आज के समय में हवाई यात्रा यातायात का सबसे सुलभ जरिया हो गया है और बहुत सारे हवाई यात्री ऐसे भी होते हैं, जिन्हें सांस संबंधी बीमारियां या दिल की बीमारियां होती हैं तो उन्हें हवाई जहाज में ऑक्सीजन की जरूरत प़ड सकती है। ऐसे लोगों को सुरक्षित यात्रा के लिए डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए। ऐसे मरीजों की जांच करते समय डॉक्टरों को उनके लिए हवाई यात्रा संबंधी अनुमति देने से पहले कुछ बातों का ध्यान जरूर रखना चाहिए। फ्लाइट में ऑक्सीजन के पूरक की जरूरत के आकलन के लिए ध्यान में रखने योग्य महत्वपूर्ण तथ्य हैं :ी हवाई जहाज के केबिन में पूरा दबाव होता है, बावजूद इसके बेहद ऊंचाई पर पहुंचने की स्थिति में फेफ़डे की बीमारी से पीि़डत मरीजों को ऑक्सीजन की कमी महसूस हो सकती है।ी ऐसे मरीज जो हाई रिस्क में आते हैं, उन्हें जहाज में सप्लीमेंटल ऑक्सीजन की जरुरत प़ड सकती है।ी ऐसे मरीजों की जांच पल्स ऑग्जीमीटर द्वारा आराम के दौरान और कमरे ब्रीदिंग रूम एयर में की जानी चाहिए।ी अगर एसपीओ-२ या ब्लड ऑक्सीजन का स्तर ९५ फीसदी से अधिक है तो मरीज को क्लीयरेंस दे दें। उन्हें आगे के जांच की कोई जरूरत नहीं। अगर व्यक्ति को गंभीर बीमारी है और एसपीओ-२ का स्तर ९५ फीसदी से अधिक है तो बेहतर है उसका ६ मिनट का वॉक टेस्ट किया जाए।ी अगर एसपीओ-२ ९२ फीसदी से कम है तब व्यक्ति को फ्लाइट के अंदर सप्लीमेंटल ऑक्सीजन की जरूरत प़डेगी।ी अगर एसपीओ-२ ९२ और ९५ फीसदी के बीच है, तब रिस्क फैक्टर्स को देखें। अगर कोई रिस्क फैक्टर नहीं है तो उन्हें क्लीयरेंस दे दें। अगर कोई रिस्क फैक्टर है तब ऐसे मरीजों का ६ मिनट वॉक टेस्ट करें। टेस्ट के दौरान अगर एसपीओ-२ का स्तर ८४ फीसदी के स्तर तक गिर जाता है तो समझ जाएं कि मरीज को फ्लाइट में ऑक्सीजन की जरूरत होगी।ी अगर मरीज रुम एयर में ऑक्सीजन पर है तो फ्लाइट में ऑक्सीजन फ्लो मूल स्तर से १ से २ एल/मिनट ब़ढा दें।ी सप्लीमेंटल ऑक्सीजन अप्रूव्ड पोर्टेबल ऑक्सीजन कनिस्तर या ऑक्सीजन कन्संट्रेटर से दिया जा सकता है।ी एयरलाइनें पोर्टेबल ऑक्सीजन कंसंट्रेटर को यात्रा के दौरान साथ ले जाने की अनुमति देती हैं, मगर इसके लिए डॉक्टर के पर्चे की जरूरत होती है।

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