विश्‍व कल्याण की भावना के बिना स्वयं का कल्याण संभव नहीं

नवकार कलश अनुष्ठान करते हुए आराधक

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के गणेश बाग में चार्तुमास हेतु विराजित उपाध्यायश्री प्रवीणऋषिजी म. सा. ने अपने प्रवचन में कहा कि केवल उँचाई से काम नहीं चलता है, विस्तार भी चाहिए। उँचाई और विस्तार का जब संगम होगा तब जाकर कोई चेतना जगत कल्याण, समृद्धि और सुरक्षा की कामना कर सकती है लेकिन हमारी सोच केवल स्वयं पर ही टिकी हुई है। सारा ध्यान स्वयं के कल्याण, समृद्धि और सुरक्षा की ओर लगा हुआ है। इसी सोच के कारण हम स्वयं दरिद्र बनते जा रहे हैं और दूसरों के लिए भी समस्या खड़ी करते जा रहे हैं। निरंतर ग्लोबल वार्मिंग की समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है। भौतिक संसाधनों के उपयोग से तात्कालिक सुख तो प्राप्त हो सकता है लेकिन स्थायी शांति नहीं मिल सकती। दूषित पर्यावरण के गंभीर परिणाम सामने आ रहे हैं। हम जितने ज्यादा स्वयं सुख भोगी होते जाएंगे वैसे-वैसे कांटे के समान बनते जाएंगे, जिसका परिणाम ही चुभना और टूटना होता है। अपने जीवन में इससे बाहर निकलना ही होगा। जैसे ही हमारे अंदर जगत कल्याण की भावना का जन्म होता है वैसे ही हम फूल के समान बढ़ते चले जाते हैं और जगत को सुगंध प्रदान करते हैं। यही फूल बनने की कला हमें सीखनी है इसलिए बिना जगत का कल्याण, समृद्धि और सुरक्षा किए स्वयं का कल्याण नहीं हो सकता है।
परमात्मा ने कहा कि जगत कल्याणक बनो और यही सोच जैन दर्शन और धर्म की रही है। परमात्मा ने विश्‍व के प्राणी मात्र के प्रति मैत्री भाव रखते हुए कल्याण की कामना की है। हमें नित नया सीखने का प्रयास करना चाहिए। यह तब ही होगा जब हम स्वयं के साथ प्रतियोगिता करेंगे कि जो आज किया है उससे अधिक आगे जाने का दूसरे दिन प्रयास करेंगे। जैसे-जैसे स्वयं के साथ प्रतियोगिता करेंगे तो बोरियत महसूस नहीं होगी और असीम आनंद का अनुभव होगा।
उपाध्याय प्रवर के सान्निध्य में नवकार कलश अनुष्ठान की आराधना संपन्न हुई। लगभग 55 परिवारों ने नवकार कलश के माध्यम से घर-घर में पंच परमेष्ठि की स्थापना की एवं नवकार मंत्र की महिमा का गान किया। त्रिदिवसीय मिरर मेडिटेशन ध्यान शिविर प्रारंभ हुआ। दोपहर में कैंसर जागरूकता पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन हुआ। विशेषज्ञ डॉक्टरों द्वारा मार्गदर्शन किया गया।