acharya maha shraman ji pravachan
acharya maha shraman ji pravachan

चेन्नई/दक्षिण भारत। शुक्रवार को जब बादलों से पानी की बरसात हो रही थी उसी समय जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के आचार्यश्री महाश्रमणजी की अमृतवाणी रूपी वर्षा भी जारी थी। चातुर्मास प्रवास स्थल माधावरम का, जहां शुक्रवार को प्रातः हो रही बरसात के कारण जब आचार्यश्री का महाश्रमण समवसरण में पधारना संभव न हुआ तो उपस्थित श्रद्धालुओं पर अपनी अमृतवाणी की वर्षा आचार्यश्री ने अपने प्रवास स्थल के बाहरी बाग में बने बरामदे से आरम्भ कर दी।

आचार्यश्री ने वहां मंगल प्रवचन का श्रवण ही नहीं कराया, बल्कि नियमित चलने वाले मुनिपत के व्याख्यान का वाचन भी किया। आचार्यश्री के समक्ष एक मासखमण की तपस्या सहित अनेक लोगों ने अपनी-अपनी धारणा के अनुसार अपनी तपस्याओं का प्रत्याख्यान किया। आचार्यश्री ने ‘ठाणं’ आगमाधारित अपने प्रवचन में आकाश के दो भाग लोकाकाश और अलोकाकाश का वर्णन करते हुए कहा कि लोकाकाश छोटा और अलोकाकाश अनंत होता है। लोकाकाश में ही सिद्ध, देव मानव आदि सभी रहते हैं।

devotees listening pravachan
devotees listening pravachan

आचार्यश्री ने शास्त्रकार द्वारा वर्णित आकाश, सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र और तारों का वर्णन करते हुए कहा कि सूर्य एक ऐसा तत्त्व है जिसमें ऊष्मा व तेजस्विता है। वह प्रकाश वाला है। प्रकाश का गुण मनुष्यों में भी आना चाहिए। सूर्य से प्रकाशवत्ता और ज्ञानवत्ता की प्रेरणा लेने का प्रयास करना चाहिए। चन्द्रमा की शीतलता और निर्मलता से भावों में शीतलता और आचारों में निर्मलता लाने का प्रयास करना चाहिए्।

उन्होंने कहा, ग्रहों से दूसरों की भी अच्छाइयों को ग्रहण करने का प्रयास करना चाहिए। जिस प्रकार चंद्रमा ग्रह, नक्षत्र और तारों से शोभायमान होता है, उसी प्रकार आचार्य भी अपने साधु-साध्वियों के मध्य शोभायमान होते हैं। आदमी में तेजस्विता और शीतलता दोनों संतुलित रूप में होनी चाहिए। किसी की भी अधिकता अच्छी नहीं होती। दोनों का संतुलित समावेश शरीर, मन और जीवन में रहे तो आदमी का जीवन अच्छा हो सकता है।

आगमाधारित प्रवचन के पश्चात् आचार्यश्री ने मुनिपत के व्याख्यान क्रम को आगे ब़ढाया। इसके उपरान्त आचार्यश्री की मंगल सन्निधि में बादल मेहता ने मासखमण (31) की तपस्या का प्रत्याख्यान कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

LEAVE A REPLY