जेएफआर जैकब
जेएफआर जैकब

नई दिल्ली/दक्षिण भारत। सोलह दिसंबर, 1971 .. एक ऐसी तारीख जब भारत की सेनाओं ने अपने शौर्य और रणनीति से दुनिया का नक्शा बदल दिया। कभी पूर्वी पाकिस्तान रहा एक विशाल भूभाग स्वतंत्र बांग्लादेश बन गया। इसी के साथ जिन्ना का वह पाकिस्तान दो टुकड़ों में बंट गया जो नफरत की बुनियाद पर टिका था। इस यादगार तारीख के पीछे हमारे अनेक योद्धाओं का योगदान है।

भारत मां के इन्हीं सपूतों में से एक नाम है लेफ्टिनेंट जनरल जेएफआर जैकब। उनका पूरा नाम जैक फर्ज राफेल जैकब था। साल 1923 में कोलकाता निवासी एक यहूदी परिवार में जन्मे जैकब उन वीर योद्धाओं में से हैं जिन पर भारत के साथ ही इजरायल भी गर्व करता है। इजराइल के सैनिक म्यूजियम में भी जनरल जैकब की वर्दी टंगी हुई है।

जैकब 1942 में भारतीय सेना में आए। उन्होंने मध्य पूर्व, बर्मा और सुमात्रा की लड़ाई में भाग लेकर अनुभव हासिल किया। अपने वीरतापूर्ण कार्यों के लिए वे भारतीय सेना में पदोन्नति प्राप्त करते रहे। साल 1967 में वे मेजर जनरल बने। दो साल बाद उन्हें सेना की पूर्वी कमान का चीफ ऑफ स्टाफ बनाया गया।

जब 1971 में भारत-पाक का युद्ध छिड़ा तो वे इसकी रणनीति बनाने वाले प्रमुख सैन्य अफसरों में से थे, जिसकी बदौलत पाक ने घुटने टेके। जनरल जैकब बंगाल की भौगोलिक परिस्थिति, जलवायु, वर्षाकाल, नदियों, वनों और महत्वपूर्ण शहरों के सामरिक महत्व से परिचित थे। इसके साथ ही उन्होंने पाकिस्तानी फौजी अफसरों पर मनोवैज्ञानिक दबाव डाला, जिससे भारत का पक्ष और मजबूत हो गया।

16 दिसंबर, 1971 को ढाका में पाकिस्तान के जनरल एएके नियाजी समर्पण पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए।
16 दिसंबर, 1971 को ढाका में पाकिस्तान के जनरल एएके नियाजी समर्पण पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए।

इन सबका संयुक्त परिणाम यह रहा कि ढाका में पाकिस्तानी फौज के पांव उखड़ने लगे। आखिरकार 16 दिसंबर को जैकब के पास सैम मानेकशॉ का फ़ोन आया कि ढाका जाकर पाकिस्तानी फौज से आत्मसमर्पण करवाइए। जैकब ढाका पहुंचे और वहां दुश्मन देश के जनरल एएके नियाजी से कहा कि अपनी फौज को आत्मसमर्पण का आदेश दें।

यह सुनकर नियाजी भड़क उठा। इस पर जैकब ने कहा कि यदि आप हथियार डालते हैं तो हम आपका और आपके परिजनों का ध्यान रखेंगे। यदि इस शर्त पर अमल नहीं करते हैं तो फिर हमारी जिम्मेदारी नहीं होगी। जैकब ने आत्मसमर्पण का एक दस्तावेज उसे सौंपा और आधे घंटे का वक्त दिया।

आधा घंटा बाद जब जैकब आए तो नियाजी पूरी तरह निराशा में डूबा हुआ था। उससे पूछा, क्या आप आत्मसमर्पण की शर्तों को स्वीकार करते हैं? नियाजी खामोश रहा और यही सवाल तीन बार पूछे जाने पर भी कोई जवाब नहीं दिया। तब जैकब ने कहा कि आपके जवाब न देने का मतलब है कि आप इसे स्वीकार करते हैं।

इसके बाद ढाका के रेसकोर्स मैदान में जनरल नियाजी ने आत्मसमर्पण के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। उसने अपने 93 हजार सैनिकों के साथ हथियार डाले। जब पाकिस्तान में उससे पूछा गया, ‘ढाका में भारी तादाद में फौजी और हथियार मौजूद थे, फिर आत्मसमर्पण क्यों कर दिया?’ इस पर नियाजी का जवाब था, ‘मुझे ऐसा करने के लिए जैकब ने मजबूर किया।’

LEAVE A REPLY

11 − 11 =