दूसरों की सहायता करना एक सौभाग्य है

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के अक्कीपेट स्थित जैन मंदिर में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्यश्री देवेंद्रसागरजी ने प्रवचन में कहा कि दूसरों के प्रति हमारे कर्तव्य का अर्थ है- दूसरों की सहायता करना। संसार का भला करना। वास्तव में ऊपर से तो हम संसार का उपकार करते हैं, परंतु असल में हम अपना ही उपकार करते हैं। हमें सदैव संसार का उपकार करने की चेष्टा करनी चाहिए और कार्य करने का यही हमारा सर्वोच्च उद्देश्य होना चाहिए। यह संसार इसलिए नहीं बना कि तुम आकर इसकी सहायता करो, बल्कि सच यह है कि संसार में बहुत दुख-कष्ट हैं, इसलिए लोगों की सहायता करना हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ कार्य है। उन्होंेने कहा कि हम सदैव यह ध्यान रखें कि दूसरों की सहायता करना एक सौभाग्य है, तो परोपकार करने की इच्छा एक सर्वोत्तम प्रेरणा शक्ति बन जाती है।
संतश्री ने कहा कि संसार की सहायता करने की खोखली बातों को हमें मन से निकाल देना चाहिए। यह संसार न तो तुम्हारी सहायता का भूखा है और न मेरी। परंतु फिर भी हमें निरंतर कार्य करते रहना चाहिए, परोपकार करते रहना चाहिए क्योंकि इससे हमारा ही भला है। यही एक साधन है, जिससे हम पूर्ण बन सकते हैं। यदि हमने किसी गरीब को कुछ दिया, तो वास्तव में हम पर उसका आभार है, क्योंकि उसने हमें इस बात का अवसर दिया कि हम अपनी दया की भावना उस पर काम में ला सके। यह सोचना हमारी भूल है कि हमने संसार का भला किया। इस विचार से दुख उत्पन्न होता है।