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                <title>धर्म/आस्था - Dakshin Bharat Rashtramat</title>
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                <description>धर्म/आस्था RSS Feed</description>
                
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                <title>हाथ जोड़कर अपनी ओर आकर्षित करता है 'नमो घाट'</title>
                                    <description><![CDATA[नमस्कार प्रतिमा वाला नमो घाट]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76143/namo-ghat-attracts-you-with-folded-hands"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-03/banaras1.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:center;"><strong>.. देवेंद्र शर्मा ..</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बनारस/दक्षिण भारत।</strong> नमो घाट बनारस की प्राचीन आध्यात्मिकता और आधुनिक वास्तुकला का एक अद्भुत मिश्रण है। नमो घाट सुबह की सैर और शाम के खूबसूरत नज़ारों के लिए बेहतरीन जगह है। यहॉं से गंगा नदी का बहुत ही शानदार दृश्य दिखाई देता है, साथ ही ओवर रेलब्रिज व रोडब्रिज इसकी खूबसूरती को चार चांद लगा देते हैं। यह घाट आदि केशव घाट के पास स्थित है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2018 में नमो घाट परियोजना की आधारशिला रखी थी। यह घाट 21,000 वर्ग मीटर क्षेत्र में फैला हुआ है। यह आधुनिक सुविधाओं से युक्त घाट है, जिसमें पर्यटकों के लिए एक दर्शन दीर्घा (व्यूइंग) डेक, एक कैफेटेरिया और एक पार्किंग स्थल जैसी सुविधाएं बनाई गई हैं। इस घाट का मुख्य आकर्षण तीन विशाल मूर्तियां हैं जो हाथ जोड़कर ’नमस्ते’ का भाव दर्शाती हैं, जो अतिथि देवो भवः के विचार को भी प्रदर्शित करती हैं। यहॉं नमो घाट पर गंगा की ओर झुकते हुए नमस्ते की मुद्रा में कई विशाल प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं, जो आगंतुकों का स्वागत करती नजर आती हैं। </p>
<p style="text-align:justify;"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/2026-03/banaras2.jpg" alt="banaras2" width="819" height="443"></img></p>
<p style="text-align:center;"><em>(पानी पर तैरता सीएनजी स्टेशन)</em></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>गंगा नदी में प्रदूषण को कम करता हुआ ‘पहला तैरता सीएनजी स्टेशन’</strong></p>
<p style="text-align:justify;">वैसे तो बनारस आध्यात्मिकता, धर्म, संस्कार व बाबा भोलेनाथ का शहर है, परन्तु इन दिनों हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लोकसभा क्षेत्र होने के कारण यह नवाचारों का केन्द्र बन गया है।बनारस एक ऐसा शहर बन गया है जहां आधुनिकता अब आध्यात्मिकता के साथ कंधे से कंधा मिलकर चल रही है। उसी नवाचार में सबसे नया नवाचार है मां गंगा की निच्छल लहरों पर तैरता प्राकृतिक गैस ‘सीएनजी’ स्टेशन। वाराणसी में दुनिया का पहला फ्लोटिंग सीएनजी स्टेशन हैं, जिसे गेल इंडिया लिमिटेड ने गंगा नदी में प्रदूषण कम करने के लिए बनाया है। नमो घाट और रविदास घाट पर मौजूद इस तरह के तैरते सीएनजी स्टेशन लगभग 17.5 करोड़ रुपए की लागत से बनाए गए हैं। इन तैरते सीएनजी स्टेशनों पर 900+ से ज़्यादा, सीएनजी प्रणाली में बदली हुई नावों को सीएनजी ईंधन दिया जाता हैं, जिससे हवा और आवाज़ के प्रदूषण में काफ़ी कमी आई है। जानकारी के अनुसार पहला सीएनजी स्टेशन नमो घाट (पहले खिरकिया घाट कहलाता था) पर है और दूसरा रविदास घाट पर है। हर स्टेशन रोज़ाना 300-400 नावों को भर सकता है, जिनकी क्षमता 4,000-5,000 किलोग्राम प्रति दिन है। इस प्रोजेक्ट में नावों के लिए मुफ़्त सीएनजी किट इंस्टॉलेशन की सुविधा भी है। गेल इंडिया लिमिटेड ने एक्वाफ्रंट इंफ्रास्ट्रक्चर प्राइवेट लिमिटेड के साथ मिलकर इन स्टेशनों को बनाया है। </p>
<p><img style="margin-left:auto;margin-right:auto;" src="https://www.dakshinbharat.com/media/2026-03/banaras3.jpg" alt="banaras3" width="333" height="442"></img></p>
<p style="text-align:center;"><em>(अस्सी घाट पर गंगा आरती का मनोरम दृश्य)</em></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बनारस यात्रा को पूर्णता प्रदान करती है अस्सी घाट की ‘गंगा आरती’</strong></p>
<p style="text-align:justify;">बनारस तो घाटों की ही नगरी है। नमो घाट से घाटों की शुरुआत होती है और लगभग अस्सी घाट तक जाते जाते यह घाट श्रृंखला समाप्त हो जाती है।वाराणसी में अस्सी घाट, गंगा और असि नदी का संगम स्थल है, जो अपनी सुप्रसिद्ध सुबहा-ए-बनारस (सुबह की आरती) के लिए जाना जाता है। यह आरती सुबह लगभग 5 बजे (सूर्योदय) के आसपास मंत्रोच्चार और शंखनाद के साथ होती है, जो आध्यात्मिक शांति प्रदान करती है। यहॉं नाव से आरती देखना एक अनोखा अनुभव है। पत्र सूचना कार्यालय(पीआईबी) बेंगलूरु की सहायक निदेशक करिश्मा पंत के नेतृत्व में कर्नाटक से लगभग 10 पत्रकारों के दल ने अस्सी घाट का दौरा किया तथा जानकारियां प्राप्त की। काशी के पांच प्रमुख तीर्थ स्थलों में से अस्सी घाट में, स्नान अनिवार्य माना जाता है। अस्सी घाट पर्यटकों के लिए एक शांत और सांस्कृतिक केंद्र है, जो दशाश्वमेध घाट की तुलना में कम भीड़भाड़ वाला है। शाम ढलते ही अस्सी घाट का दृश्य अत्यंत मनोहारी और आध्यात्मिक हो जाता है। शाम को लगभग 6.30 बजे से गंगा आरती के आरंभ होते ही घाट के वातावरण में श्रद्धा, शांति और पवित्रता की विशेष अनुभूति होने लगती है। श्रद्धालुओं द्वारा नदी के किनारे दीप प्रज्वलित किए जाते हैं, जबकि विशेष पुजारियों द्वारा गंगा तट पर एक तय प्लेटफार्म पर पारंपरिक, धार्मिक रूप में विशेष शैली में गंगा माता की आरती की जाती है। मंत्रोच्चार व शुद्धिकरण के साथ शुरु होने वाली गंगा आरती जैसे जैसे आगे बढ़ती है, श्रद्धालुओं में अद्भुत उर्जा भरने वाली बनती जाती है। आरती के दौरान घाट पर उपस्थित श्रद्धालुओं की भीड़ भक्ति में झूम उठती है और पूरा वातावरण आध्यात्मिकता से सराबोर हो जाता है। आरती के दौरान सुनाई देने वाली घंटियों की ध्वनि, मंत्रोच्चार और भजन पूरे वातावरण को आध्यात्मिक भाव में डुबो देते हैं। गंगा के किनारे जलते हुए दीपकों की रोशनी व पंडितों द्वारा की जाने वाली गंगा आरती मानव मन में एक अनुपम स्फूर्ति का संचार करती है। बनारस में काशी विश्‍वनाथ के दर्शन से शुरु होने वाली धार्मिक यात्रा शाम को गंगा आरती से ही पूर्ण होती है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 10 Mar 2026 09:58:40 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>सारनाथ: जहां आज भी गौतम बुद्ध के 'पहले प्रवचन’ की सुनाई देती है गूंज</title>
                                    <description><![CDATA[(बाएं) संग्रहालय में रखा अशोक स्तंभ का चार मुख वाला सिंह शीर्ष। (दाएं) सारनाथ में धमेक स्तूप एवं अन्य स्मारक।]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76141/sarnath-where-even-today-the-echo-of-gautam-buddhas-first"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-03/varanasi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:center;"><strong>.. देवेंद्र शर्मा ..</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बनारस/दक्षिण भारत। </strong>उत्तर प्रदेश के बनारस शहर से लगभग 13 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में स्थित है सारनाथ। सारनाथ दुनिया के सबसे ज़रूरी बौद्ध तीर्थ स्थलों में से एक है, क्योंकि यह वह जगह है जहॉं गौतम बुद्ध ने ज्ञान पाने के बाद अपना पहला उपदेश दिया था, उस स्थल को ’धर्मचक्र प्रवर्तन स्तूप’ (धमेक) के नाम से जाना जाता है। सारनाथ बौद्ध कला, वास्तुशिल्प व पाषाणकला के क्षेत्र में बहुत ही मशहूर है, जिसमें धमेक स्तूप और अशोक स्तंभ शामिल हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">सारनाथ का एक लंबा और समृद्ध इतिहास है, जो छठी सदी का है। यह प्राचीन भारत में व्यापार और उद्योग का एक बड़ा सेंटर था, जो गंगा नदी के किनारे बसा था और उस समय एक बड़ा परिवहन का रास्ता था। 528 बीसी ईसा में बुद्ध पहली बार सारनाथ आए थे और अपने पांच शिष्यों को अपना पहला उपदेश दिया, जिसे 'डीयर पार्क प्रवचन’ के नाम से जाना जाता है। बुद्ध ने चार आर्य सत्य सिखाए, जो बौद्ध धर्म की नींव बने और अष्टांगिक मार्ग जो ज्ञान का मार्ग है। सारनाथ बौद्ध शिक्षा और संस्कृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया और वहां कई मठ और मंदिर बनाए गए। माना जाता है कि तीसरी शताब्दी बीसी ईसा में मौर्य सम्राट अशोक सारनाथ आए और उन्होंने मशहूर अशोक स्तंभ बनवाया, जिस पर एक ऐसा शिलालेख है जो अहिंसा और धार्मिक सहनशीलता को बढ़ावा देता है। 7वीं शताब्दी बीसीईसा में, सारनाथ पर मुस्लिम आक्रंताओं ने कब्ज़ा कर लिया और सारनाथ को नष्ट कर दिया और पूरे स्थल को तहस नहस कर दिया। पुराने शहर के ये खंडहर बाद में 19वीं शताब्दी में ब्रिटिश आर्कियोलॉजिस्ट द्वारा पुन: खोजा गया और खुदाई में अनेक मूर्तियॉं, स्तंभों के अवशेष, प्राचीन शिलालेख और पत्थर की उत्कृष्ट कारीगरी मिली। आज सारनाथ बौद्ध धर्म को मानने वालों और दूसरे पर्यटकों व यात्रियों के लिए एक ब़ड़ा पर्यटन स्थल बन गया है।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बुद्ध के पहले प्रवचन का साक्षी है धमेक स्तूप </strong></p>
<p style="text-align:justify;">धमेक स्तूप, जो 5वीं सदी बीसी का है, सारनाथ की सबसे मशहूर जगहों में से एक है, और माना जाता है कि यह वह जगह है जहॉं बुद्ध ने अपना पहला उपदेश दिया था। लगभग 43 मीटर ऊँचा और मजबूत पत्थरों से निर्मित यह धमेक स्तूप बौद्ध धर्म के पवित्रतम स्थलों में गिना जाता है। इसके निचले हिस्से पर बनी हुई बारीक पत्थर की नक्काशी और ज्यामितिय डिज़ाइन प्राचीन भारतीय वास्तुकला का शानदार उदाहरण  है। कहा जाता है कि सम्राट अशोक ने इस स्तूप में गौतम बुद्ध की अस्थियां रखी थीं। सारनाथ की दूसरी खास जगहों में मूलगंध कुटी विहार शामिल है, जो 20वीं सदी में बना एक मॉडर्न बौद्ध मंदिर है, सारनाथ म्यूज़ियम, जिसमें बौद्ध कलाकृतियों और वास्तु कला का एक बड़ा कलेक्शन है और चौखंडी स्तूप बहुत प्रसिद्ध है।</p>
<p style="text-align:justify;">पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) बेंगलूरु की सहायक निदेशक करिश्मा पंत के नेतृत्व में कर्नाटक से लगभग 10 मीडिया हाउस के प्रतिनिधियों ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अंतर्गत आने वाले सारनाथ संग्रहालय का अवलोकन किया। संग्रहालय में मौजूद गाइड ने प्रतिनिधिमंडल को बताया कि सारनाथ का पुरातात्त्विक संग्रहालय भारत के सबसे प्राचीन और महत्वपूर्ण संग्रहालयों में से एक है। यहॉं मौर्य, कुषाण और प्राचीन काल की अनेक दुर्लभ ऐतिहासिक धरोहरें सुरक्षित हैं, जो इस क्षेत्र की हजारों वर्ष पुरानी सभ्यता और धार्मिक इतिहास को दर्शाती हैं। संग्रहालय में बौद्ध धर्म से संबंधित अनेकों नमूने देखे जा सकते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;"><strong>भारत गणराज्य का 'आधिकारिक राष्ट्रीय प्रतीक’ स्थापित है सारनाथ में </strong></p>
<p style="text-align:justify;">संग्रहालय की सबसे प्रमुख और अमूल्य धरोहर अशोक स्तंभ का चार मुख वाला सिंह शीर्ष शामिल है, जिसे सम्राट अशोक ने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में स्थापित कराया था। यही चार मुख वाला सिंह शीर्ष चिह्न आज भारत गणराज्य का ’आधिकारिक राष्ट्रीय प्रतीक’ भी है। इस ’चौमुखी सिंह मूर्ति’ में पाषाण कला, प्राकृतिक चमक और कलात्मक सौंदर्य प्राचीन भारतीय स्थापत्य और मूर्तिकला के उच्च स्तर की झलक दिखाई देती है। संग्रहालय के विभिन्न 3 गैलरियों में रखी गई बौद्ध प्रतिमाएँ और अवशेष इस बात की गवाही देते हैं कि सारनाथ सदियों तक बौद्ध धर्म के प्रमुख शैक्षणिक और धार्मिक केंद्रों में से एक रहा है। पुरातत्व विशेषज्ञों के अनुसार सारनाथ का ऐतिहासिक महत्व केवल धार्मिक दृष्टि तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत की प्राचीन सभ्यता, ललित कलाओं और स्थापत्य परंपरा का भी एक जीवंत उदाहरण है। हर भारतीय को बनारस में काशी विश्‍वनाथ मंदिर के साथ साथ सारनाथ का भी दौरा अवश्य करना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                    

                <link>https://www.dakshinbharat.com/article/76141/sarnath-where-even-today-the-echo-of-gautam-buddhas-first</link>
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                <pubDate>Mon, 09 Mar 2026 17:21:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>‘आस्था, आध्यात्मिकता और सुशासन का पुनर्जागरण है काशी विश्वनाथ धाम’</title>
                                    <description><![CDATA[यहां भगवान शिव को विश्वनाथ या विश्वेश्वर के नाम से पुकारा जाता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76129/%E2%80%98kashi-vishwanath-dham-is-the-renaissance-of-faith-spirituality-and"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-03/temple.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:center;"><strong>देवेंद्र शर्मा बनारस यात्रा पर</strong></p>
<p style="text-align:justify;"><strong>बनारस/दक्षिण भारत। </strong>भारत के सबसे बड़े प्रदेश उत्तरप्रदेश का सबसे प्राचीन शहर ’काशी’, जिसे भगवान शंकर की नगरी कहा जाता है। काशी को बनारस, वाराणसी के नाम से भी जाना जाता है। काशी स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर हिंदू श्रद्धालुओं के लिए सबसे पवित्र स्थलों में से एक है और इसे बारह ज्योतिर्लिंगों में विशेष स्थान प्राप्त है। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है, जिन्हें यहां विश्वनाथ या विश्वेश्वर के नाम से पुकारा जाता है। उत्तरप्रदेश के प्राचीन और आध्यात्मिक नगर वाराणसी में स्थित ‘काशी विश्वनाथ धाम’ ने हाल के वर्षों में उल्लेखनीय परिवर्तन का सफर तय किया है। </p>
<p style="text-align:justify;">काशी विश्वनाथ मंदिर ट्रस्ट के सीईओ विश्‍व भूषण मिश्रा ने कर्नाटक से आए मीडिया प्रतिनिधिमंडल से संवाद करते हुए धाम परियोजना के ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने मंदिर के इतिहास के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि ऐतिहासिक संदर्भों के अनुसार वर्ष 1669 में मुगल शासक औरंगज़ेब के काल में प्राचीन मंदिर को ध्वस्त कर दिया गया था, जबकि वर्तमान संरचना का निर्माण वर्ष 1780 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने करवाया। बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने इसके शिखरों पर सोना चढ़वाकर इसे विशिष्ट पहचान प्रदान की। उन्होंने बताया कि पहले मंदिर का कुल क्षेत्रफल लगभग 3 हजार वर्गफीट तक सीमित था। मंदिर के आसपास संकरी गलियां, अत्यधिक भीड़ और मूलभूत सुविधाओं की कमी के कारण श्रद्धालुओं को कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था। सुरक्षा और प्रबंधन के क्षेत्र में भी कई चुनौतियां थीं।</p>
<p style="text-align:justify;">सीईओ मिश्रा ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में ’काशी विश्वनाथ कॉरिडोर परियोजना’ प्रारंभ की गई, जिसका मुख्य उद्देश्य मंदिर को सीधे गंगा नदी से जोड़ना और विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध कराना था। यह परियोजना न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि आधुनिक अवसंरचना, सांस्कृतिक पुनरुत्थान और सामाजिक कल्याण के समग्र मॉडल के रूप में भी उभरकर सामने आई है, जो भविष्य में अन्य धार्मिक स्थलों के लिए प्रेरणा बन सकती है। इस परियोजना के तहत मंदिर परिसर का क्षेत्रफल 3 हजार वर्ग फुट से बढ़ाकर लगभग 5 लाख वर्गफीट कर दिया गया। लगभग 400 करोड़ रुपए की लागत से पूर्ण हुई इस परियोजना में 314 संपत्तियों का अधिग्रहण किया गया तथा 1,400 लोगों का पुनर्वास किया गया। </p>
<p style="text-align:justify;">अधिकारियों के अनुसार पूरा कार्य बिना किसी न्यायिक विवाद के संपन्न हुआ। विश्‍व भूषण मिश्रा ने कहा कि काशी विश्वनाथ धाम आध्यात्मिकता और सुशासन का पुनर्जागरण है, जहां प्राचीन धार्मिक परंपरा और आधुनिक प्रशासनिक दक्षता का सुंदर समन्वय दिखाई देता है। इस नए परिसर में 27 विशेष निर्माण किए गए हैं, जिनमें यात्री सेवा केंद्र, अतिथि गृह, संग्रहालय, आध्यात्मिक पुस्तक केंद्र, जलपान केंद्र (फूड कोर्ट) तथा गंगा की ओर दर्शनीय दीर्घाएं शामिल हैं। मंदिर विस्तारीकरण के बाद श्रद्धालु क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि मद्देनजर धाम में अब एक समय में 50 हजार श्रद्धालुओं को समायोजित करने की व्यवस्था की गई है। सुरक्षा के लिए 300 सीसीटीवी कैमरे, आधुनिक बैगेज स्कैनर तथा बहु-एजेंसी सुरक्षा व्यवस्था तैनात है, जिसमें उत्तर प्रदेश पुलिस, सीआरपीएफ, एनडीआरएफ, पीएसी और निजी सुरक्षा कर्मी शामिल हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग के माध्यम से भीड़ प्रबंधन को और अधिक प्रभावी बनाया जा रहा है।</p>
<p style="text-align:justify;">धाम की धार्मिक गतिविधियों की जानकारी देते हुए मिश्रा ने कहा कि मंदिर में प्रतिदिन पांच बार आरतियां होती हैं-मंगला आरती, भोग आरती, सप्तऋषि आरती, श्रृंगार आरती और शयन आरती। इसके अतिरिक्त प्रदोष, पूर्णिमा, मास शिवरात्रि और अन्य धार्मिक आयोजन भी नियमित रूप से आयोजित किए जाते हैं। शंकराचार्य चौक स्थित सेवार्चनम मंच पर स्थानीय और राष्ट्रीय कलाकार सनातन परंपरागत कलाओं की प्रस्तुति देते हैं। ‘संवर्धन’ पहल के अंतर्गत संस्कृत विद्यालयों को सहयोग, विद्यार्थियों को गणवेश एवं वैदिक शिक्षा सामग्री उपलब्ध कराई जा रही है तथा डीबीटी प्रणाली के माध्यम से पारदर्शी वित्तीय सहायता प्रदान की जा रही है। उन्होंने मंदिर की नई पहल ‘संस्कृति के अदला-बदली’ के तहत धाम की ओर से आसपास के मंदिरों को भेजे जाने वाले श्रृंगार व आवश्यक सामग्री के बारे में जानकारी दी। </p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने बताया कि श्रृंगारमेल, संगम तीर्थ आदि अन्य नवाचार भी गतिमान है जिसके तहत धाम विभिन्न तीर्थों में संगम तीर्थ भेजने की व्यवस्था करता है। उन्होंने बताया कि धाम ट्रस्ट का प्रयास रहता है कि पूरा तीर्थ ’प्लास्टिक फ्री’ हो। उन्होंने काशी धाम के बारे में विभिन्न जानकारी दी तथा मीडिया प्रतिनिधिमंडल को मंदिर प्रांगण का अवलोकन कराया। </p>
<p style="text-align:justify;">इस अवसर पर पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) बेंगलूरु की सहायक निदेशक करिश्मा पंत,बनारस पीआईबी के प्रशांत कक्कड़ आदि अनेक अधिकारी उपस्थित थे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 07 Mar 2026 09:50:47 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
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                <title>जयकारों के साथ कोलसिया से खाटूधाम के लिए रवाना हुई पदयात्रा</title>
                                    <description><![CDATA[कोलसिया के श्याम बाबा मंदिर में उपस्थित भक्त]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76079/padyatra-left-from-kolsia-for-khatudham-with-cheers"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-02/kolsiya-se-khatu.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नवलगढ़/दक्षिण भारत।</strong> झुंझुनूं जिले के कोलसिया गांव से सोमवार को खाटूधाम के लिए पदयात्रा रवाना हुई। इस अवसर पर श्यामभक्तों ने बाबा की झांकी सजाई और जयकारे लगाए। उन्होंने श्याम ध्वजा का पूजन किया और बाबा की ज्योति ली। </p>
<p style="text-align:justify;">श्यामभक्त ओम प्रकाश शर्मा (ढाणी मझाऊ) और सीताराम शर्मा ने बताया कि वर्ष 1997 से हर साल खाटू श्यामजी के लिए यह पदयात्रा जाती है, जिसमें अनेक श्रद्धालु शामिल होते हैं। यात्रा को लेकर गांव में कई महीने पहले ही उत्साह का माहौल बन जाता है। इससे जुड़े विभिन्न कार्यों का जिम्मा श्रद्धालु संभालते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">यात्रा के रवाना होने से पहले सबको प्रसाद का वितरण किया गया। गांव से आए हुए अन्य श्रद्धालुओं ने यात्रा के लिए मंगल कामना की। </p>
<p style="text-align:justify;">इस अवसर पर गायत्री, सरोज, सोनू, भगवती प्रसाद, महेश, रमाकांत, राजीव, दीपक, नेहा, हिया, राजू पारीक, मोती गुर्जर, रोहिताश, आकाश, अमित, आनंद, अनमोल, अंकुर (बड़ागांव), सुरेश, रामकुमार, मंजू, वंदना, पूजा (बाय), कोमल, निशा, मोनिका, विद्या और अनेक श्रद्धालु मौजूद थे।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 27 Feb 2026 08:56:57 +0530</pubDate>
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                <title>'केसर लगाकर मुमुक्षु लवेश सिंघवी 'संयम पथ' पर आरोहण करने के लिए तैयार'</title>
                                    <description><![CDATA['शूरवीर ही संयम के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं']]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/75930/mumukshu-lavesh-singhvi-ready-to-embark-on-the-path-of"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-01/lavesh-singhavi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बेंगलूरु/दक्षिण भारत। </strong>शहर के गुरु ज्येष्ठ पुष्कर जैन चैरिटेबल ट्रस्ट एवं आराधना केन्द्र के तत्वावधान में पंडितरत्न व्याख्यानी श्री ज्ञानमुनि जी मसा, उपप्रवर्तकश्री नरेशमुनिजी, शालिभद्रमुनिजी, लोकेशमुनिजी, उपप्रवर्तिनी सत्यप्रभाजी, सुप्रभाजी, डॉ. प्रतिभाश्रीजी, डॉ. मेघाश्रीजी, ऋद्धिश्रीजी के सान्निध्य में मुमुक्षु लवेश सिंघवी के जैनेेशरी भागवती दीक्षा महोत्सव पर शुक्रवार को पंच दिवसीय कार्यक्रमों के तहत केसर समारोह का कार्यक्रम आयोजित हुआ। </p>
<p style="text-align:justify;">इस अवसर पर बेंगलूरु के विभिन्न उपनगरों तथा बाहर गांव बड़ी संख्या में गुरु भक्तों की उपस्थिति रही। मुमुक्षु लवेश के दीक्षोत्सव प्रसंग पर आयोजित हुए केसर समारोह पर ज्ञानमुनिजी व नरेशमुनिजी सहित विभिन्न साधु-साध्वियों ने आशीर्वचन प्रदान करते हुए मुमुक्षु लवेश सिंघवी को संयम मार्ग पर आगे बढ़ने पर अपनी मंगल शुभ कामनाएं देते हुए मुमुक्षु के संयम साधना पथ पर अग्रसर होने पर मंगल अनुमोदना की। </p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने कहा कि शूरवीर ही संयम के मार्ग पर आगे बढ़ सकते हैं। संयम लेना कायरों का काम नहीं है। केसर रंग यह शूरवीरता, विजय, साहस, ओज, तेज और वीरता का प्रतीक माना गया है। कामना है कि केसर के गुणों की तरह मुमुक्षु अपने ललाट पर केसर तिलक लगाकर अपने जीवन में संयम पथिक बनकर मुक्ति की मंजिल के शिखर पर पहुंच कर अपने कर्मों पर विजय प्राप्त करें। </p>
<p style="text-align:justify;">संतों ने शुभकामनाएं देते हुए कहा कि मुमुक्षु भगवान महावीर के जिन शासन की, श्रमण संघ, गुरु पुष्कर की बगिया को महकाते हुए उत्तरोत्तर ज्ञान वृद्धि विकास करते हुए जिन शासन की महती प्रभावना करते हुए अमर ध्वजा को लहराते हुए हमेशा आगे बढ़ते रहें।</p>
<p style="text-align:justify;">इस अवसर पर साध्वीश्री चंदनप्रभाजी को भी उनके 49वें संयम दीक्षा दिवस की शुभकामनाएं दी गईं। शुक्रवार को वसंत पंचमी पर्व पर अनेक महापुरुषों के दीक्षा दिवस, स्मृति दिवस पर उन्हें याद करते हुए उनके गुण स्मरण किए गए।</p>
<p style="text-align:justify;">संपूर्ण दीक्षोत्सव के लाभार्थी भंसाली एवं रातड़िया परिवार की ओर से केसर समारोह एवं मध्याह्न में सांझी आदि के साथ सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए। सिंधनूर निवासी बम्ब परिवार एवं लाभार्थी धर्म परिवारों द्वारा प्रभावना वितरित की गई। आराधना केन्द्र के महामंत्री महावीर चंद मेहता ने बताया कि शनिवार को सुबह साढ़े आठ बजे से दीक्षार्थी मुुक्षु लवेश सिंघवी के संयम शोभायात्रा सह वर्षीदान वरघोड़ा पार्क वेस्ट क्लब हाउस से प्रारंभ होकर गुरुवन्ना देवरु मठ पहुंच कर धर्म सभा में परिवर्तित होगा। </p>
<p style="text-align:justify;">अध्यक्ष नेमीचंद सालेचा ने सबका स्वागत किया। प्रवचन कार्यक्रम का संचालन शालिभद्रमुनि जी एवं केसर समारोह का संचालन महावीरचंद मेहता ने किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 24 Jan 2026 10:24:35 +0530</pubDate>
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                <title>जीवन को हर्षमय बनाने के लिए आत्म उत्कर्ष की राह को चुनें: कपिल मुनि</title>
                                    <description><![CDATA['संकल्प ही सिद्धि का आधार है']]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/75810/to-make-life-joyful-choose-the-path-of-self-improvement"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-01/kapil-muni.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>चेन्नई/दक्षिण भारत। </strong>यहाँ मैलापुर में बाजार रोड स्थित जैन स्थानक में श्रीकपिल मुनि जी म.सा. के सान्निध्य एवं श्री वर्धमान श्वेताम्बर स्था.जैन संघ, मैलापुर के तत्वावधान में आयोजित त्रिदिवसीय आध्यात्मिक कार्यक्रम के तहत गुरुवार को सामूहिक सामायिक साधना दिवस का आयोजन किया गया। </p>
<p style="text-align:justify;">कार्यक्रम की शरुआत सुबह पञ्च परमेष्ठी और भगवान ऋषभ देव की स्तुति श्री भक्तामर स्तोत्र जप अनुष्ठान से की गयी। बड़ी संख्या में उपस्थित श्रद्धालुओं ने भगवद स्तुति के संगान से वातावरण को भक्ति रस से अनुप्राणित कर दिया। इस मौके पर कपिल मुनिजी म.सा. ने कहा कि आज सभी का मन प्रफुल्लित और उल्लसित है क्योंकि आज नया दिन है, नए साल का शुभारंभ है। मगर चिंतनीय सवाल ये है कि ये नया भी आखिरकार कब तक नया रहेगा?</p>
<p style="text-align:justify;">नया से पुराना होना दुनिया की प्रत्येक चीज की फितरत है। इस नव वर्ष के अवसर पर हम कुछ ऐसा नया करें जो कभी पुराना ही न हो। इस नव वर्ष में हम जीवन उत्कर्ष की राह पर चलने का संकल्प लें ताकि हमारा जीवन संघर्ष से मुक्त होकर हर्षमय बन जाये। संकल्प ही सिद्धि का आधार है। दुःख, द्वंद्व, दुविधा और दुर्बलता से मुक्ति तभी संभव है जब हम आत्मगुणों के उत्कर्ष के लिए अध्यात्म के मार्ग में पर चहलकदमी करेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;">मुनि श्री ने कहा कि आज हमारे जीवन में जो भी शुभ और श्रेष्ठ साकार हो रहा है वह प्रभु कृपा और गुरु कृपा का ही परिणाम है। प्रभु की वाणी से ही शुभ और अशुभ, उचित और अनुचित की समझ का वरदान प्राप्त हुआ है। गुरुजनों ने प्रभु की वाणी के रहस्य को हम तक पहुंचाने का महान अनुग्रह किया है, अतः जीवन में भगवान और गुरु भगवंतों को विस्मृत करने का अपराध कदापि न करें। अपनी दिनचर्या की शुरुआत भगवान के स्मरण के साथ करेंगे तो जीवन में कदम कदम पर मंगल ही मंगल होगा। </p>
<p style="text-align:justify;">मुनिश्री ने कहा कि व्यक्ति का अतीत कैसे भी व्यतीत हुआ हो, अगर व्यक्ति वर्तमान के प्रति सजग है तो उसके भविष्य की उज्ज्वलता से कोई भी वंचित नहीं कर सकता। मुनिश्री ने कहा कि हम नया संकल्प लेकर अपने व्यक्तिगत जीवन, समाज राष्ट्र के लिए उपयोगी बन सकते हैं। जिसके पास प्रतिपल देव गुरु और धर्म की शक्ति प्राप्त है, उसका हर पल उत्सव बन जाता है। </p>
<p style="text-align:justify;">मुनिश्री ने भक्तामर स्तोत्र जप अनुष्ठान की महता और उपयोगिता पर रोशनी डालते हुए कहा कि भक्तामर स्तोत्र भगवान ऋषभ देव की स्तुति का गान है। इस जप अनुष्ठान के प्रभाव से समस्या ग्रस्त जीवन को समाधान की राह मिलती है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस कार्यक्रम के लाभार्थी बनने का सौभाग्य हुक्मीचंद तालेड़ा परिवार ने प्राप्त किया। संघ की ओर से उनका सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन मंत्री विमलचंद खाबिया ने किया।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 02 Jan 2026 11:07:25 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>'मां चाहती थीं यश बने मॉडल, पर साधु बनकर अब ‘जेन-जी’ के लिए बनेगा रोल मॉडल'</title>
                                    <description><![CDATA[सांसारिक जीवन का त्याग कर जैन दीक्षा अंगीकार की]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/75575/mother-wanted-yash-to-become-a-model-but-now-he"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2025-11/mumukshu.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बेंगलूरु/दक्षिण भारत। </strong>रजोहरण हाथ में आते ही मुमुक्षु भव्यकुमार का चेहरा उल्लास और भावविभोरता से दमक उठा, मानो वर्षों की अंतर्यात्रा पूर्ण हो गई हो। जैन दीक्षा का प्रमुख प्रतीक और अहिंसक जीवन का महत्त्वपूर्ण उपकरण रजोहरण जैसे ही आचार्यश्री ने मुमुक्षु को प्रदान किया, पूरे वातावरण में वैराग्य का रंग चरम पर पहुँचा और हजारों श्रद्धालु भाव-विह्वल हो उठे।</p>
<p style="text-align:justify;">17 वर्षीय मुंबई निवासी मुमुक्षु भव्य शाह की दीक्षा के उपलक्ष्य में शंकरपुरम में आयोजित संसार परिहार उत्सव के अंतिम दिन आचार्यश्री अरिहंतसागर सूरीश्वरजी की निश्रा में कल्याण मित्र परिवार द्वारा भव्य दीक्षा समारोह संपन्न हुआ। इस पावन घड़ी में मुमुक्षु भव्य शाह ने सांसारिक जीवन का त्याग कर जैन दीक्षा अंगीकार की और पूर्णतया अहिंसक जीवनशैली अपनाते हुए ‘जेन-जी’ के लिए प्रेरणास्रोत बन गए।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>विधि-विधान से हुई दीक्षा पूर्व की मंगल विधियां</strong></p>
<p style="text-align:justify;">रविवार को प्रातःकालीन मंगल बेला में मुमुक्षु भव्य शाह का मण्डप में प्रवेश हुआ। लाभार्थी परिवार ने विजय तिलक कर मंगलकामना व्यक्त की। इसके बाद भगवान की आभूषण पूजा, गुरुपूजन और संघ-वर्धापन की दिव्य क्रियाएँ सम्पन्न हुईं। मुमुक्षु द्वारा समवसरण में तीन प्रदक्षिणाएँ देकर आराधना के बाद गुरुभगवंतों का मण्डप में प्रवेश हुआ।</p>
<p style="text-align:justify;">संगीत की मधुर धुनों के बीच देववंदन, गुरुवंदन, वासनिक्षेप, नंदी सूत्र श्रवण, प्रव्रज्या आदि विधियाँ सम्पन्न हुईं। जैसे ही आचार्यश्री ने अपने करकमलों से रजोहरण प्रदान किया, दर्शकगण भी इस अद्वितीय क्षण को संयम के रंग में पूर्णतया रंगता हुआ अनुभव करने लगे।</p>
<p style="text-align:justify;">इसके पश्चात मुमुक्षु ने आभूषण त्याग कर स्नान किया। वेश परिवर्तन के बाद वे एक नए अवतार ‘नूतन दीक्षित’ के रूप में मंच पर पधारे। सभी ने अहोभाव से उनका स्वागत किया। संयम के उपकरण लाभार्थियों द्वारा आचार्यश्री को अर्पित किए गए। केशलुंचन उपरांत नामकरण विधि में नूतन दीक्षित का नाम मुनिश्री भावजित सागर रखा गया। मुंबई से आए केतन मेहता ने प्रत्येक विधि के रहस्यों से श्रद्धालुओं को अवगत कराया।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>दीक्षार्थी का सम्मान वास्तव में है दीक्षाधर्म का सम्मान: अरिहंतसागरसूरी</strong></p>
<p style="text-align:justify;">अपने प्रासंगिक प्रवचन में आचार्यश्री अरिहंतसागरसूरीश्वरजी ने कहा, दीक्षा महोत्सव के अंतर्गत होने वाली भव्यता, दीक्षार्थी का सम्मान वास्तव में देखा जाए तो त्याग, वैराग्य और संयम जैसे आत्मिक गुणों का सम्मान है, इन गुणों का सत्कार-सम्मान इन गुणों की प्राप्ति के कारण बनता है और ये ही गुण किसी भी जीव के अंतिम लक्ष्य यानी सुख प्राप्ति में कारण बनते हैं, अतः दीक्षा जैसे अनुष्ठान के आयोजन में खर्च होने वाले समय, शक्ति, संपत्ति अंततः स्वयं के ही आत्मिक विकास में निमित्त बनते हैं। दीक्षार्थी का सम्मान वास्तव में त्याग, वैराग्य और संयम जैसे आत्मिक गुणों का सम्मान है। यही गुण जीवन को अंतिम लक्ष्य ’परम सुख’ तक ले जाने का मार्ग बनते हैं। दीक्षा जैसे अनुष्ठानों में लगाया गया समय, शक्ति और संपत्ति अंततः आत्मिक विकास में ही फलीभूत होती है। उन्होंने नूतन दीक्षित को सदैव उत्साह और जागरूकता के साथ आराधना करने की प्रेरणा दी। </p>
<p style="text-align:justify;">दीक्षा महोत्सव में शहर के विभिन्न संघों के साधु-साध्वी भगवंतों की पावन उपस्थिति रही। मंगलवार प्रातः आचार्यश्री नूतन दीक्षित के साथ प्रथम विहार कर वीवी पुरम स्थित सीमंधर-शांतिसूरी जैन संघ पधारेंगे।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>ज्ञान प्रदर्शनी से लोगों ने पाया नया दृष्टिकोण</strong></p>
<p style="text-align:justify;">संयम जीवन की विशेषताओं पर आधारित ज्ञान प्रदर्शनी और भावभीना विदाई समारोह जैसे रचनात्मक कार्यक्रमों ने उपस्थितजन को दीक्षा के वास्तविक स्वरूप का नया अभिगम प्रदान किया। दीक्षा महोत्सव के सफल आयोजन हेतु दीक्षार्थी परिवार द्वारा कल्याण मित्र परिवार को धन्यवाद दिया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">रविवार को दीक्षा महोत्सव के समापन पर कल्याण मित्र परिवार के ही एक मुमुक्षु सहित मुम्बई के भी एक और मुमुक्षु कुल दो मुुक्षुओं के दीक्षा महोत्सव का मुहूर्त ग्रहण 12 दिसंबर को मुम्बई में गच्छाधिपति आचार्य श्री युगभूषणसूरीश्वरजी की निश्रा में लिए जाने की घोषणा की गई।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                    

                <link>https://www.dakshinbharat.com/article/75575/mother-wanted-yash-to-become-a-model-but-now-he</link>
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                <pubDate>Mon, 24 Nov 2025 10:50:13 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>मुमुक्षु भव्य शाह के ‘संसार परिहार उत्सव’ का आगाज़ कल से</title>
                                    <description><![CDATA[दीक्षा महोत्सव का आगाज दीक्षा मण्डप में प्रवेश के साथ होगा]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/75551/mumukshu-bhavya-shahs-sansar-parihar-utsav-starts-from-tomorrow"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2025-11/bhavya-shah.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बेंगलूरु/दक्षिण भारत। </strong>शिक्षा के क्षेत्र में उपलब्धियां, कैरियर के बेहतरीन विकल्प और आलीशान जीवन की संभावनाओं के बावजूद मुम्बई निवासी भव्य शाह ने त्याग और संयम के सोपान से मुक्ति का मार्ग चुना। अपने माता पिता के इकलौते 17 वर्षीय मुमुक्षु भव्य शाह की दीक्षा शहर के शंकरपुरम में 23 नवंबर को आचार्य श्री अरिहंतसागरसूरीश्वरजी की निश्रा में समारोह पूर्वक होगी। </p>
<p style="text-align:justify;">मुमुक्षु भव्य के पिता और पेशे से सीए निर्मल शाह ने बताया कि सद्गुरु के संपर्क में आने के बाद उनके जीवन में काफी परिवर्तन आया। अपने पुत्र भव्य के जन्म के बाद वे विदेश में अपनी नौकरी छोड़कर भारत लौट आए ताकि संतान को संस्कारयुक्त वातावरण मिल सके।</p>
<p style="text-align:justify;">स्कूली शिक्षा के बाद संयम जीवन का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए पिछले दो वर्षों से मुमुक्षु भव्य गुरुकुलवास में रहा और अंततः उन्होंने दीक्षा हेतु सहर्ष स्वीकृति प्रदान की। दीक्षा महोत्सव के निश्रादाता आचार्यश्री अरिहंतसागरसूरीश्वरजी ने ‘संसार परिहार उत्सव’ के नामकरण के बारे में कहा कि जैन दर्शन में दो प्रकार से संसार की पारिभाषा की गई है। घर, धन-दौलत, मित्र-परिवार-स्वजन आदि बाह्य संसार के त्याग के माध्यम से आंतरिक संसार यानी ईर्ष्या, लोभ, अहंकार, राग आदि अशुभ भावों का सर्वथा त्याग करने की शुरुआत दीक्षा जीवन में होती है। बाह्य और आंतरिक संसार के परिहार से ही सच्चे सुख की प्राप्ति संभव है। अतः दीक्षा महोत्सव का 'संसार परिहार’ सार्थक नामकरण किया गया है। </p>
<p style="text-align:justify;">कल्याण मित्र परिवार के सदस्य एवं दीक्षा महोत्सव के संयोजक जितेश भंडारी ने बताया कि संगठन का यह सौभाग्य है कि दीक्षा करवाने का सौभाग्य मिला है। उन्होंने दीक्षा के विभिन्न कार्यक्रम की जानकारी देते हुए कहा कि दीक्षा महोत्सव का आगाज 21 नवंबर को संतों के दीक्षा मण्डप में प्रवेश के साथ होगा। </p>
<p style="text-align:justify;">कार्यक्रमों के अंतर्गत संयम जीवन में अनुशासन को कलात्मक चित्रों से दर्शाती ज्ञान प्रदर्शनी, शक्रस्तव अभिषेक, वस्त्र रंगाई, संयम उपकरणों की छाब भराई, संगीतमय सिम्फनी, विदाई समारोह आदि आयोजित किए गए हैं। 22 को धन के त्याग के प्रतीक स्वरूप वर्षीदान वरघोड़े का आयोजन किया गया है जिसमें अनेक मंडलियों की प्रस्तुति आकर्षण का केंद्र रहेगी। 23 नवम्बर को सुबह 5 बजे से दीक्षाविधि का प्रारंभ होगा। </p>
<p style="text-align:justify;">दीक्षा महोत्सव के आयोजक कल्याण मित्र परिवार के वरिष्ठ सदस्य अशोक सेठ ने बताया कि हर वर्ष सैकड़ों युवक-युवतियां भौतिक चकाचौंध से प्रभावित हुए बिना सच्चे सुख की प्राप्ति के लिए भगवान महावीर के बताए हुए दीक्षा धर्म को स्वीकार करते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 20 Nov 2025 10:38:01 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>जगमग हुआ कोना-कोना, देशभर में धूमधाम से मनाई जा रही दीपावली</title>
                                    <description><![CDATA[सोशल मीडिया पर दीपावली संबंधी तस्वीरों और शुभ कामनाओं का सैलाब उमड़ आया है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/75365/every-corner-is-illuminated-diwali-is-being-celebrated-with-great"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2025-10/happy-diwali.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>नई दिल्ली/दक्षिण भारत। </strong>देशभर में दीपावली धूमधाम से मनाई जा रही है। लोगों ने हर्षोल्लास से मां लक्ष्मी का पूजन किया और दीये जलाए। उन्होंने देश-दुनिया में सबके लिए सुख-शांति की कामना की। सोशल मीडिया पर दीपावली संबंधी तस्वीरों और शुभ कामनाओं का सैलाब उमड़ आया है। </p>
<p style="text-align:justify;">महानगरों से लेकर गांव, ढाणियों तक लोगों ने अपने घरों को दीयों और रंग-बिरंगी रोशनी से सजाया है। </p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को शुभकामनाएं दीं और कामना की कि यह त्योहार हमारे जीवन को सद्भाव, खुशी और समृद्धि से रोशन करे तथा चारों ओर सकारात्मकता की भावना बनी रहे।</p>
<p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री ने गोवा में आईएनएस विक्रांत पर तैनात नौसेना कर्मियों के साथ दीपावली मनाई। उन्होंने इसे 'आत्मनिर्भर भारत' का विशाल प्रतीक बताया। साथ ही, पाकिस्तान पर भी निशाना साधा।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>500 साल पुराने मंदिर में दीपावली उत्सव </strong></p>
<p style="text-align:justify;">त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने गोमती जिले में स्थित 51 शक्तिपीठों में से एक, 500 साल पुराने मां त्रिपुर सुंदरी मंदिर में तीन दिवसीय दीपावली उत्सव का उद्घाटन किया। मुख्यमंत्री ने हज़ारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में देवी के समक्ष 'कल्याण आरती' में भाग लिया।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>धामी ने आपदा प्रभावित लोगों से मुलाकात की</strong></p>
<p style="text-align:justify;">उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पिछले महीने भारी बारिश और बादल फटने की घटनाओं से प्रभावित सहस्रधारा क्षेत्र के लोगों से मुलाकात की और उन्हें आश्वासन दिया कि उनकी समस्याओं का समाधान किया जाएगा।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने मझाड़ा और अन्य गांवों का दौरा किया और प्रभावित क्षेत्र में चल रहे पुनर्निर्माण कार्यों का निरीक्षण भी किया।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>लद्दाख में सैनिकों के साथ मनाई दीपावली</strong></p>
<p style="text-align:justify;">लद्दाख के उपराज्यपाल कवींद्र गुप्ता ने यहां सेना के जवानों के साथ दीपावली मनाई और देश की सीमाओं की सुरक्षा में उनके योगदान की सराहना की।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्होंने सशस्त्र बलों और पूर्व सैनिकों तथा उनके परिवारों के कल्याण के लिए केंद्र सरकार और प्रशासन की प्रतिबद्धता दोहराई।</p>
<p style="text-align:justify;"><strong>प. बंगाल में दीपावली और काली पूजा की धूम</strong></p>
<p style="text-align:justify;">दीपावली और काली पूजा के अवसर पर पश्चिम बंगाल का हर कोना रंग-बिरंगी रोशनियों से जगमगा उठा। इस अवसर पर लाखों श्रद्धालुओं ने काली मंदिरों में दर्शन किए और देवी मां को पुष्प चढ़ाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>भारत</category>
                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                            <category>देश</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 20 Oct 2025 21:48:08 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
                            </item>
            <item>
                <title>जीवनदान की श्रेष्ठ प्रक्रिया है जैन दीक्षा: आचार्यश्री अरिहंतसागरसूरी</title>
                                    <description><![CDATA[मुमुक्षु भव्य शाह की दीक्षा 23 नवंबर को आचार्यश्री अरिहंतसागरसूरीश्वरजी की निश्रा में बेंगलूरु में होगी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/75232/the-best-process-of-life-is-jain-diksha-acharyashree-arihantasagarsuri"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2025-09/deeksha.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>बेंगलूरु/दक्षिण भारत। </strong>रविवार को श्रीवासुपूज्य भवन, माधवनगर में प्रवचन के दौरान आचार्यश्री अरिहंतसागरसूरीश्वरजी म.सा. ने कहा कि जिस प्रकार हमें हमारा जीवन प्यारा है, उसी प्रकार प्रत्येक जीव को उसका जीवन प्यारा होता है। स्वार्थी व्यक्ति मात्र खुद के सुख-दुःख की चिंता करता है, जबकि धर्मी व्यक्ति औरों के सुख-दुःख के प्रति भी संवेदनशील होता है। </p>
<p style="text-align:justify;">जगत के सभी जीवों को जीने का समान अधिकार है और किसी के जीने के अधिकार का हनन करने से हिंसा का पाप लगता है। दीक्षा जीवन एक ऐसी आचार संहिता है जहां संपूर्ण अहिंसा की अवधारणा चरितार्थ की जा सकती है। </p>
<p style="text-align:justify;">तीर्थंकरों की यह खूबी है कि स्वयं संपूर्ण अहिंसक जीवन का पालन करके औरों को भी उसका उपदेश दिया। जगत के सभी जीवों को सुखी करना व्यक्ति के बस की बात नहीं है, लेकिन यदि वह चाहे तो यह संकल्प अवश्य कर सकता है कि वह किसी को दुःखी नहीं करेगा। जैन दीक्षा इसी संकल्प की पर्यायवाची है। </p>
<p style="text-align:justify;">रविवार को आचार्यश्री की निश्रा में मुमुक्षुओं के बेंगलूरु आगमन के उपलक्ष्य में कल्याण मित्र परिवार द्वारा कुमारापार्क जैन मंदिर से माधवनगर तक रथयात्रा सह वर्षीदान वरघोडे का आयोजन किया गया तथा सभी मुुक्षुओं का सम्मान किया गया।</p>
<p style="text-align:justify;">ज्ञातव्य है कि मुमुक्षु भव्य शाह की दीक्षा 23 नवंबर को आचार्यश्री अरिहंतसागरसूरीश्वरजी की निश्रा में बेंगलूरु में होगी।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 29 Sep 2025 10:07:19 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
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            <item>
                <title>तक्षशिला और नालंदा थे विश्व के सबसे प्राचीन विश्वविद्यालय: आचार्य विमलसागरसूरी</title>
                                    <description><![CDATA[विदेशों से भी विद्याभ्यास करने ले लिए लोग भारत आते थे]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/75226/taxila-and-nalanda-were-the-worlds-oldest-university-acharya-vimalasagarsuri"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2025-09/university.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>गदग/दक्षिण भारत।</strong> शनिवार को स्थानीय पार्श्व बुद्धि वीर वाटिका के विशाल पंडाल में आयोजित एक दिवसीय शिक्षण सम्मेलन में आचार्य विमलसागरसूरीश्वर जी ने कहा कि तक्षशिला और नालंदा भारत देश के दो प्राचीन विश्वविद्यालय थे। आज के अफगानिस्तान में आया तक्षशिला विश्वविद्यालय का 2700 वर्ष प्राचीन गौरवशाली इतिहास है। यहां एक साथ 10500 विद्यार्थी पढ़ते थे और 60 विषयों का विद्याभ्यास होता था। </p>
<p style="text-align:justify;">तक्षशिला और नालंदा, दोनों का इतिहास यह बतलाता है कि प्राचीन काल से भारत शिक्षा, संस्कृति, सभ्यता और संस्कारों के क्षेत्र में खूब प्रगति कर चुका था। गुरुकुल पद्धति की वह शिक्षा व्यवस्था समाज, धर्म, राष्ट्र और मानवता के लिए कल्याणकारी थी। बौद्ध चीनी यात्री हुएनसांग ने सातवीं शताब्दी में भारत की यात्रा की थी। </p>
<p style="text-align:justify;">आधे से अधिक भारत का भ्रमण कर उसने अपनी डायरियों में तत्कालीन भारत का इतिहास लिखा है। तक्षशिला और नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में हुएनसांग की गौरवशाली बातें जानने जैसी हैं। वह लिखता है.. विदेशों से भी विद्याभ्यास करने ले लिए लोग भारत आते हैं। देश का दुर्भाग्य है कि आज भारत की प्रतिभाएं बड़ी संख्या में पढ़ाई के लिए विदेश जाकर वहीं बसना चाहती हैं। यह माइग्रेशन देश के विकास और भविष्य को बहुत प्रभावित करेगा।</p>
<p style="text-align:justify;">गदग के राजस्थान जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में हुबली की रिफ्रेश योर माइंड नामक संस्था ने इस सम्मेलन का आयोजन किया था। इसमें उत्तर कर्नाटक के अनेक क्षेत्रों के सरकारी विद्यालयों के हेडमास्टर, प्रिंसिपल, बोर्ड एज्यूकेशन ऑफिसर, डिस्ट्रिक्ट एज्यूकेशन मिनिस्टर और सैकड़ों शिक्षकों ने भाग लिया।</p>
<p style="text-align:justify;">जैनाचार्य ने कहा कि आधुनिक शिक्षा पद्धत्ति में परिवर्तन के लिए हर सच्चे अच्छे भारतीय को जागना होगा। वर्तमान शिक्षा व्यवस्था अंग्रेजों की देन है और वह हमारे देश के भविष्य के लिए हानिकारक है। अंग्रेजों के जमाने में देश में सात लाख बत्तीस हजार गांव व शहर थे और इनमें सात लाख बीस हजार गुरुकुल कार्यरत थे। इन गुरुकुलों में निशुल्क शिक्षा व्यवस्था थी। </p>
<p style="text-align:justify;">गुरुकुलों में पढ़े-लिखे भारतीय विश्व के सफलतम मनुष्य थे। अंग्रेजों ने हमारी सांस्कृतिक और धर्म परंपरा को बर्बाद करने के लिए गुरुकुलों को बंद कर ब्रिटेन की शिक्षा पद्धति यहां लागू की। यह हमारे लिए सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। सभी को संगठित होकर इस दुर्भाग्य को दूर करना होगा। </p>
<p style="text-align:justify;">संघ के अध्यक्ष पंकज बाफना, रिफ्रेश योर माइंड के राजेश बंदामुथा एवं शिक्षाधिकारियों ने दीप प्रज्ज्वलन कर सम्मेलन का शुभारंभ किया। गणिवर्य पद्मविमलसागर के सान्निध्य में सातवीं से बारहवीं कक्षा के प्रवेश पत्र धारक 200 से अधिक विद्यार्थी इसमें भाग ले रहे हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>धर्म/आस्था</category>
                                    

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                <pubDate>Sun, 28 Sep 2025 10:23:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
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                <title>शक्तियों की साधना का समय है नवरात्र, मौज-मस्ती का नहीं: आचार्य विमलसागरसूरी</title>
                                    <description><![CDATA['पश्चिम की हवा सभी को प्रभावित कर रही है']]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/75206/the-time-for-the-cultivation-of-powers-is-acharya-vimalasagarsuri"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2025-09/navratri.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;"><strong>गदग/दक्षिण भारत। </strong>राजस्थान जैन श्वेतांबर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में जीरावला पार्श्वनाथ सभागृह में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए आचार्य विमलसागरसूरीजी ने कहा कि धर्म और संस्कृति की परंपराओं को पवित्र व जीवंत रखना अत्यंत आवश्यक है। इस चुनौतीपूर्ण कार्य की सबसे अधिक जिम्मेदारी उस धर्म के आचार्यों, संतों और नायकों की है। </p>
<p style="text-align:justify;">धर्म जब अलग-अलग पंथों व मान्यताओं में खंड-खंड बिखर जाता है और उसके रक्षक धर्माचार्य, संत या नायक जब उदासीन एवं स्वकेन्द्रित बन जाते हैं तो धर्म की परंपराएं मलिन बनने लग जाती हैं। एक समय ऐसा आता है कि हमारी गौरवशाली परंपराएं खंडित या नष्ट हो जाती हैं, इसी तरह सांस्कृतिक ह्रास होता है। </p>
<p style="text-align:justify;">इतिहास साक्षी है कि धर्म और संस्कृति को बचाने के लिए पूर्व के धर्माचार्यों ने अपने प्राणों की आहुतियां दी थीं। आधुनिक युग धर्माचार्यों एवं धर्मनायकों के लिए सबसे कठिन चुनौतियों का समय है। इधर भरपूर तकनीकी विकास हो रहा है। सोशल मीडिया का प्रसार-प्रचार चरम पर है। </p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे में पश्चिम की हवा सभी को प्रभावित कर रही है और वहां के अंधानुकरण में धर्म व संस्कृति की प्राचीन परंपराओं को सुरक्षित रखना अब बहुत मुश्किल हो गया है। कभी-कभी ऐसा लग रहा है कि पश्चिम के समक्ष पूरब हार जाएगा। नवरात्रि का पर्व इसका ज्वलंत उदाहरण है।</p>
<p style="text-align:justify;">जैनाचार्य ने चिंता जताते हुए कहा कि डांडियों के आधार पर अब नवरात्र त्योहार नाच-गान और मजाक-मस्ती का इवेंट बन गया है। अनेक संस्थाएं, कंपनियां और श्रद्धाभ्रष्ट लोग इसमें कूद गए हैं। संपूर्ण त्योहार को हाइजेक कर लिया गया है। </p>
<p style="text-align:justify;">नवरात्र की मूल भावना और रहस्यों की किसी को परवाह नहीं है। अधिकतर लोगों को नवरात्र के बारे में कुछ भी पता नहीं है। उनके लिए यह एक एंजॉय करने का अवसर है, जिसकी युवक-युवतियां महीनों से प्रतीक्षा करते हैं। समग्र हिन्दू समाज और उनके धर्माचार्य इस संदर्भ में उदासीन रहे हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">कुछ वर्षों बाद यह पूरी तरह भुला दिया जाएगा कि नवरात्र हिन्दू परंपरा का कोई ऐतिहासिक त्योहार था भी, इस कदर सांस्कृतिक पतन होता जा रहा है। मासूम निर्दोष कन्याओं में विवेक के अभाव और उनके परिवारजनों की लापरवाही के चलते नवरात्र के डंडियों के कारण हजारों जिंदगियां दुराचार के पथ पर अग्रसर हो रही हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">अनेकानेक विवाहिताओं के जीवन बर्बाद हो रहे हैं। विवाहेतर संबंध बनते जा रहे हैं। इन सबके सर्वेक्षण खतरनाक भविष्य के संकेत दे रहे हैं। सदाचार का यह पतन समग्र समाज के लिए भयावह और दुःखदायी है। यह भारतीय सामाजिक और पारिवारिक व्यवस्थाओं का विनाश कर देगा। नवरात्र के डांडियों के आयोजकों और प्रायोजकों को सामाजिक सुरक्षा, उन्नति या सदाचार की कोई चिंता नहीं है। पूरे त्योहार का व्यवसायीकरण कर दिया गया है। रुपया, नाचगान, उन्मुक्तता और एन्जॉय ही भगवान है, ऐसा मान लिया गया है। </p>
<p style="text-align:justify;">इस विकट परिस्थिति में धर्मनायक और धर्म की बड़ी-बड़ी संस्थाएं निद्राधीन लगती हैं। कोई कहीं आवाज नहीं उठा रहे हैं। जैसा चल रहा है, सब उसे चलने दे रहे हैं। इस संदर्भ में इस्लाम, ईसाईयत, यहूदी और सिक्ख समाज से सीखने जैसा है। वे अपने धर्म और संस्कृति की मूल परंपराओं को न तो बदलते हैं और न ही किसी को बदलने देते हैं। </p>
<p style="text-align:justify;">आज यदि पूछा जायें कि नवरात्र की प्राचीन परंपराओं को जीवंत रखने का दायित्व किसका है तो उत्तर मिलेगा कि इसका कोई मालिक या दिशानिर्देशक नहीं है। जिसको जैसा मन मे आए, वैसा किया जा सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">आचार्य विमलसागरसूरीजी ने कहा कि नव दैविक शक्तियों की व्रत-उपासना और आराधना के लिए नवरात्रि का पर्व हैं। यह सत्व, शक्ति, सदाचार, पवित्रता और मंगल-कल्याण का पर्व है। वैदिक और जैन शास्त्रों में ऐसे उल्लेख मिलते हैं कि मंत्रों और दैविक शक्तियों की साधना के लिए नवरात्रि सर्वश्रेष्ठ समय होता है। </p>
<p style="text-align:justify;">सात्विक आहार, शुद्ध विचार और ब्रह्मचर्य पूर्वक इन दिनों साधना कर सिद्धियां प्राप्त की जा सकती हैं। ऐसे मंगलकारी दिनों को उद्भट वस्त्र परिधान, ... के साथ देर रात तक नाच, गाना, असात्विक आहार और अपवित्र विचारों के साथ एन्जॉय करना कितना निकृष्ट, पापप्रद, भयानक और दुर्भाग्यपूर्ण है। प्रत्येक हिन्दू को हर हालत में नवरात्र को पवित्र रखने का आंदोलन चलाना चाहिए, तभी हमारी संस्कृति और धर्म की रक्षा संभव हो सकेगी।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 25 Sep 2025 10:23:22 +0530</pubDate>
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