सभी के लिए उपयोगी और हितकर समाचार को ही प्रसारित करना चाहिए

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के कुम्बलगुड स्थित महाश्रमण समवशरण में आचार्यश्री महाश्रमणजी ने अपने मंगल प्रवचन में रायपसेणियं ग्रंथ से उद्बोधित करते हुए कहा कि परदेसी राजा के बीच शरीर और आत्मा के भिन्नता-अभिन्नता और नास्तिकवाद – आस्तिकवाद विषय के बारे में विस्तार से बताया। आचार्यश्री ने जैन तेरापंथ न्यूज के पांचवें राष्ट्रीय अधिवेशन पर उपस्थित संभागियों को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन में प्रामाणिकता का महत्व होता है और मीडिया के क्षेत्र में काम करने वाले सभी व्यक्तियों को न्यूज़ की प्रामाणिकता को ध्यान में रखकर उसको प्रसारित करना चाहिए। आचार्य प्रवर ने समाचारों के तीन प्रकार उपयोगी, अनुपयोगी और दुरुपयोगी बताते हुए कहा कि दुरुपयोगी तो किसी भी हालत में प्रसारित नहीं करना चाहिए और अनुपयोगी भी से संभवत: बचना चाहिए्। केवल उसी समाचार को प्रसारित करना चाहिए जो सभी के लिए उपयोगी और हितकर हो। कोई भी समाचार प्रसारित करने से पहले उसकी प्रमाणिकता की अवश्य जानकारी कर लेनी चाहिए।
साध्वीवर्या संबद्धयशाजी ने अपने प्रवचन में सम्यकत्व के चतुर्थ लक्षण अनुकंपा के विषय में कहा कि प्राणी मात्र के प्रति दया का भाव अनुकंपा होती है और इससे धर्म का बीज फलवान होता है। अनुकंपा दो प्रकार होती है प्रथम सावद्ध अनुकंपा जिसके अन्तर्गत प्राण रक्षक मूलक दया, किसी की रक्षा करना, सेवा करना, सामाजिक कार्य करना आदि आते हैं् और निरबद्ध अनुकंपा के बारे में बताते हुए कहा कि पाप आचरण से आत्मरक्षा करना सम्यक ज्ञान, दर्शन, चरित्र वृद्धि में सहयोग करना इसके अंतर्गत आते हैं्। सांवरिया ने लौकिक और लौकोतर कार्यों के बारे में भी श्रावकों को विस्तृत जानकारी दी। आचार्य महाश्रमण चातुर्मास प्रवास व्यवस्था समिति की तरफ से कृतज्ञता ज्ञापन करने के क्रम में संजय धारीवाल, शांति सकलेचा, विजयसिंह भुतोड़िया, संपत चावत, शांतिलाल बोराणा, सज्जन पीतलिया, कांतिलाल पिपाड़ा ने अपनी भावाभिव्यक्ति दी। हिमांशु कोठारी ने अपने विचार व्यक्त किए एवं प्रवास व्यवस्था समिति के तरफ से उनका सम्मान भी किया गया।