टेलीकॉम क्षेत्र में अफरातफरी

दूरसंचार क्षेत्र में अफरातफरी का माहौल है। सरकार के सामने भी कुछ गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं्। सर्वोच्च न्यायालय ने जब से दूरसंचार विभाग की समायोजित सकल राजस्व की परिभाषा पर सहमति जताई है और दूरसंचार कंपनियों को तीन महीने के भीतर 1.33 लाख करोड़ रुपए का बकाया ब्याज सहित चुकाने को कहा है तब से नए किस्म का संकट आ खड़ा हुआ है। पहले से काम कर रही कंपनियों पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का ऋण है। इन कंपनियों ने कहा है कि वे यह राशि चुकाने की स्थिति में नहीं हैं। उन्होंने यह राशि माफ करने की मांग भी की है। सेल्युलर ऑपरेटर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (सीओएआई) का कहना है कि इस निर्णय से बाजार में एकाधिकार आएगा और सरकार के डिजिटलीकरण के कार्यक्रम को भी झटका लगेगा। परंतु बाजार में आने वाली सबसे नई कंपनी रिलायंस जियो, जिसने बाजार में उथलपुथल मचा दी थी, ने सीओएआई के ’डराने और ब्लैकमेल करने वाले रुख’ पर आपत्ति जताई है। इस बीच इस क्षेत्र की कंपनियों के शेयरों की कीमत पर असर पड़ा है। इन कंपनियों की क्रेडिट रेटिंग कम की गई है और इनमें से कम से कम एक कंपनी के बारे में खबर है कि वह कर्जदाताओं के साथ पुनभुर्गतान की बेहतर शर्तों को लेकर चर्चा कर रही है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने मौजूदा कंपनियों को जबरदस्त झटका पहुंचाया है और यह केंद्र सरकार के गैर कर राजस्व के एक नियमित स्रोत को भी समाप्त कर सकती है। सरकार ने इस क्षेत्र पर से वित्तीय तनाव समाप्त करने संबंधी सुझाव देने के लिए सचिवों की समिति का गठन करके सही किया है। समिति और इससे आगे सरकार के लिए बेहतर यही होगा कि वे इस मसले पर कहीं अधिक व्यापक दृष्टि डालें और कुछ बुनियादी नीतिगत सवालों को हल करें। पहली बात, मौजूदा कंपनियों ने इतना ऋण क्यों एकत्रित किया? यह राशि केवल कारोबारी प्रबंधन की वजह से नहीं बढ़ी है बल्कि इस क्षेत्र में बीते वर्षों के दौरान हुए नीतिगत और नियामकीय बदलावों ने भी असर डाला है। इसकी वजह से क्षेत्र में सुदृढ़ीकरण भी हुआ क्योंकि कई दूरसंचार कंपनियां कारोबार से बाहर हो गईं या बंद हो गईं।

अतीत के निर्णयों पर समग्र दृष्टि डालकर ही सरकार नीतिगत सुधार कर सकती है। इससे इस क्षेत्र के तनाव में स्थायी कमी लाने में मदद मिलेगी। दूसरा, क्या आगे और सुदृढ़ीकरण से इस क्षेत्र और ग्राहकों को मदद मिलेगी? विश्लेषकों का मानना है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश से जो बकाया उत्पन्न हुआ है उसके बाद बाजार में केवल निजी क्षेत्र के दो कारोबारी ही रह जाएंगे। इसका असर सेवाओं की गुणवत्ता और निवेश पर पड़ेगा। निश्चित तौर पर यह मामला गैर किफायती कंपनियों को बचाने का नहीं है। एक और सेवा प्रदाता के बाजार से बाहर होने को अकेले परिचालन मानकों से नहीं समझाया जा सकता। तीसरा, सरकार को यह निर्णय लेना है कि वह इस क्षेत्र से क्या अपेक्षा करती है? एक ओर, निजी सेवा प्रदाताओं को पीछे धकेल दिया गया है और वहीं दूसरी ओर वह गैर किफायती सरकारी कंपनियों को रियायतों के साथ पुनर्जीवन प्रदान कर रही है। इससे परिसंपत्तियों का गलत आवंटन होगा और बाजार में विसंगति आएगी। इतना ही नहीं, यह भी देखना उचित होगा कि सरकार द्वारा राजस्व बढ़ाने के लिए दूरसंचार कंपनियों को निचोड़ना जारी रखना चाहिए या उसे उनकी निवेश करने की क्षमता पर भी विचार करना चाहिए। उसे संतुलन कायम करना चाहिए्। इनमें से कुछ सवालों का साफ जवाब सरकार को सही फैसला लेने में मदद करेगा। देश का दूरसंचार क्षेत्र बहुत अहम मोड़ पर है और सरकार का इस क्षेत्र के साथ व्यवहार न केवल इसे प्रभावित करेगा बल्कि निवेश के माहौल पर भी असर डालेगा।