विजयवा़डा। आचार्यश्री जयन्तसेन सूरीजी के शिष्य मुनिश्री संयमरत्न विजयजी, मुनिश्री भुवनरत्न विजयजी शुक्रवार को सुबह कौस्तुभ निवास में भक्तामर के पश्चात विहार करके पुलभावी स्ट्रीट स्थित श्री संभवनाथ जिनालय, कंदुलवारी स्ट्रीट स्थित श्री संभवनाथ जिनालय, जूना मंदिर श्री संभवनाथ जिनालय, श्री अजितनाथ जिनालय, श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जिनालय, श्री कुंथुनाथ गृह जिनालय होते हुए श्री आदिनाथ गृह जिनालय ‘पाबु निकेतन‘ पहुँचे।यहाँ पर इस युग के प्रथम राजा, प्रथम योगी, प्रथम तीर्थंकर श्री आदिनाथ परमात्मा के जन्म एवं दीक्षा कल्याणक पर्व प्रसंग पर सुबह आदिनाथ पंचकल्याणक पूजा महावीर संगीत मंडल द्वारा पढाई गई। मुनि श्री ने कहा कि परमात्मा श्री आदिनाथजी ने हमें इस युग के प्रारंभ में कलाओं से अनभिज्ञ लोगों को असि-मसि-कृषि कला सिखाई। चैत्र वदी अष्टमी के दिन आदिनाथ परमात्मा ने जन्म एवं दीक्षा लेकर सभी जीवों पर अनंत उपकार किए हैं। चैत्र वदी अष्टमी के दिन ही श्रद्धालुगण परमात्मा श्री आदिनाथजी की वार्षिक तपस्या का अनुकरण करते हुए वर्षीतप की तपस्या प्रारंभ करते है। इस तपस्या से हमें एक शिक्षा मिलती है कि कर्म किसी को नहीं छो़डता। किए हुए शुभाशुभ कर्मों का फल हमें भोगना ही प़डता है। जब जब परमात्मा का कल्याणक होता है, तब तब नरक में रहे हुए जीवों को भी क्षण भर के लिए सुख की अनुभूति होती है। परमात्मा का चारित्र इतना प्रभावशाली है कि उनके निकट आने वाला हर प्राणी आनंदित होकर लौटता है। पूजा के पश्चात् श्री आदिनाथ गृह जिनालय निर्माता शा. प्रवीण कुमार ओटमलजी वेदमुथा परिवार की ओर से संघ पूजा की गयी।

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