ओएफबी पर कायम रहें

केंद्र सरकार ने हाल में देशभर के 41 आयुध कारखानों का संचालन करने वाले आयुध कारखाना बोर्ड (ओएफबी) को कंपनी में तब्दील करने का प्रस्ताव रखा है। हर लिहाज से इसे एक साहसिक कदम ही कहना होगा। इन कारखानों में कुल 82 हजार से भी अधिक कर्मचारी काम करते हैं। इनके श्रम संगठनों को सरकार का यह फैसला रास नहीं आया जिसके बाद वह 20 अगस्त से एक महीने की हड़ताल पर चले गए। हालांकि रक्षा मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों से कई दौर की बातचीत के बाद यह हड़ताल वापस ले ली गई लेकिन भविष्य में फिर हड़ताल होने की आशंका से इन्कार नहीं किया जा सकता है। क्या सरकार को अपने कदम पीछे खींच लेने चाहिएं या अपने फैसले पर डटे रहना चाहिए? सबूत बताते हैं कि रक्षा मंत्रालय को अपने फैसले पर पूरी तरह से कायम रहना चाहिए ताकि ओएफबी को दीर्घजीवी बनाया जा सके और साथ ही देश की रक्षा तैयारी और आत्म-निर्भरता भी सुनिश्चित की जा सके। ब्रिटिशकालीन ओएफबी का गठन वर्ष 1802 में हुआ था और यह भारत सरकार का सबसे पुराना वाणिज्यिक गतिविधि वाला सबसे बड़ा विभागीय संगठन है। करीब 12,800 करोड़ रुपए का कारोबार करने वाले ओएफबी का टैंक एवं हथियारबंद वाहन से लेकर छोटे हथियारों, गोला-बारूद एवं सैन्य साजोसामान जैसे तमाम उत्पादों में ऐतिहासिक रूप से एकाधिकार रहा है। वहीं, कई वजहों से यह संगठन अपने अपेक्षित स्तर से नीचे ही रहा है। एक सरकारी विभाग होने से ओएफबी पर सशस्त्र बलों को बेचे जाने वाले अपने उत्पादों से लाभ कमाने पर प्रतिबंध है। ऐसा होने से ओएफबी अपने सांगठनिक एवं उत्पादन क्षमता में सुधार के लिए अधिक प्रोत्साहित नहीं हो पाता है। इसके अलावा उसे उत्पादन में आई समूची लागत उपभोक्ताओं से ही वसूलने की मंजूरी होती है। यह कारोबारी नजरिया अब त बेअसर माना जाता रहा है और इससे रक्षा मंत्रालय पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। हालांकि ओएफबी के लिए सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि इसे निर्णय व निर्माण के स्तर पर बहुत सीमित अधिकार होते हैं। रक्षा मंत्रालय का छोटा विभाग होने के नाते वित्त, मानव संसाधन, शोध एवं विकास, कारखानों के आधुनिकीकरण और संयुक्त उद्यम एवं अनुषंगी इकाइयां बनाने जैसे मामलों में फैसले ओएफबी के स्तर पर नहीं लिए जाते हैं। बाहरी एजेंसियों के निर्णय-निर्माण का अफसरशाही वाला रवैया और नतीजों के बजाय कायदे-कानून पर अधिक जोर देने से ओएफबी के पास अपने दम पर खड़े होने और जवाबदेह होने की बहुत कम गुंजाइश ही रह जाती है। दिल्ली के सत्ता गलियारे से काफी दूर होने और शीर्ष अधिकारियों के जल्द बदले जाने से ओएफबी की चिंता और बढ़ जाती है। गत 10 वर्षों में ही ओएफबी के 15 चेयरमैन रह चुके हैं्। शीर्ष नेतृत्व में ऐसे त्वरित बदलाव से ओएफबी को रणनीतिक दृष्टि एवं दिशा नहीं मिल पाती है।
वैसे ओएफबी ने 200 साल से पुराने इतिहास और विशाल परिसंपत्ति आधार के मद्देनजर अपना प्रदर्शन सुधारने के लिए खुद भी बहुत कम प्रयास किए हैं। हाल यह है कि आज भी यह संगठन अपने किसी उत्पाद के लाभप्रद होने का दावा नहीं कर सकता है क्योंकि इसके टर्नओवर का 75-80 फीसदी आयातित तकनीक से ही आता है। नवाचार को अहमियत नहीं देने के अलावा ठेके पूरा करने में देरी और नाममात्र का निर्यात होने से इसकी मुख्य हितधारक यानी भारतीय सेना परेशान हो गई है। सेना की कुल आपूर्ति में करीब 80 फीसदी हिस्सा ओएफबी का ही है। इसके अलावा सेना इन उत्पादों की खराब गुणवत्ता से भी परेशान है। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) ने एक बार कहा था कि आयुध कारखानों में बने कुछ उत्पाद ऐसी खामियों के बावजूद ग्राहकों को दे दिए गए जिन्हें आसानी से देखा जा सकता था। प्रदर्शन के मोर्चे पर लगातार नाकाम रहने से परेशान रक्षा मंत्रालय ने पिछले वर्षों में खुद को इन उत्पादों से दूर करने की कोशिश की है। सेना पहले ही करीब 275 उत्पादों को कम अहमियत वाला घोषित कर चुकी है जिससे इन उत्पादों पर ओएफबी का एकाधिकार कम हो चला है।