बेंगलूरु/बेलगाम/वार्ताकर्नाटक जैसे प्रगतिशील राज्य की चुनावी राजनीति में जाति के कारक की मजबूत भूमिका देखने के बाद कई विश्लेषकों के चेहरों से हंसी गायब है तो दूसरी ओर इस हालत के लिए कुछ लोग मुख्यमंत्री सिद्दरामैया के लिंगायत अल्पसंख्यक कार्ड को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। यह आरोप कांग्रेस के गले नहीं उतर रहा। वहीं, इसके रणनीतिकारों के मन में कोई संदेह नहीं है कि भाजपा के हिंदुत्व कार्ड का जवाब कांग्रेस सिर्फ इसी कदम से दे सकती थी। उनकी सोच यह भी है कि कर्नाटक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता का फायदा उठाने के जुगत में लगी भाजपा की चाल का एकमात्र यही काट हो सकता है। विशेषज्ञों का भी मानना है कि सिद्दरामैया ने जो जातीय इंजीनियरिंग की है, उससे भाजपा के हितों को सबसे ब़डी चुनौती मिलने जा रही है। विजयपुरा जिले के प्रोफेसर ओंकार काकाडे कहते हैं, ’’मुख्यमंत्री ने भाजपा की कमजोर नस पर उंगली रख दी है। लिंगायत वोट बैंक बंटने के आसार देखकर भाजपा तिलमिला गई है, क्योंकि लिंगायत हमेशा जाति के आधार पर ही मतदान करते आए हैं। अब लिंगायतों को राज्य में धार्मिक अल्पसंख्यक मान लिए जाने से निश्चित रूप से इस समुदाय का एक अच्छा-खासा हिस्सा कांग्रेस के पाले में खिंचा आ सकता है।’’ वहीं, भाजपा की तिलमिलाहट का अंदाजा कराते हुए बेलगाम के भाजपा पार्षद दीपक जमखंडी कहते हैं, ’’कर्नाटक में जीतने के लिए कांग्रेस नेतृत्व ने बेचैनी में ब़डा जोखिम उठा लिया है। देश की यह सबसे पुरानी पार्टी आज सिर्फ तीन राज्यों पंजाब, मिजोरम और कर्नाटक की ही सत्ता में रह गई है। अगर कर्नाटक में भी इस पार्टी के खिलाफ जनादेश आता है तो देश की मौजूदा राजनीति में यह पूरी तरह से संदर्भहीन पार्टी हो जाएगी।’’ जमखंडी के साथ ही अन्य भाजपा कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस चुनौती भरे समय में कांगेस को जाति या कथित ’’सोशल इंजीनियरिंग’’ की मदद लेनी प़ड रही है। भाजपा के राज्यसभा सांसद राजीव चंद्रशेखर ने भी इससे सहमति जताते हुए एक समाचार एजेंसी से बातचीत में कहा, ’’पिछले पांच वर्षों के दौरान मुख्यमंत्री सिद्दरामैया की राजनीति ने कर्नाटक में जातिवादी राजनीति की ज़डें एक प्रकार से मजबूत की हैं।’’ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मंगलवार को चिक्को़डी में एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए इन सबके नजरियों को सही ठहराया है। उन्होंने कांग्रेस पर लिंगायतों और दलितों के जातिगत मुद्दों पर राजनीतिक रोटी सेंकने का आरोप लगाया। बेलगाम के एक शिक्षाविद संजय प्रसन्ना कांग्रेस की जाति आधारित चुनावी रणनीति का विश्लेषण करते हुए कहते हैं, ’’मल्लिकार्जुन खरगे, वीरप्पा मोइली और जी. परमेश्वर अपने-आप में कांग्रेस के लिए बेहद महत्वपूर्ण सियासी और चुनावी कारक माने जा सकते हैं। इसके बावजूद कांग्रेस ने सिद्दरामैया को राज्य की बागडोर सौंप दी। इसके पीछे यही कारण था कि कांग्रेस को मुख्यमंत्री के अपने ही समुदाय कुरुबा का समर्थन मिलने की उम्मीद थी, जो कर्नाटक की कुल आबादी में मात्र ८-९ प्रतिशत हिस्सेदारी करते हैं। मुख्यमंत्री को अपने इस समुदाय की पहचान से काफी ब़डा सियासी फायदा मिलता रहा है।’’ वहीं, एक पूर्व मुख्यमंत्री का दावा है कि राज्य के विधानसभा चुनाव हमेशा जातीय समीकरणों के आधार पर ही ल़डे जाते रहे हैं। हुब्बल्ली के मतदाता संजय गौतम की मान्यता भी यही है। वह कहते हैं कि कुरुबा समुदाय के लोग पूरे राज्य में पाए जाते हैं। यही वजह है कि मुख्यमंत्री ने अपने पिछले पांच वर्षों के कार्यकाल के दौरान कई मौकों पर अपनी जातीय पहचान उजागर की है। वह चाहते हैं कि इसी पहचान के आधार पर मुख्यमंत्री के रूप में उनकी सफलता या असफलताओं का मूल्यांकन हो। हुब्बल्ली के ही एक अन्य मतदाता इनफान जमीन इस नजरिए से सहमत हें लेकिन उनका कहना है कि हिंदुओं के बीच अपनी जमीन मजबूत करने के बाद ही कांग्रेस को भाजपा की हिंदूवादी रणनीति से जूझने में सफलता मिल सकेगी। ज्य्यत्र ृय्थ्य्यद्यत्र द्यय्ज्द्मर्‍्यत्र फ्ष्ठ क्वरुप्रय् द्मब्र्‍्र द्बत्रख्रय्त्रय् बहरहाल, कर्नाटक में कांग्रेस मामलों के प्रभारी महासचिव केसी वेणुगोपाल को इस विश्लेषण में कोई दम नहीं दिखता। वह कांग्रेस की जाति केंद्रित चुनावी रणनीति की धारणा को सिरे से खारिज करते हैं। उनकी दलील है कि कांग्रेस ने हमेशा समाज के समावेशी विकास पर भरोसा किया है। तमाम आरोपों से परे सचाई यह है कि पार्टी ने कभी मतदाताओं को जाति के आधार पर प्रबंधित करने का प्रयास कभी नहीं किया। उनकी दलील है कि कांग्रेस का मूल सिद्धांत है समावेशी विकास और इसमें जाति-पांति से जु़डी किसी सोच की गुंजाइश ही नहीं है। जो भी हो, कर्नाटक के मतदाता इस परिदृश्य से खुश नहीं दिखते कि उनके राज्य में जाति आधारित चुनावी रणनीति फिर से वापसी करने लगी है। वहीं, इस तथ्य की अनदेखी नहीं की जा सकती है कि सामान्य वर्गों की बहुलता वाली विधानसभा सीटों पर भी जातीय समीकरण हर चुनाव में महत्वपूर्ण हो जाते हैं। मुदहोल, सीवी रमण नगर, महादेवपुरा, नागथन, धारवा़ड पूर्वी, हडगल्ली, हावेरी, लिंगसुगुर और अन्य कई सीटों पर जातियों के चुनावी महत्व की ओर इशारा करते हुए इरफान जमीर कहते हैं कि आम तौर पर शिक्षा और अन्य मामलों में पिछ़डे माने जाने वाले बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में होने वाले चुनावों में जातीयता का मुद्दा प्रमुख स्थान पर होता है लेकिन कर्नाटक जैसे प्रगतिशील और शिक्षा के मामले में अति विकसित राज्य में यह मसला जोर पक़डना समझ से परे की बात है।

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