दक्षिण भारत न्यूज नेटवर्कबेंगलूरु। पुष्पगिरि तीर्थ के प्रणेता आचार्यश्री पुष्पदंतसागरजी ने मंगलवार को यहां नेलमंगला में अपने प्रवचन में कहा कि एक गृहस्थ का परम कर्त्तव्य दान, पूजा और भक्ति है इसलिए हार्दिकता के साथ परमात्म भक्ति में डूब जाना चाहिएऔर अपनी आत्मा को पाप से मुक्त करना चाहिए। उन्होंने कहा कि धर्म उन्हें ही उपलब्ध होता है जो भक्ति के सागर में जीवन की नौका को श्रद्धा की पतवार लेकर छो़ड देते हैं। आचार्यश्री ने कहा कि जो व्यक्ति को सन्यास के लिए प्रेरित कर दे अथवा आत्म-ध्यान के उद्यान में आत्मरस पीने को छो़डकर चली जाए वही भक्ति है। पुष्पदंतजी ने कहा कि भक्ति आनंद को लाने का मार्ग है। उन्होंने कहा कि परमात्म भक्ति को कहीं किसी भी प्रकार से किया जाए वह सिर्फ आनंद की ही जननी के रुप में अनुभूति कराती है। आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में जो भी श्रेष्ठ है, उसके लिए हमें भक्ति सहित प्रार्थना करनी होगी। जो महत्वपूर्ण है, वह परमात्मा की भक्ति से ही आता है सिद्धांत रटने से नहीं। उन्होंने यह भी कहा कि परमात्मा के द्वार पर भक्ति का पात्र लेकर और प्रार्थी बनकर जो जाता है वही अमृत को तथा सब कुछ पा सकता है।

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