संस्कारों के बिना जीवन अधूरा

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ अक्कीपेट में चातुर्मासार्थ विराजमान श्री ज्ञानमुनिजी ने अपने प्रवचन में कहा कि बाल्यावस्था कच्ची मिट्टी के समान होती है जिसे जिस रूप में ढालना चाहें, ढाल सकते हैं्। जिस प्रकार से खेत में नरम मिट्टी में जो भी बीज डाला जाए वह पल्लवित हो जाता है, उसी प्रकार बचपन की अवस्था में जो वातावरण मिलता है वह पुष्पित पल्लवित हो जाता है। संस्कारों के बिना जीवन अधूरा है। संस्कार एक ऐसी ज्योति है जो भटकते हुए जीवन को सत्पथ पर बढ़ाने का प्रकाश देती है । बाल्यावस्था में जो संस्कार दिए जाते हैं वह जीवन भर उपयोगी होते हैं। बालक देश का भविष्य है और यह बालक जितने संस्कारवान एवं विवेकवान होंगे उतना ही हमारा देश प्रगति के पथ पर आगे बढेगा। उतना ही हमारा देश सुखी एवं समृद्ध होगा एवं सशक्त होगा। उन्होंने जिनवाणी का महत्व बताते हुए कहा कि जिनवाणी भवसागर से पार कराती हैं। संसार में जन्म जरा, रोग, मरण आदि अनेकानेक दुख है। जिनवाणी के सिद्धांतों को जीवन में अपनाकर साधना द्वारा अपने पिछले सभी पाप कर्मों का नाश करके सदा सदा के लिए जन्म मरण के चक्र से मुक्ति प्राप्त की जा सकती है। धर्म आराधना इस जीवन में भी सुखदाई है और आगामी जन्म जन्मांतर को भी धन्य बना देती है । प्रारंभ में लोकेश मुनि ने भी प्रेरक उद्गार व्यक्त किए्। इस अवसर पर साध्वी पुनीत ज्योतिजी की भी उपस्थिति रही।