आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में पर्युषण का हुआ आध्यात्मिक आगाज

पहले दिन मनाया गया खाद्य संयम दिवस

बेंगलूरु/दक्षिण भारत
जैन धर्म के पर्वाधिराज पर्युषण का आध्यात्मिक आगाज मंगलवार को जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान आचार्यश्री महाश्रमणजी की पावन निश्रा में कुम्बलगुड स्थित महाश्रमण समवणशरण में हुआ। इस महापर्व का प्रथम दिन ‘खाद्य संयम दिवस’ के रूप में आयोजित हुआ। मुख्यनियोजिका साध्वी विश्रुतविभाजी ने श्रद्धालुओं को पर्युषण पर्व के महत्त्व के बारे में जानकारी की। खाद्य संयम दिवस’ से संबंधित गीत का गान साध्वीश्री ज्योतियशाजी द्वारा किया गया। तेरापंथ धर्मसंघ की साध्वीप्रमुखाजी कनकप्रभाजी ने श्रद्धालुओं को खाद्य संयम के संदर्भ में संबोधित करते हुए कहा कि पर्युषण पर्व की यात्रा मानव को आत्मा तक पहुंचाने वाली है। पूर्वकृत कर्मों का क्षय करने के लिए शरीर को धारण करना होता है। शरीर को धारण करने के लिए शरीर की आवश्यकताओं की भी पूर्ति करनी होती है। शरीर के लिए आदमी को भोजन, वस्त्र आदि की आवश्यकता होती है। जीवन जीने के लिए भोजन की आवश्यकता होती है। भोजन में विवेक रखने का प्रयास करना चाहिए्। विवेक के बिना किया हुआ भोजन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होता है। जिह्वा को जंक फूड और फास्ट फूड के स्वाद से निकालकर उसके गले में अस्वाद की घंटी को बांधने का प्रयास करना चाहिए्। साध्वीप्रमुखाजी ने कहा, भोजन को हितकर, मितकर और सात्विक होना चाहिए्। आचार्यश्री के प्रवचन से प्रेरणा लेकर आदमी को भोजन का संयम करने का प्रयास करना चाहिए्।


तेरापंथ धर्मसंघ के चतुर्थ आचार्य श्रीमज्जयाचार्य के महाप्रयाण दिवस के अवसर पर मुख्यमुनि महावीरकुमारजी ने मधुर स्वर में गीत का संगान कर अपनी भावांजलि अर्पित की। साध्वीश्री संबुद्धयशाजी ने श्रीमज्जयाचार्यजी के जीवन पर प्रकाश डाला। पर्युषण के पावन अवसर पर आचार्यश्री महाश्रमणजी ने उपस्थित विशाल जनमेदिनी को संबोधित करते हुए कहा कि भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ एक सुन्दर विषय है। इस महापर्व पर भगवान महावीर की इस यात्रा को विस्तार से जानने के लिए आत्मवाद को भी जानने की आवश्यकता है। दुनिया में दो तत्त्व हैं-जड़ और चेतन। इन दोनों के अलावा जीवन में कुछ भी नहीं्। जिसमें उपयोग हो, व्यापार हो चेतन और जिसमें ये नहीं वह जड़ होता है। आत्मा अनादि है। आत्मा का विनाश नहीं हो सकता। आत्मा शाश्वत अस्तित्व होता है। आत्मा का पर्याय परिवर्तन होता है। अध्यात्म जगत में आत्मवाद का सिद्धांत है। आत्मवाद और कर्मवाद पर पुनर्जन्मवाद टिका हुआ है। भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ को इन्हीं सिद्धांतों के आलोक में विवेचित किया गया है। भगवान महावीर वर्तमान अवसर्पिणी के अंतिम तीर्थंकर थे। हम उनके शासनकाल में साधना कर रहे हैं्। वे परम सात्विक पुरुष थे। उनका यह जीवन पूर्वजन्मों की साधना पर टिका हुआ है। उनके पूर्व भव को जानने से कर्मवाद की पुष्टि भी हो सकती है।
आचार्यश्री ने चतुर्थ आचार्य श्रीमज्जयाचार्य को तेरापंथ की दूसरी शताब्दी का सूत्रधार बताया। वह अध्यात्मवेत्ता, तत्त्ववेत्ता और विधिवेत्ता थे। उनका आज के दिन हम श्रद्धा के साथ स्मरण करते हैं। आचार्यश्री ने खाद्य संयम दिवस’ के संदर्भ में भी श्रद्धालुओं को खाने में संयम रखने की प्रेरणा प्रदान की। कार्यक्रम का संचालन मुनिश्री दिनेशकुमारजी ने किया। मुख्य प्रवचन से पूर्व मुनि रजनीशकुमारजी ने श्रद्धालुओं को प्रेरित किया तो मुनि अनुशासनकुमारजी ने उत्तराध्ययन सूत्र का वाचन किया।