ravindra muni ji pravachan
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बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां गोडवाड भवन में श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ चिकपेट शाखा के तत्वावधान में आध्यात्मिक चातुर्मास-2018 के तहत अहिंसा समवशरण के प्रांगण में उपाध्यायश्री रवींद्रमुनिजी ने जैन श्रमण संस्कृति के पर्वाधिराज पर्युषण पर्व के तीसरे दिन जैन धर्म में दान विषयक प्रवचन में कहा कि जैन धर्म में अहिंसा, दया, भगवान की भक्ति, करुणा व क्षमा आदि विशेषताओं के साथ दान की महिमा रेखांकित है।

उन्होंने कहा कि दान दुर्गति का नाश करता है। दान की प्रवृत्ति से दुर्गति में जाने से व्यक्ति बच जाता है । व्यक्ति में दान देने के लिए हृदय की विशालता और विराटता जरूरी है, अन्यथा व्यक्ति सिर्फ सोचता ही रह जाता है दान दे नहीं पाता है। व्यक्ति में दया, करुणा के भाव भी दान से ही जगते हैं।

उन्होंने कहा कि परोपकार, जीवदया व सेवा के काम के साथ-साथ मोक्ष एवं स्वर्ग की प्राप्ति दान की प्रवृति से ही संभव है। मुनिश्री ने कहा कि दान देना भी विशालता उदारता व अच्छे संस्कार से ही संभव है। अन्नदान से संबंधित एक कथा प्रसंग के माध्यम से मुनिश्री ने कहा कि जन कल्याण पुण्य व सेवा में दान की दृष्टि प्रत्येक व्यक्ति को रखनी चाहिए।

सुपात्र दान को भी उल्लेखित करते हुए मुनिश्री ने लेने और देने में इस बारे में समझ एवं विवेक की जरूरत है। व्यक्ति के लिए अन्नदान को प्राण की संज्ञा देते हुए उन्होंने कहा कि अन्न का सदुपयोग रूपी दान अवश्य करना चाहिए्। उन्होंने दान में उदार दृष्टि की प्रेरणा देते हुए प्रथम आहार दान, दूसरा ज्ञानदान को तीसरा औषध दान को भी विस्तार से उल्लेखित किया।

जीतो संस्था के उच्च शिक्षा के क्षेत्र में दान की विशिष्ट अनुमोदना उल्लेख करते हुए रवीन्द्रमुनिश्री ने कहा कि जीतो रांकानगरी प्रोजेक्ट के तहत 850 आवासीय फ्लैट भी जैन समाज के कमजोर तबके के लोगों को देने की पहल अनुकरणीय है। समाज को ऐसी संवेदनाएं भी बनाए रखनी चाहिए।

इससे पूर्व सलाहकार श्री रमणीकमुनिजी ने कहा कि अंतगढ़ सूत्र की वाचना में 90 आत्माओं का वर्णन जिन्होंने अपनी साधना से आत्मा को शिखर तक पहुंचाते हुए केवल ज्ञान और निर्वाण प्राप्त किया, सद्गति में विराजमान उन महान विभूतियों का शास्त्र के वाचना के माध्यम से स्मरण कर बोधि को प्राप्त करना है।

मुनिश्री ने कहा कि शरीर का घर संसार और आत्मा का घर मुक्ति है यही बोध जगाना है। शरीर से मुक्त होकर ही आत्मा सद्गति में जाएगी। उन्होंने आगम की संपदा देने वाले व जिनशासन प्रदान करने वाले भक्तों का भी जयकारा लगवाया। इससे पूर्व श्री अर्हममुनि जी ने स्तवन-गीतिका प्रस्तुत की। धर्म सभा का संचालन गौतमचंद धारीवाल ने किया। उन्होंने बताया कि शनिवार को जाप के लाभार्थी प्रकाशचंद पदमाबाई ओस्तवाल का रवीन्द्रमुनिजी ने सम्मान किया। श्रीपारसमुनि जी ने मांगलिक प्रदान की। चिकपेट शाखा के कोषाध्यक्ष धर्मीचंद कांटेड ने सभी को धन्यवाद दिया।

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