परोपकारी का दिल बड़ा होता है

चेन्नई/दक्षिण भारत। यहां जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में वेपेरी स्थित जय वाटिका में चातुर्मासार्थ विराजित श्री जयधुरंधर मुनिजी ने श्रावक का 20वां गुण परोपकार का वर्णन करते हुए कहा कि इस संसार में अपना पेट भरने के लिए वैसे तो कुत्ते, बिल्ली, कौवे आदि सभी पशु-पक्षी प्रयत्न करते ही है। अपने लिए तो सभी जीते हैं। जीना उसी का सार्थक है, जो दूसरों के लिए जिए। शुभ कार्य करते हुए परोपकार के कर्म करते हुए जिए। जहां परोपकार की महक हृदय में उतर जाती है, वहां व्यक्ति को दूसरों के सुख में ही अपना सुख नजर आता है। वह दूसरों की भलाई के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर करने में तनिक भी सोचते नहीं। उन्हें परोपकार में जो आनंद आता है, वह व्यक्तिगत उपभोग में कभी भी प्राप्त नहीं होता। वास्तव में दूसरों के लिए अपने जीवन को लगाना ही परोपकार है। दूसरों का भला करने में जो आनंद है, वह दूसरे सब आनंद से कहीं बढ़कर है। परोपकार एक तरह से अपना ही उपकार है। परोपकार में ही सच्ची मानवता छिपी हुई है। प्रकृति के विशाल दृश्य को देखेंगे तो सर्वत्र परोपकार की वृद्धि के ही दर्शन होंगे। सूर्य, चंद्रमा, नदी, पर्वत, वृक्ष आदि सभी प्रकार में तल्लीन है। मानव को अपनी प्राप्त साधनों का प्रयोग परोपकार में सदुपयोग करना चाहिए। हर व्यक्ति लाभ जाता है, पर उसके लिए उससे लाभ का उल्टा भला करना होगा। दूसरों को भला करने में ही स्वयं की भलाई हैं।
परोपकार करने के लिए व्यक्ति को बड़ा होना जरूरी नहीं है, व्यक्ति का दिल बड़ा होना जरूरी है। परोपकार मात्र धन से ही नहीं किया जाता है, तन से और मन से भी परोपकार किया जा सकता है। तन से किसी बाल, रोगी, वृद्ध, तपस्वी, जरूरतमंद की सेवा करना, शरीर के श्रम दान द्वारा जनता की भलाई करना तन से परोपकार है। मन से विश्‍व कल्याण की और प्राणी मात्र की भलाई की बात सोचना, चिंतन करना मन का परोपकार है। किसी को धन देकर उसका भला किया जा सकता है, तो कभी-कभी अपना अमूल्य समय देकर भी दूसरों का भला किया जा सकता है। परोपकार में कोई सीमाएं, रेखाएं नहीं खींची जाती, साइन बोर्ड या लेबल देकर काम नहीं किया जाता है। वह तो व्यक्ति के हृदय की विशालता, उदारता का फल है। अगर किसी के पास दूसरों की मदद करने की स्थिति एवं शक्ति है तो जहां तक हो सके उस समय उनकी मदद करनी चाहिए। कुछ लोगों के हृदय में धन प्राप्त पदार्थ के प्रति ममत्व एवं आसक्ति की भावना इतनी प्रबल रहती है कि वह सक्षम होते हुए भी परमार्थ सलंग्न नहीं हो पाते हैं। पर का उपकार करने के लिए कभी भी मना नहीं करना चाहिए। अगर किसी को मदद करने का अवसर मिले तो उस समय उसे प्रसन्न होना चाहिए और बोझ नहीं समझना चाहिए।
इसके पूर्व प्रातःकाल की वेला में समणी श्रुतनिधि एवं सुधननिधि द्वारा जैन अणुप्पेहा ध्यान योग साधना शिविर के समापन दिवस पर सभी चार चरण का अभ्यास कराया गया। मुनिवृंद के सान्निध्य में 10 नवम्बर को विदाई समारोह एवं कृतज्ञता ज्ञापन समारोह, 11 नवम्बर को चातुर्मास समापन, 12 को लोकाशाह जयंती एवं 13 को चातुर्मास उपरांत प्रथम विहार बिन्नी मिल होगा और वहीं पर 14 नवम्बर को आचार्य सम्राट जयमल महाराज का दीक्षा दिवस मनाया जायेगा।