भारत आए और इस व्यापार में अपनी मां की मदद करने लगे। वर्ष 2004 में बीबा ने मुंबई में अपने दो आउटलेट खोले और इन दोनों आउटलेटों को भी काफी पसंद किया गया। मौजूदा समय में देश भर में बीबा के 90 से अधिक आउटलेट हैं और उनकी सालाना आय 600 करोड़ रुपए से अधिक हो चुकी है।

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