जम्मू-कश्मीर में तैनात सुरक्षा बल
जम्मू-कश्मीर में तैनात सुरक्षा बल

गोरखपुर/दक्षिण भारत। इस साल फरवरी में पुलवामा हमले के बाद देशभर में आवाज उठी थी कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35ए को हटा देना चाहिए। हालांकि इससे पहले भी विभिन्न मौकों पर यह मांग की जाती रही है। कई विशेषज्ञों का मानना है कि इन दोनों प्रावधानों की वजह से जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद बढ़ा है। ऐसे में इन दोनों को ही हटाकर जम्मू-कश्मीर में शांति कायम करनी चाहिए।

वहीं, कुछ विधि विशेषज्ञों का दृष्टिकोण इससे अलग है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के विधि विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. टीएन मिश्र कहते हैं कि असल समस्या 35ए है। यदि इसे हटा दिया जाए तो फिर अनुच्छेद 370 का कोई मतलब नहीं र​ह जाता है।

संविधान की मूल भावना, जम्मू-कश्मीर की बेहतरी
एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने संविधान की मूल भावना और जम्मू-कश्मीर की बेहतरी के लिए जरूरतों को रेखांकित करते हुए कहा कि दोनों को ही ध्यान में रखा जाना बहुत जरूरी है। साथ ही इस दिशा में कोई भी कदम उठाने के लिए जम्मू-कश्मीर की विधानसभा को भरोसे में लेना आवश्यक है। इसके बिना उक्त अनुच्छेद को हटाना नैतिक एवं कानूनी दृष्टि से उचित नहीं होगा।

अस्थायी प्रावधान, उठ रहे सवाल
डॉ. मिश्र ने बताया कि 17 अक्टूबर, 1949 को अनुच्छेद 370 संविधान में शामिल किया गया। इस भाग का शीर्षक ‘अस्थायी, संक्रमणकालीन और विशेष प्रावधान’ है। इस प्रकार यह अस्थायी के तौर पर संविधान में शामिल किया गया। उन्होंने इसके अब तक लागू होने पर सवाल उठाया और इस पर विचार करने की जरूरत बताई।

स्थायी नागरिक को बना दिया शरणार्थी
डॉ. मिश्र ने कहा कि अनुच्छेद 35ए अनुच्छेद 370 से भी बड़ी समस्या है। उन्होंने कहा कि 14 मई, 1954 को तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा आदेश पारित किया गया था। इससे संविधान में नया अनुच्छेद जोड़ा गया। डॉ. मिश्र ने कहा कि यह आज लाखों लोगों के लिए अभिशाप बन गया है। इस अनुच्छेद के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए डॉ. मिश्र ने कहा कि इससे विधानसभा को अधिकार मिलता है कि व​ह लाखों लोगों को स्थायी नागरिक की परिभाषा से बाहर कर उन्हें सदा के लिए शरणार्थी बना दे।

पीढ़ियों से रहे, नहीं मिले अधिकार
डॉ. मिश्र ने इस अनुच्छेद के प्रभावों के बारे में बताया कि जम्मू-कश्मीर में ऐसे लोगों की लाखों की तादाद में आबादी है जो पीढ़ियों से वहीं निवास कर रही है। वे लोग लोकसभा चुनाव में तो वोट डाल सकते हैं, लेकिन विधानसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में वोट डालने के अधिकार से वंचित रह जाते हैं। वे वहां रहकर भी राज्य सरकार की कोई नौकरी हासिल नहीं कर सकते। इसके अलावा वे कोई सुविधा भी हासिल नहीं कर सकते।

समानता की भावना के खिलाफ
डॉ. मिश्र ने बताया कि इस तरह यह भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त प्रत्येक नागरिक को समानता के अधिकार की भावना के भी खिलाफ है। उन्होंने 35ए के संवैधानिक पहलुओं के बारे में बताया कि यह संविधान के मुख्य भाग में नहीं है। इसे परिशिष्ट में शामिल किया गया। डॉ. मिश्र ने जम्मू-कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग बताते हुए कहा कि राज्य देश की आर्थिक प्रगति का भाग है। उन्होंने मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति और सर्वसम्मति को विवाद हल करने के लिए जरूरी बताया।

मोदी सरकार 2.0 में फिर उठीं आवाजें
उल्लेखनीय है कि इस अनुच्छेद की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है और मामला उच्चतम न्यायालय में है। इस साल फरवरी में अनुच्छेद 370 और 35ए काफी चर्चा में रहे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली पिछली सरकार से बड़ी तादाद में यूजर्स ने मांग की कि कश्मीर में शांति कायम करने और अलगाववाद के खात्मे के लिए उक्त दोनों अनुच्छेदों को हटा देना चाहिए। मोदी सरकार के दोबारा सत्ता में आने के बाद एक बार फिर ऐसी आवाजें उठ रही हैं।

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