चेन्नई/दक्षिण भारतयहां माधावरम् में जैन तेरापंथ नगर में चातुर्मासार्थ विराजित तेरापंथ धर्मसंघ के जैन आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को अपने प्रवचन में कहा कि अध्यात्म की साधना में दो आयाम हैं संवर और निर्जरा। संवर वह तत्व है जो नए सिरे से कर्मों के आगमन को रोकता है। निर्जरा वह तत्व है जो पहले से आए हुए कर्म हैं उनको बाहर निकालता है, क्षीण करता है। उन्होंने उदाहरण देते हुए समझाया कि जिस प्रकार एक हॉल या कमरे में सफाई के लिए एक बार दरवाजा बंद करके अंदर के कचरे को एकत्रित कर बाहर निकाला जाता है और बाद में भीतर कीसफाई होती है। इसमें थो़डे समय के लिए संवर भी हुआ और निर्जरा भी हुई। आचार्यश्री ने कहा कि हमारी आत्मा में जो कर्म है, अब नये सिरे से कर्मों का बंधन नहीं करना चाहिए। उसके लिए संवर की साधना आवश्यक है। संवर में व्रत संवर में हिंसा, झूठ, चोरी नहीं करने इत्यादि का त्याग किया जाता है। यह त्याग करने से व्रत संवर निष्पन्न होता है। तपस्या से कर्मों की निर्जरा होती है। आचार्यश्री ने कहा कि आंख हमारे पास है, आंख से दिखता है तो आदमी काम कर लेता है। आंख का हम संयम रखने का प्रयास करें। क्या देख रहे हैं? अनपेक्षित चीजों को, रुपों को आसक्ति से देखते हैं, तो आंख का, चक्षु का असंयम हो जाता है। आंख का हम बि़ढया उपयोग करे। धार्मिक ग्रंथों को प़ढने में आंख का उपयोग करे। अच्छी चीज देखने में आंख का उपयोग करें। आंख मूंदकर ध्यान करें, जप करें। आचार्यश्री ने कहा कि आंख एक ऐसी चीज है जिससे हमें ज्ञान की प्राप्ति होती है। जिनके पास आंख है उनका कितना ब़डा भाग्य है। इ्द्रिरय स्वस्थ हैं उनको भावात्मक दृष्टि से भी स्वस्थ रखने का प्रयास करना चाहिए। उनका उपयोग संयम में करना चाहिए। आचार्यश्री ने सभी को नेत्रदान के लिए प्रेरित किया। मंगलवार को तमिलनाडु के शहरी निकाय एवं ग्रामीण विकास मंत्री एसपी वेलुमणि ने आचार्यश्री के दर्शन किए। चातुर्मास व्यवस्था समिति के अध्यक्ष धर्मचन्द लुंक़ड ने वेलुमणि का स्वागत अंगवस्त्र पहनाकर एवं स्मृतिचिन्ह देकर किया। इस मौके पर मर्यादा महोत्सव व्यवस्था समिति कोयम्बटूर के अध्यक्ष विनोद लुणिया एवं श्रवण बोहरा भी उपस्थित थे।

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