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                <title>ओपीनियन - Dakshin Bharat Rashtramat</title>
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                <title>ऐसे दूर करें चूल्हे की चिंता</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76443/how-to-get-rid-of-stove-worries"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-05/new-lpg.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">वाणिज्यिक एलपीजी सिलेंडर की कीमत में बढ़ोतरी से चाय की दुकानों, होटलों और रेस्टोरेंटों पर अतिरिक्त आर्थिक भार आ गया है। यह आखिरकार ग्राहकों को ही उठाना पड़ेगा। इससे बाहर खाना-पीना महंगा हो जाएगा। पश्चिम एशिया में हिंसा का असर हमारी जेब पर पड़ रहा है। केंद्र सरकार की तीखी आलोचना हो रही है, जो होनी ही थी। इस समय सरकार किसी भी पार्टी या गठबंधन की होती, वह कीमत में बढ़ोतरी के फैसले को ज्यादा दिनों तक नहीं टाल सकती थी। यह हमारे लिए थोड़ा मुश्किल समय है, जिसका हमें मिलकर मुकाबला करना होगा। हमें इस विश्वास के साथ आगे बढ़ना होगा कि आवश्यकता आविष्कार की जननी है। पूर्व में, जब भी समस्याएं आईं, भारत ने उनका समाधान ढूंढ़ा। उससे हमारा देश और मजबूत हुआ। ऐसे समय में ही हमारी शक्तियों और क्षमताओं का पता चलता है। पश्चिम एशिया में संकट कब टलेगा और कब भड़केगा, इसकी गारंटी कोई नहीं दे सकता। हमें आत्मनिर्भरता का रास्ता ढूंढ़ना होगा। हमें इतना समर्थ बनना होगा कि दुनिया में कहीं भी लड़ाई हो, हमारे घरों और प्रतिष्ठानों के चूल्हे जलते रहें। पहले, इसके लिए एक साल की ठोस योजना बनानी होगी। जिन घरों और प्रतिष्ठानों तक पीएनजी कनेक्शन पहुंचाना संभव हो, वहां काम शुरू किया जाए, उसे बड़े स्तर पर आगे बढ़ाया जाए। इससे एलपीजी सिलेंडर आपूर्ति प्रणाली पर दबाव कम होगा। गांवों में ईंधन के कई विकल्प उपलब्ध हो सकते हैं। वहां ऐसे चूल्हों की जरूरत है, जो धुआं कम से कम पैदा करें और आंच ज्यादा से ज्यादा दें। मिट्टी के परंपरागत चूल्हों की वापसी नहीं होनी चाहिए। उनके साथ लोगों का भावनात्मक जुड़ाव हो सकता है, लेकिन उन पर खाना बनाने में बहुत दिक्कत होती है।</p>
<p style="text-align:justify;">हमारे वैज्ञानिकों को ग्रामीण क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए ऐसा ईंधन और ऐसा चूल्हा विकसित करना चाहिए, जो पर्यावरण और घर के बजट, दोनों के लिए अनुकूल हों। ऐसे कुछ विकल्प सोशल मीडिया पर चर्चा में हैं। उन पर विदेशों में बहुत काम हो रहा है। धातु से बने चूल्हों में छोटा पंखा लगाकर बेहतरीन इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों का काम आसान हो सकता है। वे एलपीजी सिलेंडरों पर कम निर्भर होंगे। अगर ग्रामीण क्षेत्र में एक सामान्य परिवार सालभर में 10 सिलेंडरों का इस्तेमाल करता है और वह पर्यावरण के लिए अनुकूल दूसरे ईंधन एवं चूल्हे का इस्तेमाल करने लग जाए तो उसके द्वारा एलपीजी खपत आधी या चौथाई हो सकती है। इस गैस की आपूर्ति शहरों में की जा सकती है। वहां भी ऐसे विकल्प ढूंढ़ने होंगे, जो एलपीजी पर निर्भरता में कमी लाएं। शहरों में इंडक्शन चूल्हे के इस्तेमाल को प्रोत्साहित किया जाए। इसके साथ ही विद्युत आपूर्ति तंत्र को मजबूत किया जाए, ताकि वह इंडक्शन चूल्हों की विद्युत खपत को बर्दाश्त कर सके। सरकार को एक विशेष योजना के तहत विद्युत उत्पादन बढ़ाना चाहिए। सुबह और शाम, जब खाना बनाया जाता है, तब विद्युत यूनिट के शुल्क में छूट दी जाए। जब लोगों को पता चलेगा कि इंडक्शन चूल्हा काफी सस्ता पड़ता है तो वे घरेलू एलपीजी सिलेंडरों का कम इस्तेमाल करेंगे। अगर उक्त योजना के अनुसार, शहरों के हर घर में इंडक्शन चूल्हा इस्तेमाल होने लगे तो भारत सालाना करोड़ों एलपीजी सिलेंडरों की बचत कर सकता है। ये सिलेंडर दुकानों, होटलों और रेस्टोरेंटों में काम लिए जा सकते हैं। भारत पर सूर्यदेव की अपार कृपा है। दुर्भाग्य से, हमने इस वरदान को पहचानने में बहुत देर कर दी। आज हर घर को सौर ऊर्जा से जोड़ने की जरूरत है। साथ ही, सोलर कुकर बहुत क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है। हमारे पास इतने संसाधन मौजूद हैं, जिनका सही इस्तेमाल करें तो रसोईघर के ईंधन के लिए विदेशों की ओर देखना ही न पड़े।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sat, 02 May 2026 09:08:35 +0530</pubDate>
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                <title>नेग के नाम पर मनमानी क्यों?</title>
                                    <description><![CDATA[कई जगह किन्नरों की हरकतें मर्यादा को पार चुकी हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76438/why-arbitrariness-in-the-name-of-neg"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-05/al-high.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने किन्नर समुदाय के सदस्यों द्वारा मांगलिक अवसरों पर बधाई या नेग मांगे जाने की प्रथा के बारे में अत्यंत महत्त्वपूर्ण निर्णय दिया है। किन्नरों के पास ऐसा कोई कानूनी अधिकार नहीं है, जिसके तहत वे किसी से जबर्दस्ती रुपए या तोहफे मांग सकें। हाल के वर्षों में ऐसे मामले काफी चर्चा में रहे हैं, जब किन्नर समुदाय के कुछ सदस्यों द्वारा लोगों से अभद्रता की गई। कई बार तो ऐसी मांगें अप्रिय घटनाओं का रूप ले लेती हैं। पिछले साल मार्च में एक मामला देशभर में काफी चर्चा में रहा था, जब मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में चलती ट्रेन में किन्नरों के समूह ने एक युवक को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार डाला था। युवक का अपराध सिर्फ इतना था कि उसने किन्नरों को रुपए नहीं दिए थे। कोई व्यक्ति अपनी मेहनत की कमाई यूं ही किसी को क्यों दे? क्या किन्नर समुदाय का सदस्य होने मात्र से किसी को यह अधिकार मिल जाता है कि वह दूसरों की कमाई में अपना हिस्सा मांगे? कई जगह किन्नरों की हरकतें मर्यादा को पार चुकी हैं। जब कोई व्यक्ति उन्हें शालीनतापूर्वक मना करता है तो उससे अभद्रता करते हैं। उसके आपत्ति जताने पर धमकाते हैं, अश्लील संकेत करते हैं। अगर किन्नरों का पूरा झुंड होता है तो उस व्यक्ति पर हावी होने की कोशिश करते हैं। क्या यह ज्यादती नहीं है? किसी व्यक्ति को क्या अधिकार है कि वह दूसरों से ऐसा व्यवहार करे? यह सब बंद होना चाहिए। किन्नर भी इन्सान हैं। उन्हें गरिमापूर्वक जीवन जीने और कमाने का अधिकार है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता, लेकिन उनमें से जो सदस्य रुपए-तोहफे मांगने के लिए मनमानी पर उतर आता है, वह सरासर गलत है।</p>
<p style="text-align:justify;">सिर्फ इस आधार पर कि किन्नर समुदाय के लोग वर्षों से बधाई या नेग मांगते आ रहे हैं, यह उनका कानूनी अधिकार नहीं हो जाता है। लोग अपनी खुशी से कुछ दे देते हैं, यह अलग बात है। इस तथ्य को आधार बनाकर लोगों पर धौंस जमाने को उचित नहीं ठहराया जा सकता है। इससे टकराव बढ़ता है। कई बार भयानक नतीजे निकलते हैं। कुछ साल पहले पश्चिम बंगाल के मालदा जिले का एक मामला सुर्खियों में रहा था। वहां किन्नरों ने एक नवजात को करीब तीन घंटे तक अपने पास रखा और ढोल बजाते रहे। वे इस बात पर अड़ गए थे कि मोटी रकम मिलेगी, तो ही बच्चा वापस देंगे। बच्चे के माता-पिता उनकी मांग पूरी नहीं कर सकते थे। इस दौरान बच्चे की तबीयत बिगड़ गई और उसने दम तोड़ दिया। मध्य प्रदेश के भोपाल शहर में किन्नर समुदाय के सदस्यों ने एक परिवार से नेग मांगने के नाम पर बहुत अभद्रता की। जब परिवार ने मांगी गई रकम देने से इन्कार किया तो किन्नर नहीं माने। वे अश्लील हरकतें करने लगे। आखिर में पांच हजार रुपए लिए और महिला की सोने की बाली उतरवा ली। जयपुर के सिंधी कैंप इलाके में एक युवक बस से उतरा। अचानक एक किन्नर ने उसे परेशान करना शुरू कर दिया। उसने युवक की जेब से रुपए निकाल लिए। क्या यह लूट-खसोट नहीं है? युवक ने दूसरी जेब में भी कुछ रुपए रखे थे। अगर वे किन्नर की भेंट चढ़ जाते तो उसके पास किराया तक न बचता। कई ट्रेनों में किन्नरों की खूब मनमानी चलती है। अगर कोई व्यक्ति उन्हें रुपए देने से इन्कार करता है तो उसे जमकर खरी-खोटी सुनाते हैं और अपमानित करते हैं। क्या टिकट लेने के बाद ट्रेन में ऐसा अनुभव होना उस यात्री के अधिकारों का हनन नहीं है? इस संबंध में रेलवे प्रशासन को सख्त कदम उठाने चाहिएं। किन्नर समुदाय के सदस्यों की भी जिम्मेदारी है कि वे अन्य लोगों की तरह कोई हुनर सीखें और अपना कामकाज करते हुए सम्मानजनक तरीके से जीवन बिताएं। किसी को परेशान न करें।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 01 May 2026 08:58:59 +0530</pubDate>
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                <title>कितने खरे उतरेंगे एग्जिट पोल?</title>
                                    <description><![CDATA[चुनाव नतीजों के ज्यादा नजदीक रहने वाले एग्जिट पोल की विश्वसनीयता बढ़ेगी]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76433/how-accurate-will-the-exit-polls-be"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-04/exit.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">केरल, असम, तमिलनाडु, पुड्डुचेरी और पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के एग्जिट पोल ने कई नेताओं की धड़कनें बढ़ा दी हैं। वैसे तो ये महज अनुमान हैं, लेकिन इनसे हवा के रुख का कुछ हद तक पता चल जाता है। सबसे ज्यादा चर्चा में पश्चिम बंगाल के एग्जिट पोल हैं, जहां तृणकां और भाजपा में जबर्दस्त टक्कर दिखाई दे रही है। कुछ एग्जिट पोल तृणकां के, वहीं कुछ भाजपा के मजबूत प्रदर्शन का अनुमान लगा रहे हैं। दोनों पार्टियां खुद की जीत को लेकर बड़ा दावा कर रही हैं। यह स्वाभाविक है। इस बार प. बंगाल में जैसा चुनावी माहौल था, जिस तरह रिकॉर्ड मतदान हुआ, उसके आधार पर यह अनुमान लगाना गलत नहीं होगा कि जिस पार्टी को जनता-जनार्दन का आशीर्वाद मिलेगा, भरपूर ही मिलेगा। जो जीतेगा, वह भारी बहुमत से जीतेगा। जो हारेगा, वह करारी शिकस्त चखेगा। अगर प. बंगाल में भाजपा 'कमल' खिलाने में कामयाब रही तो उसके कार्यकर्ताओं का जोश दुगुना हो जाएगा। पार्टी के राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय नेतृत्व की क्षमता पर भरोसा बढ़ेगा। इसका संदेश दूर तक जाएगा। इससे भाजपा और राजग को आगामी लोकसभा चुनावों में मनोवैज्ञानिक बढ़त मिलेगी। साथ ही, विपक्ष के लिए 'खतरे की घंटी' होगी कि उसके तमाम आरोपों को जनता ने नकार दिया। भाजपा का विस्तार होने के द्वार खुलेंगे। उस स्थिति में, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता में निश्चित रूप से बढ़ोतरी होगी। अगर प. बंगाल में फिर एक बार तृणकां की सरकार आ गई तो ममता बनर्जी का सियासी कद बढ़ेगा। इससे यह संदेश जाएगा कि भाजपा को टक्कर देने का दम सिर्फ तृणकां में है। विपक्ष में यह मांग तेज हो सकती है कि आगामी लोकसभा चुनाव ममता बनर्जी के नेतृत्व में लड़ा जाए। प. बंगाल में तृणकां की जीत से विपक्ष को नई ऊर्जा मिल सकती है।</p>
<p style="text-align:justify;">असम में हिमंत बिस्वा सरमा के आक्रामक चुनाव अभियान की झलक एग्जिट पोल में भी दिखाई दे रही है। उनमें सीटों की संख्या अलग-अलग बताई जा रही है, लेकिन इस बिंदु पर सभी एकमत हैं कि भाजपा की सरकार बन सकती है। एग्जिट पोल से केरल में यूडीएफ, तमिलनाडु में द्रमुक और पुड्डुचेरी में भाजपा उत्साहित है। हाल के वर्षों में एग्जिट पोल कई बार सही तो कई बार गलत साबित हुए हैं। साल 2022 में गुजरात और हिमाचल प्रदेश में एग्जिट पोल काफी हद तक सही साबित हुए थे। साल 2023 में छत्तीसगढ़ में कांटे की टक्कर का अनुमान था, लेकिन भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया था। उसी साल मध्य प्रदेश में सीटों का अनुमान सटीक नहीं रहा था। राजस्थान में भाजपा की जीत का अनुमान सही साबित हुआ था। साल 2024 में हरियाणा में एग्जिट पोल गलत साबित हुए थे। उनमें कांग्रेस की वापसी का अनुमान लगाया गया था, जबकि नतीजों में भाजपा अपनी सत्ता बचाने में सफल रही थी। झारखंड और महाराष्ट्र में एग्जिट पोल सही साबित हुए थे। दिल्ली में भी पिछले विधानसभा चुनाव के नतीजे एग्जिट पोल से कुछ अलग रहे थे। आम आदमी पार्टी का प्रदर्शन वैसा नहीं रहा था, जैसा एग्जिट पोल में दावा किया गया था। साल 2024 के लोकसभा चुनाव नतीजों ने भी एग्जिट पोल करने वालों को तगड़ा झटका दिया था। वास्तव में, जब एग्जिट पोल के लिए डेटा लिया जाता है तो हर व्यक्ति सही-सही जानकारी नहीं देता। जिस इलाके से डेटा लिया जाता है, उसमें कुल जनसंख्या के थोड़े-से हिस्से को शामिल किया जाता है। कई लोग बताते कुछ और हैं, वोट कहीं और दे आते हैं। अपने एसी-कक्ष में बैठकर डेटा विश्लेषण के आधार पर सीटों का अनुमान लगाने वाले 'बुद्धिजीवी' उस समय हैरान रह जाते हैं, जब नतीजे कुछ और आते हैं। जनता के मन की थाह पाना इतना आसान नहीं है। जो एग्जिट पोल चुनाव नतीजों के ज्यादा नजदीक रहेगा, उसकी विश्वसनीयता बढ़ेगी। बाकी सबके अनुमान मीम बनाने के काम आएंगे।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 09:23:19 +0530</pubDate>
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                <title>आदतें सुधारें, देश को स्वच्छ बनाएं</title>
                                    <description><![CDATA[लोग सुविधाएं शानदार चाहते हैं, लेकिन आदतों में सुधार नहीं करना चाहते]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76426/improve-habits-make-the-country-clean"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-04/clean-india.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सिक्किम में स्वच्छता की स्थिति पर टिप्पणी कर इस राज्य के निवासियों से प्रेरणा लेने का आह्वान किया है। अक्सर सिक्किम की साफ सड़कों और निर्मल हवाओं की चर्चा सोशल मीडिया पर होती है। यहां लोगों ने स्वच्छता का आदर्श स्तर कायम रखा है, जो प्रशंसनीय है। सिक्किम के निवासियों ने दिखा दिया है कि स्वच्छता सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। यह हम सबकी जिम्मेदारी है। अगर हम किसी जगह को स्वच्छ और सुंदर बनाना चाहते हैं तो सिक्किम के लोगों से बहुत कुछ सीख सकते हैं। भारत में कई लोग जब किसी जगह की स्वच्छता और सुंदरता की तारीफ करते हैं तो कहते हैं, 'वह जगह इतनी सुंदर थी ... जैसे फिल्मों में दिखाते हैं ... ऐसा लग ही नहीं रहा था कि हम इंडिया में हैं!' क्या स्वच्छ और सुंदर जगह सिर्फ विदेश में हो सकती है? क्या भारत में किसी जगह को स्वच्छ रख पाना असंभव है? जब कभी स्वच्छता की बात होती है तो कहा जाता है कि 'भारत में इस वजह से कचरे के ढेर लगे हुए हैं, क्योंकि यहां जनसंख्या बहुत बढ़ गई है।' अगर भारत में 140 करोड़ लोग हैं तो सफाई करने के लिए 280 करोड़ हाथ भी हैं। इस तरह तो हमारा देश पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा स्वच्छ होना चाहिए! वास्तव में गंदगी के लिए ज्यादा जनसंख्या को जिम्मेदार ठहरा देना एकपक्षीय दृष्टिकोण है। स्वच्छता को आदत बना दिया जाए तो जनसंख्या बहुत बड़ा वरदान बन सकती है। हमारे आस-पास ऐसे लोग दिख जाएंगे, जो गंदगी फैलाने को अपना अधिकार समझते हैं, जहां उनका मन करता है, वहां थूक देते हैं, फलों-सब्जियों के छिलके बिखेर देते हैं ... उसके बाद शिकायत करते हैं कि देश में सफाई नहीं है। क्या गंदगी फैलाने वाले लोग विदेश से चले आ रहे हैं?</p>
<p style="text-align:justify;">अगर कोई व्यक्ति किसी को स्वच्छता का महत्त्व समझाते हुए गंदगी फैलाने से रोकता है तो उसके साथ हिंसक घटना भी हो सकती है। एक सोसाइटी में रहने वाले कुछ परिवार बासी खाना और फलों-सब्जियों के छिलके ऐसी जगह डालते हैं, जहां मक्खियां भिनभिनाती रहती हैं। इससे एक परिवार को बहुत परेशानी होती है। बरसात के मौसम में स्थिति और बिगड़ जाती है। जब वह परिवार अन्य लोगों से निवेदन करता है कि 'यहां बासी खाना और छिलके न डालें' तो उनका जवाब होता है, 'हम ही तो अकेले नहीं डाल रहे? पहले उन सबको रोकें।' यानी, पहले सबको सुधार कर आएं, उसके बाद हम सुधरने के बारे में सोचेंगे! जयपुर से चलने वाली एक ट्रेन के जनरल डिब्बे में कुछ बच्चे मूंगफली खाकर छिलके वहीं बिखेर रहे थे। एक यात्री ने उनसे कहा, 'छिलके एक जगह इकट्ठे कर लें, इस तरह न बिखेरें', तो बच्चों के माता-पिता भड़क उठे, 'हमने किराया दिया है। हमारे बच्चे ही गंदगी फैला रहे हैं क्या? मूंगफली खा रहे हैं तो अपने पैसों की खा रहे हैं। आपका क्या जाता है? अगर सफाई का इतना ज्यादा शौक है तो झाड़ू लेकर पूरी ट्रेन साफ कर दें! हमारे बच्चों को कुछ कहेंगे तो ठीक नहीं रहेगा। हमें सफाई का पाठ न पढ़ाएं।' जब लोगों का रवैया ऐसा होगा तो स्वच्छता का स्तर क्या होगा? क्या ट्रेन का किराया देने का यह मतलब है कि उस व्यक्ति को गंदगी फैलाने का लाइसेंस मिल गया? लोग सुविधाएं शानदार चाहते हैं, लेकिन अपनी आदतों में सुधार नहीं करना चाहते। जब कोई उन्हें स्वच्छता का महत्त्व समझाता है तो वे इसे अपनी प्रतिष्ठा पर प्रहार समझ लेते हैं और झगड़ा करने लगते हैं। हम अपनी हर समस्या के लिए विदेशी आक्रांताओं को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। कई समस्याएं हमारी गलत आदतों की वजह से भी हैं। उनका समाधान असंभव नहीं है। हमें अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करनी होगी। आदतों को सुधारना होगा। स्वच्छता की शुरुआत हमसे होती है। अगर हम गंदगी फैलाना बंद करें, स्वच्छता का प्रसार करें तो भारत स्वच्छता सूचकांक में सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Wed, 29 Apr 2026 09:11:49 +0530</pubDate>
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                                    <dc:creator><![CDATA[News Desk]]></dc:creator>
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                <title>नकल और मिलावट का कपट धंधा</title>
                                    <description><![CDATA[जनता की सेहत से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76420/fraudulent-business-of-imitation-and-adulteration"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-04/pure.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">भारत में नकली और मिलावटी चीजों का कपट धंधा धड़ल्ले से जारी है। ऐसे लोग चंद रुपयों के लिए जनता की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो देखकर अब तो मन में सवाल पैदा होता है- क्या कोई ऐसी चीज भी बची है, जो नकली नहीं है या जिसमें कोई मिलावट नहीं है? हाल में दिल्ली पुलिस ने नकली टूथपेस्ट बनाने वाले एक कारखाने का भंडाफोड़ किया था। वहां कच्चे पेस्ट, मशीनों और पैकेजिंग सामग्री से एक मशहूर ब्रांड का नकली टूथपेस्ट बनाया जाता था। तैयार माल को स्थानीय बाजारों में बेच दिया जाता था। उससे किसी के दांत चमकें या न चमकें, कारखाने के मालिक का धंधा जरूर चमक रहा था। मेरठ में दो कारखाने नकली पनीर बनाकर लोगों को स्वाद के साथ बीमारियां परोस रहे थे। जब अधिकारियों ने छापा मारा तो 2,800 किलोग्राम से ज़्यादा नकली पनीर बरामद हुआ। अगर यह कार्रवाई नहीं होती तो इतना 'पनीर' लोगों की थाली में जाता। दूध और घी में मिलावट आम बात हो गई है। विक्रेताओं को लिखना पड़ता है- 'यहां शुद्ध दूध और शुद्ध घी मिलता है।' सवाल है- दूध और घी को 'शुद्ध' लिखने की नौबत ही क्यों आई? मिलावट करने वालों ने विश्वास को इतना कमजोर कर दिया कि अब लोग शुद्धता संबंधी किसी भी दावे को आसानी से स्वीकार नहीं करते। अस्सी और नब्बे के दशक में एक किस्सा (जो काल्पनिक था, लेकिन हकीकत के काफी करीब था) बहुत मशहूर था- एक व्यक्ति किसी दुकान से घी लेकर गया। उससे रोटी चुपड़कर खाते ही उसका पेट खराब हो गया। अगले दिन दुकानदार से शिकायत की। उसने अपनी गलती स्वीकार करते हुए कहा, 'मैंने भूलवश आपको असली घी दे दिया, इसलिए आपका पेट खराब हो गया। अब तक नकली घी खाने से आपके पेट को उसकी आदत हो गई।'</p>
<p style="text-align:justify;">हर साल त्योहारों और शादियों के सीजन में नकली मावा खूब पकड़ा जाता है। फिर भी जालसाज बाज नहीं आते। असली शहद तो अब दुर्लभ हो चुका है। एक व्यक्ति ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि वह कार से जयपुर जा रहा था। सर्दियों के दिन थे। रास्ते में कुछ लोग 100 प्रतिशत शुद्धता की गारंटी के साथ शहद बेच रहे थे। उनके पास मधुमक्खियों के कुछ छत्ते भी थे। व्यक्ति ने शहद चखा, जो बिल्कुल असली लगा। उसे विश्वास हो गया तो शहद ले लिया। हफ्तेभर बाद पता चला कि बर्तन में ऊपर असली शहद था, नीचे चीनी और अन्य पदार्थों की परत थी। कुछ साल पहले झुंझुनूं में एक फेरीवाले ने शुद्ध घी के नाम पर कई लोगों को चूना लगा दिया था। उसने बर्तन के निचले हिस्से में उबले हुए आलू और ऊपरी हिस्से में असली घी जमा कर रखा था। इसी तरह काली मिर्च में पपीते के बीज, धनिया पाउडर में पशु-अपशिष्ट, मिर्च पाउडर में पिसी हुई ईंट, हल्दी पाउडर में पीला रंग, हींग में चॉक पाउडर की मिलावट वर्षों से हो रही है। यह सिर्फ मिलावट नहीं, बल्कि बहुत बड़ा धोखा है। लंबे समय तक इनका सेवन करने से गंभीर बीमारियां हो सकती हैं। खान-पान संबंधी चीजों की शुद्धता की पहचान करने के कई तरीके हैं। वे प्रारंभिक पहचान के लिए ठीक हैं, लेकिन वैज्ञानिक पुष्टि के लिए लैब टेस्ट ही सही तरीका होता है। आम आदमी के पास न इतने संसाधन हैं और न इतना समय है कि वह एक-एक चीज लेकर लैब के चक्कर लगाता फिरे। यह सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है कि लोगों को हर चीज शुद्ध मिले। इसके लिए अधिकारी समय-समय पर जांच करें और मिलावट का पता लगाएं। जनता की सेहत से खिलवाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 09:18:43 +0530</pubDate>
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                <title>आत्मनिर्भरता का व्यापक संदेश</title>
                                    <description><![CDATA[देश भविष्य में नए कीर्तिमान बनाकर दुनिया को अचंभित कर सकता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76414/broad-message-of-self-reliance"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-04/message.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' कार्यक्रम की 133वीं कड़ी में भारत की शक्ति एवं सामर्थ्य का उल्लेख कर आत्मनिर्भरता का संदेश दिया है। देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए पहले, वैज्ञानिक दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाना होगा। यह सुखद है कि भारत के वैज्ञानिकों ने सिविल परमाणु कार्यक्रम में बहुत उन्नति की है। इसका लाभ हर क्षेत्र को मिल रहा है। तमिलनाडु के कलपक्कम में फास्ट ब्रीडर रिएक्टर द्वारा क्रिटिकलिटी हासिल किए जाने की घटना देश की बहुत बड़ी उपलब्धि है। यह उपलब्धि इसलिए भी विशेष है, क्योंकि परमाणु रिएक्टर को बनाने में स्वदेशी तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। पूर्व में जब भारत ने अपना परमाणु कार्यक्रम शुरू किया था, तब पश्चिमी देश इसे संदेह की दृष्टि से देखते थे। उन्होंने देश पर कई प्रतिबंध लगाकर शांतिपूर्ण कार्यक्रम के रास्ते में बाधा पैदा करने की कोशिश की थी। आज भारत अपने वैज्ञानिकों के ज्ञान और दृढ़ निश्चय के बल पर उस मुकाम तक पहुंच गया है, जहां परमाणु संयंत्र ऊर्जा के उत्पादन के साथ भविष्य के लिए नया ईंधन खुद ही तैयार कर लेगा। भारत के पास ऊर्जा के अनेक स्रोत हैं। उनका विवेकपूर्वक इस्तेमाल करने की जरूरत है। पवन ऊर्जा के क्षेत्र में बढ़ते कदम इस बात के साक्षी हैं कि देश भविष्य में नए कीर्तिमान बनाकर दुनिया को अचंभित कर सकता है। देश की पवन ऊर्जा उत्पादन क्षमता 56 गीगावाट का आंकड़ा पार कर चुकी है। हमें और आगे बढ़ना है। गुजरात, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान समेत कई राज्य इस क्षेत्र में अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं। जिन इलाकों में पवन ऊर्जा उत्पादन की अच्छी संभावनाएं हैं, उन्हें चिह्नित कर इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">बांस को पेड़ की श्रेणी से बाहर किए जाने के सुखद परिणाम दिखाई देने लगे हैं। उत्तर-पूर्व के राज्यों में बांस बहुत उगता है। साल 2017 में कानून में बदलाव किए जाने के बाद वहां बांस आधारित उद्योग-धंधों को काफी बढ़ावा मिला है। यह एक अद्भुत पौधा है, जिसमें अपार संभावनाएं छिपी हैं। इससे कुर्सी, मेज, बेड, सोफा, अलमारी, सजावटी सामान, टोकरी, ट्रे, डिब्बे, फूलदान, बांसुरी समेत दर्जनों चीजें बनाई जा सकती हैं। यह पौधा पर्यावरण और हमारी सेहत, दोनों के लिए बहुत फायदेमंद है। हाल के वर्षों में बांस की बोतल बहुत लोकप्रिय हुई है। इसके पानी में विभिन्न औषधीय गुणों का समावेश हो जाता है। अगर युवाओं को बांस की बोतल और बर्तन बनाने का प्रशिक्षण दिया जाए तो उनके लिए रोजगार के कई अवसर पैदा हो सकते हैं। पिछले कुछ दशकों में प्लास्टिक की वजह से पर्यावरण के लिए कई चुनौतियां पैदा हो गई हैं। उनके मद्देनजर बांस एक मजबूत विकल्प बन सकता है। भारत के पास खान-पान संबंधी चीजों का अपार भंडार है। यहां दूध से बनने वाली 'चीज़' का स्वाद दुनियाभर में मशहूर हो रहा है। प्रधानमंत्री ने 'मन की बात' में कई किस्म की चीज़ का उल्लेख कर इस बात पर प्रकाश डाला है कि भारत का डेयरी क्षेत्र स्वादिष्ट और गुणवत्तापूर्ण उत्पादों से मालामाल है। जम्मू-कश्मीर की कलारी चीज़ और सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश एवं लद्दाख की छुरपी को हर घर में पहुंचाना चाहिए। भारतीय कंपनियों को इस क्षेत्र में निवेश करना चाहिए। जो विदेशी पर्यटक यहां आएं, उनके सामने उस इलाके में बनने वाली चीज़ पेश करनी चाहिए। इससे काफी प्रचार हो जाएगा और विदेशों में मांग बढ़ेगी। इसके अलावा दूध से बनने वाले कई उत्पाद हैं, जिनका देश-दुनिया में प्रचार होना चाहिए। डेयरी क्षेत्र रोजगार के लाखों नए अवसर पैदा करने की क्षमता रखता है। हमें इस क्षमता को पहचानने और उसके अनुसार काम करने की जरूरत है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 27 Apr 2026 08:58:42 +0530</pubDate>
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                <title>भ्रमित और कुंठित ट्रंप</title>
                                    <description><![CDATA[ईरान ने करारा जवाब दिया]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76408/confused-and-frustrated-trump"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-04/bhramit.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर भारत के बारे में जो टिप्पणी की, वह अत्यंत निंदनीय है। उनका एक-एक शब्द यह गवाही दे रहा है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। अगर उन्हें समय रहते मर्यादा में नहीं रखा गया तो वे दुनिया को किसी बड़ी मुसीबत के मुंह में धकेल सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ईरान पर हमला करने के बाद ट्रंप को कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा है। अगर वे पीछे हटेंगे तो इसे उनकी करारी हार माना जाएगा। अगर वे आगे बढ़ेंगे तो उन पर ईरानी जनता की हत्या के गंभीर आरोप लगेंगे। ट्रंप नोबेल शांति पुरस्कार के लिए लालायित हैं। उन्होंने दर्जनों मनगढ़ंत दावे कर अपनी दावेदारी मजबूत करने की कोशिश की, लेकिन दाल नहीं गली। ईरान पर बड़ा हमला करने के बाद उनका दावा भी खटाई में पड़ गया है। उनके शब्दों से गहरा गुस्सा झलक रहा है। वे कुंठित नजर आ रहे हैं। उन्होंने सोचा होगा कि ईरान दो-चार दिनों में ही घुटनों पर आ जाएगा, लेकिन उसने ऐसा करारा जवाब दिया कि अमेरिकी राष्ट्रपति की हालत सांप-छछूंदर जैसी हो गई है। अब वे जन्मजात नागरिकता का मुद्दा उठाकर भारत के बारे में अनुचित टिप्पणी कर रहे हैं। अगर ट्रंप को अमेरिका स्वर्ग और अन्य देश नरक लगते हैं तो अमेरिकी राष्ट्रपति वहां क्यों जाते हैं? क्यों उन देशों से संबंध रखते हैं? अपने देश तक सीमित रहें और 'स्वर्गवासी' कहलाएं। ट्रंप ज्यादातर समस्याओं का एक ही समाधान जानते हैं। वह है- टैरिफ! उन्हें ऐसा लगता है कि टैरिफ वह चाबुक है, जिसे फटकारने भर की देर है। उसके बाद दुनिया सीधे रास्ते पर आ जाएगी।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर अमेरिका इतना महान देश है तो डोनाल्ड ट्रंप अब तक रूस-यूक्रेन युद्ध क्यों नहीं रुकवा पाए? अमेरिका की इतनी ज्यादा धाक है तो वह उत्तर कोरिया के किम जोंग उन के आगे क्यों फेल हो गई? अगर अमेरिकी राष्ट्रपति खुद को सर्वशक्तिमान समझते हैं तो ईरानी नेतृत्व को क्यों नहीं झुका पाए? ट्रंप की बेतुकी बयानबाजी सुनकर लगता है कि 'थोथा चना, बाजे घना' वाली कहावत यूं ही नहीं बनाई गई है। ट्रंप की हालत उस ईर्ष्यालु छात्र जैसी है, जो पढ़ना नहीं चाहता, लेकिन कक्षा में प्रथम आना चाहता है और पुरस्कार पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझता है। ट्रंप पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के कट्टर आलोचक हैं, जिन्हें नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। वे ओबामा से पीछे नहीं रहना चाहते। उनका सपना है कि दुनिया उन्हें 'शांति पुरुष' के रूप में याद करे और ओबामा से ज्यादा योग्य समझे। जब कभी उन्हें महसूस होता है कि 'शांति पुरुष' कहलाने की संभावनाएं धूमिल होती जा रही हैं तो भड़क जाते हैं और उल्टे-सीधे बयान देने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति की मानसिक स्थिति क्या होगी, जो एक दिन किसी देश को महान बताकर उसके प्रधानमंत्री को अपना सबसे अच्छा मित्र बताए और अगले दिन उस देश को नरक घोषित कर दे? ट्रंप के इस बयान को बहुत गंभीरता से लेने की जरूरत है। लोगों को अमेरिका जाने का मोह छोड़कर अपने देशों को महान बनाना चाहिए। शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार समेत सभी सुविधाएं अपने देशों में भी पैदा की जा सकती हैं। इसके लिए सरकारें इच्छाशक्ति दिखाएं। विदेश जाकर अपमान झेलने से कई गुना बेहतर है अपने देश की रोटी; भले ही रूखी-सूखी हो, लेकिन अपनी मिट्टी और अपने पसीने की हो।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 10:15:18 +0530</pubDate>
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                <title>बुराई के इस भंवर से बचें</title>
                                    <description><![CDATA[इस बुरे खेल से दूर रहें]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76405/escape-this-whirlpool-of-evil"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-04/irs-delhi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दिल्ली में एक आईआरएस अधिकारी की बेटी की हत्या के मामले में हो रहे खुलासे हैरान करने वाले हैं। गिरफ्तार आरोपी एक प्रतिभाशाली छात्र रहा है, लेकिन उसे ऑनलाइन जुए की ऐसी लत लगी, जिसके बाद उसने अपराध की दुनिया में प्रवेश किया। उसे अपने कृत्य पर कोई पछतावा नहीं हो रहा है। जुआ किसी मनुष्य की बुद्धि किस तरह भ्रष्ट कर देता है, यह इसका एक उदाहरण है। आमतौर पर जुआरी अपनी आपबीती किसी को आसानी से नहीं बताते। अब सोशल मीडिया पर ऐसे लोग अनुभव साझा करने लगे हैं। उन्हें सुनकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। देश में ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है, जो जुए के चक्रव्यूह में बुरी तरह फंस चुके हैं। उनके सिर पर यही फितूर सवार रहता है कि 'किसी तरह रुपए मिल जाएं, उनसे और बड़ा दांव लगाएं।' उक्त युवक द्वारा भी आईआरएस अधिकारी के घर से रुपए-जेवरात चोरी किए जाने की जानकारी सामने आई है। यह युवक इन अधिकारी के घर में नौकरी कर चुका है। इस दौरान उसने कई लोगों से रुपए उधार लेकर जुआ खेला था। जब अधिकारी को उसके कारनामों का पता चला तो नौकरी से निकाल दिया। यह युवक अपने घर में भी लड़ाई-झगड़ा करता था और जुआ खेलने के लिए रुपए मांगता था। अगर रुपए नहीं मिलते थे तो घर का सामान बेच देता था। जब जुए में रुपए जीतता था तो उन्हें अनैतिक कार्यों में उड़ा देता था। अगर जुए के इस रोग को फैलने से नहीं रोका गया तो भविष्य में कई लोग अपराध के दलदल में फंस सकते हैं।</p>
<p style="text-align:justify;">अक्सर कहा जाता है कि 'जुआ संबंधी वेबसाइटों और ऐप्स के लिए सरकार जिम्मेदार है ... वह इन्हें बंद क्यों नहीं कर देती?' सरकार ने पूर्व में ऐसी कई वेबसाइटों और ऐप्स पर प्रतिबंध लगाया है। इनके हर प्लेटफॉर्म पर नजर रखना संभव नहीं है और न ही हर बात के लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराना उचित है। क्या लोगों की कोई जिम्मेदारी नहीं है? इस तथ्य से सभी अवगत हैं कि जुआ खेलना बहुत बुरी बात है। फिर क्यों खेलते हैं? इससे दूर रहें। अगर आदत लगाना चाहते हैं तो अच्छी बातों की क्यों नहीं लगाते? क्या उसके लिए भी सरकार जिम्मेदार है? जुए की लत ने कई युवाओं की जिंदगी तबाह कर दी। दिल्ली में ही एक लड़का जो कुछ साल पहले टॉपर था, आज जुए के कारण लाखों रुपए के कर्ज में है। उसने शुरुआत में बहुत रुपए जीते थे। एक दिन भाग्य ने ऐसा पलटा खाया कि सबकुछ हार गया। उसने वह रकम दोबारा हासिल करने के लिए अपने माता-पिता के बैंक खातों में सेंध लगाई। वहां से लाखों रुपए उड़ाए। उनसे जुआ खेला और हार गया। उसकी पढ़ाई-लिखाई चौपट हो गई। जिस कॉलेज ने उसे सम्मानपूर्वक प्रवेश दिया था, उसी ने बाहर कर दिया। माता-पिता कॉलेज प्रबंधन के आगे हाथ जोड़ने लगे कि हमारे बेटे को न निकालें। जिस बेटे पर उन्हें गर्व था, उसकी गलत आदतों की वजह से दूसरों के सामने हाथ जोड़ने पड़े! एक और युवक को जुए की ऐसी लत लगी कि सबकुछ हारने के बाद वह दूसरों से रुपए उधार मांगने लगा। उसे किसी से भी रुपए मांगने में बिल्कुल झिझक नहीं होती थी। एक दिन उसकी महिला मित्र की दादी का निधन हो गया। जब फोन पर युवक को बताया तो उसने दु:ख जताने के बजाय महिला से कहा, 'दादी के कमरे में जाओ। अगर वहां कुछ रुपए मिल जाएं तो मुझे भेज दो।' जुए ने उसे इतना संवेदनाशून्य बना दिया। हर माता-पिता की जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को जुए से सावधान करें और इस बुरे खेल से दूर रखें। अगर बच्चे इस भंवर में फंस गए तो पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचेगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 08:39:27 +0530</pubDate>
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                <title>छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ क्यों?</title>
                                    <description><![CDATA[एआई के दौर में उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के तौर-तरीके बदलने की जरूरत है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76399/why-play-with-the-future-of-students"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-04/answer-copy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएं जांचना बहुत जिम्मेदारी का काम होता है। अगर कोई शिक्षक इसमें लापरवाही बरतता है तो वह कई छात्रों के भविष्य से खिलवाड़ करता है। कुछ शिक्षक अपनी जिम्मेदारी सही तरीके से नहीं निभा रहे हैं। उनकी हरकतें सोशल मीडिया पर वायरल भी हो रही हैं। महाराष्ट्र में एक शिक्षक ढाबे पर नशा करते हुए उत्तर पुस्तिकाएं जांचता पाया गया, जिसके खिलाफ कार्रवाई की गई है। किसी ने उसका वीडियो बना लिया था, इसलिए उसकी हरकत का पर्दाफाश हो गया। सोचिए, अगर उसका वीडियो सामने नहीं आता तो वह नशे में डूबकर कितने बच्चों के साथ अन्याय करता? शिक्षक का आचरण हमेशा आदर्श होना चाहिए। उसे देखकर छात्रों और समाज के अन्य लोगों को प्रेरणा मिलनी चाहिए। दुर्भाग्य से, आज कुछ शिक्षक अपने पेशे की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं। अगर कोई शिक्षक नशाखोरी में डूबा हुआ है तो वह अपने छात्रों को क्या शिक्षा देगा? उसके शब्दों में सत्य का कितना बल होगा? उसे शिक्षक बनने के बजाय कुछ और बनना चाहिए। ऐसे शिक्षक उन शिक्षकों की प्रतिष्ठा को धूमिल कर रहे हैं, जो सत्यनिष्ठा से अपना कर्तव्य निभा रहे हैं। हाल के वर्षों में उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के काम में लापरवाही बरतने के भी कई मामले सामने आए हैं। कश्मीर विश्वविद्यालय में किसी छात्र को एक विषय में बहुत कम अंक दिए गए थे। जब उसने उत्तर पुस्तिका देखी तो पता चला कि उसका मूल्यांकन सही नहीं किया गया था। उस छात्र ने उच्च न्यायालय का द्वार खटखटाया तो उसे मुआवजा मिला। यह घोर लापरवाही का मामला था।</p>
<p style="text-align:justify;">ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब किसी शिक्षक ने उत्तर पुस्तिकाएं लेकर अपने बच्चों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों को दे दीं। जब किसी प्रतिभाशाली छात्र की उत्तर पुस्तिका ऐसे लोगों के हाथ लगी होगी तो उन्होंने कितनी गंभीरता से अंक दिए होंगे? ये लोग हर साल अनेक छात्रों की मेहनत पर पानी फेरते हैं। एआई के दौर में उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के तौर-तरीके बदलने की जरूरत है। इसका यह मतलब नहीं कि मूल्यांकन में शिक्षकों की कोई भूमिका नहीं होगी। एआई को उनका सहायक बनाना चाहिए। जो बोर्ड परीक्षा आयोजित करे, उसे उत्तर पुस्तिकाओं की जांच के लिए एक एआई टूल विकसित करना चाहिए। इसके बाद हर उत्तर पुस्तिका उस पर अपलोड कर दी जाए। एआई टूल हर जवाब को पढ़े और शिक्षक को सलाह दे कि उसके लिए इतने अंक दिए जा सकते हैं। शिक्षक की अनुमति के बाद सारे अंक जोड़े जाएं। इससे उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के काम में पारदर्शिता आएगी। शिक्षकों पर दबाव कम होगा। अंक जोड़ने में गलती की आशंका न के बराबर होगी। हर उत्तर पुस्तिका का रिकॉर्ड उपलब्ध रहेगा। कोई विवाद होने पर स्थिति जल्दी स्पष्ट होगी। जांच प्रक्रिया की विश्वसनीयता में वृद्धि होगी। यह पूरी प्रक्रिया सीसीटीवी निगरानी में होनी चाहिए। वहीं, शिक्षक द्वारा की गई लापरवाही को गंभीरता से लेना चाहिए। पुनर्गणना या पुनर्मूल्यांकन के लिए आने वाले आवेदनों का विश्लेषण एआई से कराया जाए। अगर एक ही शिक्षक द्वारा जांची गईं कई उत्तर पुस्तिकाओं के लिए आवेदन आएं तो विशेष जांच होनी चाहिए। अगर कोई छात्र अन्य विषयों में बहुत अच्छे अंक प्राप्त करे, लेकिन एक या दो विषयों में बहुत कम अंक आएं तो उन उत्तर पुस्तिकाओं की विशेष जांच होनी चाहिए। आचरण में अनैतिकता का प्रदर्शन करने वाले और उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के काम में लापरवाही बरतने वाले शिक्षकों को सेवाओं से हटा देना चाहिए। इससे कई छात्रों का भला हो जाएगा।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 08:57:34 +0530</pubDate>
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                <title>जादू की छड़ी नहीं एआई</title>
                                    <description><![CDATA[किसी सवाल का जवाब सोचने और लिखने से बौद्धिक विकास होता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76398/ai-is-not-a-magic-wand"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-04/study.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">गैलप और कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी के अध्ययन में विद्यार्थियों द्वारा एआई टूल्स के इस्तेमाल को लेकर जो निष्कर्ष साझा किए गए हैं, वे चिंताजनक हैं। अभी दुनियाभर में एआई के चर्चे हैं। इसे जादू की ऐसी छड़ी की तरह पेश किया जा रहा है, जिसके पास हर सवाल का जवाब है। ये जवाब कितने सही हैं? इनका आधार क्या है? इस पर अभी ज्यादा जानकारी नहीं दी जा रही है। हर काम, खासकर पढ़ाई में एआई टूल्स का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने में कई जोखिम हैं। उक्त अध्ययन के इन निष्कर्षों को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता कि एआई टूल्स पर ज्यादा निर्भरता मौलिक बुद्धि पर नकारात्मक असर डाल सकती है। कई बच्चे इनके इतने आदी हो चुके हैं कि वे ज्यादातर विषयों के गृहकार्य एआई टूल्स से पूछकर करते हैं। गणित का कोई सवाल हो, विज्ञान का कोई प्रयोग हो, अंग्रेजी या हिंदी में कोई निबंध लिखना हो, वे एआई टूल्स से पूछकर हूबहू लिख देते हैं। वे कुछ भी सोचना-समझना नहीं चाहते। उनका काम आसानी से हो रहा है। उन्हें बहुत कम मेहनत करनी पड़ रही है। बस, यह उनके लिए काफी है। माता-पिता भी यह सोचकर खुश हैं कि बच्चे जो कुछ जानना-पूछना चाहते हैं, वह सब आसानी से उपलब्ध है। इन बच्चों को अभी तो फायदे दिखाई दे रहे हैं, लेकिन लंबी अवधि में इससे बड़ा नुकसान हो सकता है। सबसे बड़ा नुकसान यह है कि सोचने-समझने और तर्क करने की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। किसी सवाल का जवाब सोचने और लिखने से बौद्धिक विकास होता है। इससे तर्क क्षमता बढ़ती है।</p>
<p style="text-align:justify;">अगर बच्चे हर सवाल का जवाब एआई से पूछकर लिखेंगे तो उनका बौद्धिक विकास कैसे होगा और तर्क क्षमता कैसे बढ़ेगी? कई बार एआई टूल्स गलत जानकारी देते हैं। विद्यार्थी उस पर आंखें मूंदकर विश्वास करते हैं। जब शिक्षक बताते हैं कि यह गलत है तो उन्हें आश्चर्य होता है कि एआई टूल्स भी गलती कर सकते हैं! हां, एआई टूल्स गलती कर सकते हैं और कई बार बड़ी गलती कर सकते हैं। एक विद्यार्थी को किसी कविता की व्याख्या लिखनी थी। उसने पृष्ठ की फोटो खींचकर एआई टूल को भेज दी। एआई ने व्याख्या तो काफी हद तक सही लिखी, लेकिन कवि का नाम गलत लिखा। हाल में उच्च न्यायालयों और उच्चतम न्यायालय में दायर ऐसी याचिकाएं चर्चा में रहीं, जिन्हें पढ़कर न्यायाधीशों ने याचिकाकर्ताओं को फटकार लगाई। उनमें ढेरों गलतियां थीं। अगर एआई टूल्स लगातार गलत जानकारी देते रहेंगे और विद्यार्थी उन पर विश्वास करते रहेंगे तो उनका भविष्य क्या होगा? वे तो गलत को ही सही मान लेंगे! अस्सी और नब्बे के दशक में स्कूली विद्यार्थियों के बीच कुंजियां बहुत लोकप्रिय होती थीं। उन्हें पढ़ना प्रशंसनीय तो नहीं माना जाता था, लेकिन विद्यार्थियों को काफी सुविधा हो जाती थी। उन्हें सवालों के जवाब आसानी से मिल जाते थे। कई विद्यार्थी गृहकार्य में कुंजी का जवाब हूबहू उतार देते थे। कुछ कुंजियों में जवाब की जगह लिखा होता था- 'छात्र स्वयं करें।' कई कुंजीप्रेमी छात्र जवाब में यही लिख देते थे। उन्हें लगता था कि जो कुछ कुंजी में लिखा है, वही सही है और हमारे लिए काफी है। शिक्षक उनकी गलती पकड़ लेते थे। जब पूछताछ होती तो वे दावा करते थे कि कुंजी से नहीं, अपनी बुद्धि से लिखा है। हालांकि बाद में गलती स्वीकार कर लेते थे। पढ़ाई में एआई टूल्स का इस्तेमाल पूरी तरह बंद नहीं करना चाहिए। इनके कुछ फायदे हैं, जिनसे विद्यार्थियों को वंचित करना उचित नहीं है। इस्तेमाल की एक सीमा निर्धारित करनी चाहिए, ताकि बच्चों का बौद्धिक विकास अवरुद्ध न हो। एआई पर पूरी तरह निर्भर होने के बजाय इसके साथ संतुलन बनाकर चलने की जरूरत है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 18:26:18 +0530</pubDate>
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                <title>असफलता का सामना करना भी सिखाएं</title>
                                    <description><![CDATA[शिक्षा प्रणाली में बड़े सुधार करने की जरूरत है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76390/teach-to-face-failure"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-04/board-results.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में विभिन्न बोर्ड परीक्षाओं के नतीजों के बीच कहीं खुशी तो कहीं गम का माहौल देखने को मिल रहा है। वहीं, कुछ बच्चे कम नंबर आने के कारण गलत कदम उठा रहे हैं, जो अत्यंत दु:खद है। हर साल ऐसा ही होता है। क्या हमारी शिक्षा प्रणाली ऐसी नहीं होनी चाहिए, जो हर बच्चे को जीवन जीने के लिए नई ऊर्जा दे? वर्तमान प्रणाली ऐसा नहीं कर रही है। जो बच्चे अच्छे अंक लेकर आते हैं, वे प्रतिभाशाली होते हैं। जो बच्चे किसी कारणवश ऐसा नहीं कर पाते, क्या उनमें कोई प्रतिभा नहीं होती? जब कोई बच्चा गलत कदम उठा लेता है तो दूसरों के लिए वह सिर्फ एक खबर होती है, लेकिन माता-पिता के लिए दु:ख का पहाड़ होता है, जिसे वे कभी नहीं भुला पाते। हर बच्चा न्यूटन-आइंस्टीन नहीं बन सकता। इस बात को समझना होगा। कई बच्चे सालभर पढ़ते हैं, लेकिन परीक्षा में उत्तर लिखते समय भूल जाते हैं या गलतियां कर बैठते हैं। इस वजह से उनके कम नंबर आते हैं। कई बच्चे खूब मेहनत करते हैं, उनके नंबर भी अच्छे आते हैं, लेकिन वे संतुष्ट नहीं होते। वे नतीजे आने के बाद खाना-पीना छोड़ देते हैं। परिजन बड़ी मुश्किल से उन्हें मनाते हैं। ये बच्चे परीक्षा की तैयारी के दौरान और नतीजे आने के बाद खुश नहीं रह पाते। अब समय आ गया है कि शिक्षा प्रणाली में बड़े सुधार हों। यह हर बच्चे की नैसर्गिक प्रतिभा को पहचाने, न कि सिर्फ ज्यादा से ज्यादा नंबर लाने पर जोर दे। इन दिनों सोशल मीडिया पर कई लोग अपने अनुभव साझा करते मिल जाएंगे, जो कभी क्लास टॉपर या बोर्ड टॉपर थे। उस समय उन्होंने अपने नंबरों के आधार पर जीवन को लेकर जो कल्पनाएं की थीं, हकीकत उससे बिल्कुल अलग निकली।</p>
<p style="text-align:justify;">बच्चों को पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें, लेकिन उन्हें असफलता का सामना करना भी सिखाएं। उन्हें बताएं कि कम नंबर लाना कोई पाप नहीं है। हां, मेहनत करनी चाहिए। बुरी आदतों से दूर रहना चाहिए। खासकर उन आदतों से जो पढ़ाई में प्रदर्शन पर नकारात्मक असर डाल सकती हैं। कई बच्चे सालभर मोबाइल फोन चलाते हैं। उस समय वे पढ़ाई की उपेक्षा करते हैं। जब उनसे कहा जाता है कि 'पढ़ाई की ओर ध्यान नहीं दे रहे हो और मोबाइल फोन बहुत ज्यादा चला रहे हो', तो वे रूठ जाते हैं। इसके बाद उन्हें मनाना पड़ता है, पढ़ाई का महत्त्व समझाना पड़ता है। वे अपनी आदत में सुधार लाने का वादा भी करते हैं, लेकिन अगले दिन वही सब दोहराने लगते हैं। वे ऐसे मौके ढूंढ़ते रहते हैं, जो उन्हें पढ़ाई से बचा लें। उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं होती है कि उनकी पढ़ाई-लिखाई के लिए माता-पिता को बहुत त्याग करने पड़ रहे हैं। उन बच्चों को अनुशासित करना चाहिए। अगर जरूरत पड़े तो मनोवैज्ञानिक परामर्श दिलाना चाहिए, अतिरिक्त कक्षाओं के विकल्प पर विचार करना चाहिए। अगर कोई बच्चा अपनी ओर से पूरी कोशिश कर रहा है। इसके बावजूद नंबरों में कहीं कमी रह जाए तो उसका मनोबल बढ़ाना चाहिए। रिश्तेदारों को एक बात याद रखनी चाहिए- किसी बच्चे की पढ़ाई-लिखाई के मामले में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें। कई रिश्तेदार ऐसे होते हैं, जो सालभर किसी से मतलब नहीं रखते, लेकिन जब बोर्ड परीक्षा का नतीजा आने वाला होता है तो वे बार-बार फोन करने लगते हैं। वे रोल नंबर मांगते हैं या खुद चले आते हैं। एक तरफ चाय-नाश्ता होता है, दूसरी तरफ बच्चे को ताने मारने का दौर चलता रहता है। आजकल के कई बच्चे इसलिए भी रिश्तेदारों से चिढ़ते हैं, क्योंकि वे परीक्षा के नतीजे आने पर उन्हें सबके सामने लज्जित करते हैं। बच्चों के साथ ऐसा बर्ताव करना ठीक नहीं है। अक्सर ऐसी घटनाएं बाद में गहरी कड़वाहट में बदल जाती हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 09:33:09 +0530</pubDate>
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                <title>ऑनलाइन दुनिया के गिद्ध</title>
                                    <description><![CDATA[कहीं अपनी पहचान छुपाकर महिलाओं को धोखा दिया जा रहा है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76382/vultures-of-the-online-world"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-04/online.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">टीसीएस और अमरावती कांड के बाद सोशल मीडिया पर ऐसे मामलों की बाढ़-सी आ गई है, जिनके बारे में पढ़-सुनकर दु:ख और आश्चर्य, दोनों होते हैं। कहीं धर्मांतरण का धंधा चल रहा है, तो कहीं अपनी पहचान छुपाकर महिलाओं को धोखा दिया जा रहा है। इंटरनेट ने ऐसे फरेबी और पाखंडी तत्त्वों को भी सुनहरा मौका उपलब्ध करा दिया है। वे एआई की मदद से फर्जी तस्वीर बनाते हैं और सोशल मीडिया पर झूठा प्रोफाइल तैयार कर युवतियों को दोस्ती और शादी का झांसा देते हैं। ऐसे लोग ऑनलाइन शिकार की तलाश में रहते हैं। उन्हें कभी निराश नहीं होना पड़ता है। दिल्ली पुलिस ने एक ऐसे शख्स को गिरफ्तार किया है, जिसने सोशल मीडिया पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर 500 महिलाओं को अपने जाल में फंसाया था। यही नहीं, उनसे 2 करोड़ रुपए भी ठगे थे! यह शख्स डेटिंग और शादी संबंधी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सक्रिय रहने वाली महिलाओं पर नजर रखता था। कभी खुद को डॉक्टर बताता, कभी फिल्म निर्माता, वकील, तो कभी कारोबारी के तौर पर खुद का परिचय देता था। वह खुद को ऐसे पेश करता, जैसे कोई बहुत बड़ा अमीर आदमी हो। वह एक ही समय में कई महिलाओं से ऑनलाइन बातें करता था। वह धीरे-धीरे रिश्ते को मधुर बनाता और एक दिन मोटी रकम उधार मांगता था। इस तरह उसने खूब ठगी की। आश्चर्यजनक रूप से, किसी महिला ने रुपए देते समय उसके माता-पिता, खानदान आदि के बारे में जांच-पड़ताल नहीं की। जो रिश्ते सिर्फ धन और शारीरिक आकर्षण से शुरू होते हैं, उनका यही अंजाम होता है। बेटियों को समझाएं कि ऑनलाइन दुनिया में ऐसे कई गिद्ध मंडरा रहे हैं, जिनकी नजर सिर्फ तन और धन पर है।</p>
<p style="text-align:justify;">उन्हें यह भी बताएं कि असल दुनिया में इतने छल-कपट हो रहे हैं तो आभासी दुनिया, जिसमें झूठ बोलना बहुत आसान है, में इनकी कोई सीमा ही नहीं है। ऐसे मामले इसलिए भी ज्यादा बढ़ रहे हैं, क्योंकि जीवनसाथी ढूंढ़ने में अच्छे चरित्र पर ज्यादा जोर नहीं दिया जा रहा है। हाल में मुंबई में एक महिला के पास ऐसे व्यक्ति का प्रस्ताव आया, जिसने अपनी आकर्षक प्रोफाइल फोटो लगाकर दावा किया था कि वह लंदन रहता है और खुद का कारोबार करता है। महिला ने उसकी कोई जांच-पड़ताल नहीं की। भारत में आज भी कई लोग इस बात से बहुत प्रभावित हो जाते हैं कि कोई व्यक्ति विदेश में रह रहा है। उन्हें लगता है कि उससे जान-पहचान या रिश्तेदारी हो गई तो हमारे लिए विदेश जाने के रास्ते खुल जाएंगे। महिला ने उस व्यक्ति के दावों पर विश्वास कर लिया। एक दिन वह उसे 7 लाख रुपए का चूना लगाकर गायब हो गया। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के एक मामले ने तो सबको हिलाकर रख दिया था। सोशल मीडिया पर खुद को आईएएस अधिकारी बताने वाले एक युवक ने दहेज में लाखों रुपए ले लिए। लड़की के परिवार ने यह सोचकर कि कोई कमी न रह जाए, शादी से संबंधित कार्यक्रमों पर खूब खर्चा किया। बाद में पता चला कि दूल्हा कोई आईएएस अधिकारी नहीं, बल्कि बहुत बड़ा ठग है। वह युवती को बेचने के लिए ले जाना चाहता था। उसने पहले भी कई युवतियों को इसी तरह धोखा दिया था। वह किराए पर मकान लेकर शिकार ढूंढ़ता और काम हो जाने के बाद गायब हो जाता था। सोचिए, उस युवती का परिवार समय रहते यह भी पता नहीं लगा पाया कि युवक का घर कहां है, माता-पिता कौन हैं, खानदान कैसा है, उनके बारे में अन्य लोगों की क्या राय है? एआई के दौर में ऐसे ठगों से पाला न पड़ जाए, इसके लिए विश्वसनीय लोगों की ही बात मानें। पूरी जांच-पड़ताल के बाद रिश्ता करें। सिर्फ धन और शारीरिक सुंदरता के मोह में फंस गए तो भविष्य में पछताना पड़ सकता है।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 09:11:42 +0530</pubDate>
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