जीवन में ज्ञान-दर्शन-चरित्र का दीप प्रज्वलित करते रहें

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। यहां के वीवीपुरम स्थित महावीर धर्मशाला में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी डॉ कुमुदलताजी म.सा.ने कहा कि व्यक्तित्त्व का विकास चरित्र से होता है और चरित्र से ही मनुष्य की पहचान होती है। इसलिए चरित्र-निर्माण सबके लिए महत्वपूर्ण है। जैन दर्शन में सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र को त्रिरत्न के नाम से संबोधित किया है। यही मोक्ष का मार्ग है । उन्होंने मॉं सरस्वती के चिन्हों पर रहे संदेशों को प्रकट करते हुए कहा कि मॉं सरस्वती के हाथ में रहा सफ़ेद पुष्प व्यक्ति के जीवन को सुगंधित बनाता है। मॉं सरस्वती के हाथ में धारण की हुई वीणा साधक के ध्यान को केंद्रित करने का, उनके हाथ में धारण की हुई पुस्तक व्यक्ति के जीवन में सम्यक् ज्ञान की पवित्रता का प्रतीक है। मॉं सरस्वती के हाथ की माला मन को पवित्र, निर्मल बनाने का और अपने मन को परमात्मा की साधना से जोड़ने को संदेश देती है।
उन्होंने कथानक के माध्यम से बताया कि व्यक्ति को अहंकार का त्याग कर जीवन में नम्र बनना चाहिए तथा दान, सेवा व परोपकार के कार्य करते रहना चाहिए। इस जीवन में जागरूक होकर धर्म आराधना करते हुए इसे सफल सार्थक बनाना चाहिए्। शांति, अहिंसा, भाईचारा, नैतिक चरित्र और त्याग के द्वारा ही कल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है इसीलिए जीवन में ज्ञान, दर्शन, चरित्र का दीप प्रज्वलित करते रहें।
साध्वी पद्मकीर्तिजी ने कहा कि नदी से नदी मिलती है तो सागर बन जाता है। फूलों से फूल मिलते हैं तो गुलदस्ता, धागे से धागा जुड़ता है तो वस्त्र बन जाता है , मोती से मोती जुड़ते हैं तो माला बन जाती है , वैसे ही युवा शक्ति सारे वातावरण को ऊर्जामय बना देती हैं। उन्होंने चेन्नई से आए नवयुवक मंडल के युवाओं की गत वर्ष की चातुर्मास सेवाओं की अनुमोदना करते हुए उनके योगदान को सराहनीय बताया। साध्वीश्री महाप्रज्ञाजी ने स्तवन की प्रस्तुति दी। रविवार को साध्वीवृंद के सान्निध्य में गणेशीलालजी की 140 वीं जयंती एवं बाल संस्कार शिविर का समापन समारोह आयोजित किया गया है। शनिवार को मुंबई, सूरत, चेन्नई, कालहस्ती व अन्य नगरों से आए हुए अतिथियों का वर्षावास समिति के गुलाबचंद पगारिया, नथमल मुथा, रमेशचंद सिसोदिया, ज्ञानचंद मुथा, उगमराज कांटेड़ व अन्य पदाधिकारियों ने स्वागत किया। धर्म सभा का संचालन महामंत्री चेतन दरड़ा ने किया। आभार अशोक रांका ने जताया।