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                <title>ओपीनियन - Dakshin Bharat Rashtramat</title>
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                <title>सोशल मीडिया के भंवर में बचपन</title>
                                    <description><![CDATA[बच्चों को अनुशासन का पाठ पढ़ाना जरूरी है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76685/childhood-in-the-whirlpool-of-social-media"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/social-media.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीयर स्टार्मर ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया ऐप्स पर प्रतिबंध लगाने संबंधी जो फैसला लिया, वह वक्त की जरूरत है। इससे पहले, मलेशिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट रखने पर रोक लगाने वाले नियम जारी किए थे। भारत सरकार को भी इस दिशा में ठोस कदम उठाने चाहिएं। देश में लाखों बच्चे ऐसे हैं, जो सोशल मीडिया पर अपना अनमोल समय बर्बाद कर रहे हैं। अभी उन्हें अच्छी बातें सीखनी चाहिएं, किताबें पढ़नी चाहिएं, खेलकूद में भाग लेना चाहिए, प्रकृति के साथ लगाव विकसित करना चाहिए। उन्हें ऐसी गतिविधियों को अपने जीवन का हिस्सा बनाना चाहिए, जो उनके व्यक्तित्व का निर्माण करें। उन्हें स्वस्थ तन, स्वस्थ मन और खुशहाल जीवन के लिए काम करना चाहिए। वे इसके बजाय सोशल मीडिया के भंवर में फंसे रहते हैं। उन्हें पता ही नहीं चलता है कि वे अपना कितना बड़ा नुकसान कर रहे हैं! यह समय कभी लौटकर नहीं आएगा। उन्हें बाद में पछतावा होगा कि सोशल मीडिया की लत ने उनसे क्या-क्या छीन लिया! कुछ घरों में छोटे बच्चों को इसलिए मोबाइल फोन दे दिया जाता है, ताकि वे व्यस्त रहें और कामकाज में बाधा न डालें। इससे बच्चे व्यस्त तो हो जाते हैं, लेकिन यहीं से उनके मन में कुछ गलत आदतों की नींव पड़ जाती है। जब उनसे मोबाइल फोन वापस लिया जाता है तो वे ज़िद करते हैं। कई तो रोने लगते हैं। ऐसे मामले भी सामने आ चुके हैं, जब किसी बच्चे को मोबाइल फोन नहीं मिला तो उसने घर में तोड़फोड़ मचा दी।</p>
<p style="text-align:justify;">जिसका बचपन ऐसा होगा, उसकी जवानी कैसी होगी? इतनी हिंसक, अस्थिर, अनुशासनहीनता की मानसिकता रखने वाला शख्स भविष्य में कैसा नागरिक बनेगा? क्या बच्चों को मोबाइल फोन थमा देना, उन्हें सोशल मीडिया पर कई घंटे बिताने की इजाजत देना उनके साथ अन्याय नहीं है? मोबाइल फोन के अत्यधिक उपयोग के कारण किशोरों का भाषाज्ञान प्रभावित हो रहा है। वे लिखने में कई गलतियां कर रहे हैं। वे पढ़ाई पर अपना ध्यान केंद्रित नहीं कर पा रहे हैं। जब वे पढ़ाई करने बैठते हैं तो पास में मोबाइल फोन रख लेते हैं। वे हर पांच-दस मिनट के बाद फोन देखते रहते हैं। उन्हें लगता है कि दुनिया की सबसे जरूरी चीज मोबाइल फोन में है और अगर उसे अभी नहीं देखा तो बहुत बड़े लाभ से वंचित रह जाएंगे। इस दौरान एक समय ऐसा आता है, जब वे सोशल मीडिया पर आकर्षक सामग्री देखते-देखते दो-तीन घंटे बर्बाद कर देते हैं। सोशल मीडिया ऐप्स इस तरह तैयार किए जाते हैं, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग उन पर समय बिताएं। जिस ऐप पर लोग जितना समय बिताते हैं, वह उतना ही कामयाब माना जाता है। यूं तो बड़ों को भी सोशल मीडिया को सीमित समय देना चाहिए, लेकिन बच्चों को इस मामले में अनुशासन का पाठ पढ़ाना जरूरी है। सोलह साल से कम उम्र के बच्चे सोशल मीडिया से दूर रहें तो उनके लिए अच्छा है। चूंकि इस उम्र में भावनाएं प्रबल होती हैं, अच्छे-बुरे की समझ कम होती है, ऐसे में सोशल मीडिया उनके लिए सुरक्षित मंच नहीं है। साइबर ठग इतने शातिर हो चुके हैं कि वे युवाओं से लेकर बुजुर्गों तक को सोशल मीडिया के जरिए चूना लगा रहे हैं। किशोर उनसे कब तक सुरक्षित रहेंगे? उनकी सुरक्षा, निजता, मन की पवित्रता और उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्हें सोशल मीडिया से दूर रखना चाहिए। यह आज की बहुत बड़ी आवश्यकता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 09:32:30 +0530</pubDate>
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                <title>कौन खोलेगा अज्ञान की यह पट्टी?</title>
                                    <description><![CDATA[पाकिस्तानी खुद को विदेशी आक्रांताओं की संतान मानते हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76678/who-will-open-this-bar-of-ignorance"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/knowledge.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के वरिष्ठ पदाधिकारी दत्तात्रेय होसबाले ने 'पाकिस्तान के साथ बातचीत' संबंधी जो टिप्पणी की, उसके विभिन्न पक्षों को सही ढंग से समझने की जरूरत है। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने भी कहा कि उनका संदर्भ देश के बजाय लोगों से बातचीत था। बंटवारे के इतने दशकों बाद भी, भारत में कई लोग असमंजस में रहते हैं कि पाकिस्तान के साथ बातचीत होनी चाहिए या नहीं होनी चाहिए! पाकिस्तान को समझने से पहले उसकी बुनियाद को समझना होगा, जिसका नाम है- दो क़ौमी नज़रिया। पाकिस्तान बनने के बाद वहां सभी लोगों को यह घुट्टी पिला दी गई कि 'हम अलग हैं'। इसकी शुरुआत चालीस के दशक से ही हो गई थी। आज उसका असर पाकिस्तानी बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक दिखाई दे रहा है। वहां के आम आदमी के मन में भारत, खासकर हिंदुओं के लिए नफरत पाई जाती है। कोई कम नफरत करता है, कोई ज्यादा करता है, लेकिन क्यों करता है? यह उन्हें नहीं मालूम। उन्हें तोते की तरह यह बात रटाई गई है कि भारत रात के अंधेरे में हमला करता है। वे इस दुष्प्रचार के शिकार हैं कि भारत ने हमेशा पहले हमला किया और पाकिस्तान ने सिर्फ जवाब दिया! यह जानकर आश्चर्य होगा कि आज भी करोड़ों पाकिस्तानी मानते हैं कि उनके देश ने हर युद्ध जीता था। वे खुद को विदेशी आक्रांताओं की संतान मानते हैं। जब तक इस झूठ का पर्दाफाश नहीं होगा, वे हमसे बेवजह नफरत करते रहेंगे। जो पाकिस्तानी आतंकवादी इधर आते हैं, हमारे सशस्त्र बलों द्वारा ढेर किए जाते हैं, वे इसी सोच के शिकार हैं। अब सोशल मीडिया के कारण सरहद के उस पार लोगों को पता चल रहा है कि उन्हें झूठ परोसा गया था।</p>
<p style="text-align:justify;">इस झूठ के आवरण को हटाने के लिए लोगों के साथ विभिन्न मंचों पर संवाद होना चाहिए। इससे उनकी सोच बदलेगी, बदल भी रही है। हालांकि उनकी संख्या कम है, लेकिन भविष्य में बेहतरी की उम्मीद की जा सकती है। जब एक शिक्षित पाकिस्तानी को पता चलेगा कि पांच पीढ़ी पहले उसके पूर्वज हिंदू थे; यह विदेशी आक्रांताओं की नहीं, बल्कि साहित्य, संगीत और कलाओं की धरती है; तक्षशिला ज्ञान-विज्ञान का केंद्र था; हम कहीं बाहर से नहीं आए थे; हम इसी धरती के बेटे-बेटियां हैं, तो उसके मन में भारत के प्रति कुछ जिज्ञासा जरूर पैदा होगी। अगर इस सोच को बड़े स्तर पर बढ़ावा दिया जाए तो हजारों पाकिस्तानी युवाओं के मन में आतंकवाद का जहर पैदा होने से पहले ही खत्म किया जा सकता है। पाकिस्तानी सरकार, फौज, आईएसआई, कट्टरपंथी संगठन और आतंकवादी संगठन यही चाहेंगे कि उन लोगों की आंखों पर अज्ञान की पट्टी बंधी रहे। यह पट्टी सिर्फ भारतीय खोल सकते हैं। इसके लिए सोशल मीडिया के जरिए ऐसी सामग्री को बढ़ावा देना चाहिए, जिससे आम पाकिस्तानी के मन में अपनी जड़ों को लेकर सवाल पैदा हो। जब उन्हें इस बात का बोध होगा कि हमारे पूर्वज एक थे, हम हजारों साल से एकसाथ रह रहे थे और कुछ नेताओं ने स्वार्थ के कारण दो क़ौमी नज़रिए की शक्ल में बंटवारे के बीज बोए थे, तो वे अपने हुक्मरानों से सवाल पूछेंगे। वे पूछेंगे कि भारत में आटा, चावल, दाल, सब्जी, दवाई, बिजली, रसोई गैस की कीमतें कम और पाकिस्तान में इतनी ज्यादा क्यों हैं? पाकिस्तानियों के हक पर डाका कौन डाल रहा है? चीजों के दाम कौन बढ़ा रहा है? जिस दिन 10 प्रतिशत पाकिस्तानी ऐसा सोचने लगेंगे, सवाल पूछने लगेंगे तो दो क़ौमी नज़रिया धराशायी होने लगेगा। यह काम जितना जल्दी हो, उतना अच्छा है। भारत मां की जो भुजाएं षड्यंत्रपूर्वक खंडित की गई थीं, वे पुन: अपने स्थान पर विराजमान हों। यह हमारा राष्ट्रीय संकल्प होना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 09:10:58 +0530</pubDate>
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                <title>कैसे सुधरेगी सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता?</title>
                                    <description><![CDATA[ऐसे शिक्षक देश का भविष्य उज्ज्वल बनाते हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76672/how-will-the-quality-of-government-schools-improve"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/school.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">बिहार सरकार ने सरकारी स्कूलों में पढ़ाई की गुणवत्ता सुधारने के लिए सरकारी शिक्षकों के कोचिंग और निजी ट्यूशन पढ़ाने पर रोक लगाने संबंधी जो फैसला लिया, वह सराहनीय है। अन्य राज्य सरकारों को भी ऐसा फैसला लेना चाहिए। सभी सरकारी शिक्षक कोचिंग और निजी ट्यूशन नहीं पढ़ाते, लेकिन कई शिक्षक ऐसा करते हैं। वे स्कूल में पूर्ण मनोयोग से अपना कर्तव्य नहीं निभाते हैं। जैसे ही स्कूल की छुट्टी होती है, वे अपनी दूसरी पारी की तैयारी में जुट जाते हैं। वहां दर्जनों बच्चे आते हैं और शिक्षक महोदय उनसे पूरा शुल्क वसूलते हैं। इस काम में गणित, विज्ञान और अंग्रेजी जैसे विषय, जो अन्य विषयों से थोड़े मुश्किल माने जाते हैं, के शिक्षकों की भागीदारी ज्यादा देखने को मिलती है। ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि जो शिक्षक कोचिंग और निजी ट्यूशन पढ़ाते हैं, वे स्कूल में पढ़ाने में जान-बूझकर सुस्ती दिखाते हैं। जिस पाठ को समझाने में ज्यादा मेहनत करनी होती है, वे उसमें पर्याप्त ऊर्जा नहीं लगाते। उनकी यह सोच होती है कि 'यहां ज्यादा मेहनत करने से कोई फायदा नहीं है, क्योंकि सरकार वेतन तो उतना ही देगी।' यह सोच हजारों विद्यार्थियों के साथ घोर अन्याय है। साथ ही, अपने कर्तव्य के प्रति उदासीनता है। जो शिक्षक अपनी पूरी ऊर्जा कोचिंग और निजी ट्यूशन में खर्च कर देगा, वह स्कूल में क्या पढ़ाएगा? उसे स्कूल में पढ़ाने के लिए प्रेरणा कहां से मिलेगी? वह तो इस सोच के साथ अपने दिन की शुरुआत करेगा कि कोचिंग और निजी ट्यूशन का प्रचार हो, वहां ज्यादा से ज्यादा बच्चे आएं, भरपूर कमाई हो, स्कूल में पढ़ाई चौपट होती है तो होती रहे। आज सरकारी शिक्षकों का वेतन बहुत अच्छा है। अब यह तर्क नहीं दिया जा सकता कि 'सरकारी शिक्षकों की आर्थिक स्थिति बहुत कमजोर है, लिहाजा अतिरिक्त कमाई के लिए कोचिंग और निजी ट्यूशन की छूट दे देनी चाहिए, क्योंकि ये वहां भी मेहनत करते हैं और बच्चों का भविष्य संवारते हैं।'</p>
<p style="text-align:justify;">सरकारें स्कूलों की दशा सुधारने के लिए हर साल अरबों रुपए खर्च करती हैं। इसमें बड़ा खर्च सरकारी शिक्षकों के वेतन-भत्तों पर होता है। इसके बावजूद ये स्कूल वैसे नतीजे नहीं दे पा रहे हैं, जैसी इनसे उम्मीद की जाती है। बोर्ड परीक्षा के नतीजों में निजी स्कूलों का ही दबदबा रहता है, जबकि इन स्कूलों के शिक्षकों का वेतन सरकारी शिक्षकों के वेतन से काफी कम होता है। देश में ऐसे सरकारी स्कूलों की संख्या हजारों में है, जहां 20 से कम विद्यार्थी हैं। जबकि उनके आस-पास निजी स्कूलों में भीड़ उमड़ रही है। क्या इस मुद्दे पर बात नहीं करनी चाहिए? सरकारी स्कूलों के संचालन में कुछ गंभीर खामियां हैं, जिन्हें बड़े-बड़े अधिकारी और नेतागण दूर नहीं कर पा रहे हैं। वहां जवाबदेही की कमी स्पष्ट झलकती है। अगर देश के इतने संसाधन खर्च हो रहे हैं तो बेहतर नतीजे दिखने चाहिएं। इसके लिए जवाबदेही तय की जाए। सरकारी शिक्षकों के कोचिंग और निजी ट्यूशन पढ़ाने पर रोक लगाई जाए। जो शिक्षक इन गतिविधियों में लिप्त पाए जाएं, उन्हें चेतावनी दी जाए। अगर वे फिर भी न मानें तो नौकरी से बाहर कर दिए जाएं। पूरे देश में ऐसा नियम लागू किया जाए कि सरकारी शिक्षक अपने बच्चों को स्कूली शिक्षा सरकारी स्कूल से ही दिलाएंगे। इस नियम के दायरे में सरकारी अधिकारियों, कर्मचारियों और जनप्रतिनिधियों को भी लाया जाए। जो सरकारी शिक्षक, अधिकारी, कर्मचारी और जनप्रतिनिधि ऐसा करने में आनाकानी करे, उसे पद से हटा दिया जाए। स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिए सरकार को कुछ कड़े कदम उठाने होंगे। सिर्फ बजट बढ़ाने, बड़ी घोषणाएं कर देने से कुछ नहीं होगा। अगर भारत को विश्वगुरु बनाना है तो हमें अपने सरकारी स्कूलों को अमेरिका और चीन के सरकारी स्कूलों से बेहतर बनाना होगा। जो सरकारी शिक्षक बहुत अच्छा पढ़ाते हैं, खूब मेहनत करते हैं, उन्हें सम्मानित करना चाहिए। ऐसे शिक्षक देश का भविष्य उज्ज्वल बनाते हैं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 08:56:50 +0530</pubDate>
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                <title>यह कैसी कॉमेडी?</title>
                                    <description><![CDATA[किसी जटिल मुद्दे को कॉमेडियन बड़ी आसानी से समझा सकता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76662/what-kind-of-comedy-is-this"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/comedy.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">देश में स्टैंड-अप कॉमेडी के नाम पर अश्लीलता परोसने का ऐसा सिलसिला चल पड़ा है, जिस पर सरकार को सख्ती दिखानी चाहिए। लोगों को हंसाने, उन्हें बेहतर महसूस कराने, खुशी का माहौल बनाने के लिए अभद्र और आपत्तिजनक शब्द बोलने जरूरी नहीं हैं। अगर किसी कलाकार के पास लोगों को हंसाने का हुनर है तो वह शालीन शब्दों के जरिए भी ऐसा कर सकता है। गलत शब्द बोलकर तालियां बटोरने की हरकत इस बात का प्रमाण है कि वह शख्स कोई कलाकार नहीं है। अक्सर उनके पक्ष में यह कुतर्क दिया जाता है कि उन्हें बहुत लोग सुनते हैं, इसलिए आपत्ति नहीं जतानी चाहिए। लोगों को बुराई जल्दी आकर्षित करती है, इसलिए अभद्र कॉमेडी जल्दी मशहूर होती है। सोशल मीडिया ने ऐसे कथित स्टैंड-अप कॉमेडियन को कुछ ज्यादा ही 'महान' बना दिया है, जो द्विअर्थी संवाद बोलकर, अश्लीलता का रंग घोलकर लोगों को हंसाने की कोशिश करते हैं। उनके वीडियो बहुत वायरल होते हैं। इससे अन्य कॉमेडियन, जो रातोंरात मशहूर होना चाहते हैं, प्रेरणा लेते हैं और आपत्तिजनक शब्दों की बौछार शुरू कर देते हैं। अब तो इन लोगों ने अश्लीलता को जल्दी मशहूर होने का संक्षिप्त सूत्र मान लिया है। जो व्यक्ति सोशल मीडिया पर आपत्ति जताता है, उसे इनके प्रशंसक यह कहकर चुप रहने की हिदायत देते हैं कि 'आपको यह सब पसंद नहीं है तो न देखें, हमें पसंद है, इसलिए हम देखेंगे।' क्या किसी गलत बात को इस आधार पर बढ़ावा देना सही है, क्योंकि उसे बड़ी संख्या में लोग पसंद करने लगे हैं? यह बहुत खतरनाक चलन है, जिसे रोका जाना चाहिए।</p>
<p style="text-align:justify;">जिन्हें यह लगता है कि अभद्र और आपत्तिजनक शब्दों के बिना किसी को हंसाया ही नहीं जा सकता, उन्हें जसपाल भट्टी के 'फ्लॉप शो' और 'फुल टेंशन' जैसे शो जरूर देखने चाहिएं। ये नब्बे के दशक में इतने मशहूर हुए थे कि इन्होंने प्रसिद्धि के नए रिकॉर्ड बना दिए थे। आज भी ये यूट्यूब पर खूब देखे जाते हैं। इन्होंने साबित किया कि मर्यादित शब्दों, मर्यादित वेशभूषा और मर्यादित दृश्यों के साथ भरपूर हास्य उत्पन्न किया जा सकता है। जनता में ऐसे शो ज्यादा पसंद किए जाते हैं, क्योंकि लोग उन्हें अपने परिवार के साथ देख सकते हैं। वे सोशल मीडिया पर बेझिझक शेयर किए जा सकते हैं। इसलिए देश में अच्छे शो के देखे जाने की संभावना आज भी बहुत ज्यादा है। क्या वर्तमान कॉमेडियन ऐसे शो बना सकते हैं? कॉमेडी में आपत्तिजनक शब्दों का तड़का लगाने के पीछे, कुछ लोगों द्वारा एक वजह यह बताई जाती है कि 'इससे ऐसा लगता है कि कॉमेडियन आधुनिक सोच वाला इन्सान है।' ऐसा सोचना ही पूरी तरह गलत है। आधुनिकता का संबंध नई और अच्छी सोच से होता है। मर्यादाहीन और ओछी हरकतें करने से कोई आधुनिक नहीं बन जाता है। कोई कॉमेडियन आधुनिक कहलाना चाहता है तो उसे सबसे पहले अपने शो में ऐसे वातावरण का निर्माण करना चाहिए, जहां बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी लोग बैठ सकें और सहज होकर हास्य का आनंद ले सकें। सिर्फ हंसा देना और तालियां बटोर लेना काफी नहीं है। कॉमेडियन को देश-दुनिया की विभिन्न समस्याओं का अपनी कला के जरिए समाधान पेश करना चाहिए। इससे लोग जागरूक होंगे। यह हकीकत है कि किसी जटिल मुद्दे को कॉमेडियन बड़ी आसानी से समझा सकता है। आज पर्यावरण प्रदूषण, नशाखोरी, साइबर अपराध जैसी बुराइयों का बोलबाला है। अगर कॉमेडियन मर्यादा में रहते हुए इन पर अपने तीखे शब्दबाण छोड़ें, राष्ट्रीय एकता का संदेश दें तो बहुत बड़ा सुधार हो सकता है।  </p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 09:20:36 +0530</pubDate>
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                <title>यह बौद्धिक अन्याय क्यों?</title>
                                    <description><![CDATA[कुछ लोग कला के नाम पर खुराफात करते रहते हैं]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76658/why-this-intellectual-injustice"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/development.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस के शासन काल में सुस्त विकास दर को हिंदू समाज से जोड़े जाने का उल्लेख कर उस अतीत की याद दिलाई है, जिसके बारे में युवा पीढ़ी को कम ही जानकारी है। उस ज़माने में पाकिस्तान में भी इस बात को लेकर हमारा बहुत मजाक बनाया जाता था। भारत ने आर्थिक सुधारों के बल पर धीरे-धीरे उस गलत धारणा को बदल दिया। देश में आज़ादी से बहुत पहले, सुधारवाद के नाम पर ऐसी विचारधाराओं ने जड़ें जमा ली थीं, जो हर बुराई को हिंदू समाज से जोड़कर देखती थीं। ऐसे कथित बुद्धिजीवियों की कमी नहीं रही, जो हर समस्या का दोष हिंदू समाज, उसमें भी ब्राह्मण समाज पर डालकर गर्व महसूस करते हैं। डेढ़ दशक पहले तक कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में देवी-देवताओं पर चुटकुले सुना दिए जाते थे। अगर कोई व्यक्ति उन पर आपत्ति जताता तो उसे असहिष्णु घोषित कर खामोश रहने के लिए मजबूर कर दिया जाता था। आपने कहानियों, फिल्मों, धारावाहिकों आदि में एक वाक्य जरूर पढ़ा-सुना होगा- 'वह तो ह...स का पुजारी है!' क्या ऐसे शब्दों का निर्माण उस समाज का अपमान नहीं है, जो अल्प संसाधनों में सदियों से भगवान की सेवा कर रहा है? बुरे चरित्र के लोग किस समाज में नहीं हैं? क्या कोई व्यक्ति यह दावा कर सकता है कि वह जिस समाज से आता है, वहां सभी दूध के धुले हैं? अखबारों, टीवी चैनलों, सोशल मीडिया में रोजाना ही ऐसी खबरें आती रहती हैं, लेकिन जनता के मन में यह बात बैठा दी गई कि बुरे लोग सिर्फ एक समाज से आते हैं। क्या यह दुर्भावनापूर्ण कृत्य नहीं है? क्या यह अक्षम्य अपराध नहीं है? क्या यह उस समाज के साथ बौद्धिक अन्याय नहीं है?</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ लोग कला के नाम पर खुराफात करते रहते हैं। इससे वे जल्द ही सुर्खियों में जगह बना लेते हैं। उन्हें आपत्तिजनक चित्र बनाने के लिए हिंदू देवी-देवता ही याद आते हैं। ऐसे ही एक कथित कलाकार ने देवताओं और भारत माता का चित्र बनाया था। जब लोगों ने उसका विरोध किया तो यह कहते हुए उनकी बुद्धि पर सवाल खड़े किए गए कि 'आपकी सोच पिछड़ी हुई है, महान कलाकार का चित्र समझना आपके बस की बात नहीं है!' यह अलग बात है कि वह कथित कलाकार बाद में कतर जाकर बस गया था। उसने वहां स्थानीय संस्कृति को लेकर ऐसी कोई कलाकारी नहीं दिखाई। अगर दिखाता तो बदले में कतर सरकार की ओर से फांसी का फंदा पाता। आश्चर्य की बात है कि यहां उसे राज्यसभा की सदस्यता, पद्मश्री, पद्म भूषण, पद्म विभूषण जैसे सम्मान मिलते रहे। उसकी कलाकारी का भ्रम इन दिनों टूट रहा है। हाल में सोशल मीडिया पर उसका एक वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वह नब्बे के दशक की एक मशहूर अभिनेत्री, जिसका वह खुद बड़ा प्रशंसक था, का चित्र बनाता नजर आता है। अभिनेत्री भी बड़ी उत्सुक दिखाई देती है कि 'इतना बड़ा कलाकार मेरा चित्र बना रहा है तो न जाने कितना अद्भुत बनाएगा!' कलाकार महोदय ने दो-चार आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचीं और ब्रुश-रंग आदि वहीं पटक कर चलते बने। आज उस चित्र को देखकर लोग लोटपोट हो रहे हैं। उनका कहना है कि इससे अच्छा चित्र तो तीसरी कक्षा का बच्चा बना सकता है। उस समय अभिनेत्री ने भी अपना माथा पकड़ लिया होगा कि यह क्या बना दिया! हमारे देश में दशकों तक ऐसे लोगों पर पुरस्कार लुटाए जाते रहे, जो हिंदू विरोधी मानसिकता रखते थे। हालांकि अब चीजें बदल रही हैं। लोग जागरूक हो रहे हैं। वे आपत्ति जता रहे हैं। वे सोशल मीडिया पर एकजुट होकर अपनी आवाज उठा रहे हैं। खुराफाती मानसिकता वाले कथित कलाकार भी अपनी हरकतों से परहेज कर रहे हैं। यह अच्छी बात है। इसका स्वागत होना चाहिए। सबकी धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 09:35:35 +0530</pubDate>
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                <title>यह है पाकिस्तान का 'कश्मीर प्रेम'!</title>
                                    <description><![CDATA[पाकिस्तान ने पीओके को बंधक बना रखा है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76651/this-is-pakistans-love-for-kashmir"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/love-kashmir.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में सशस्त्र बलों द्वारा की गई कार्रवाई में दो दर्जन से ज्यादा लोगों की मौत होने की घटना ने फिर एक बार यह साबित कर दिया है कि इस पड़ोसी देश का 'कश्मीर और कश्मीरियत' से कोई संबंध नहीं है। जम्मू-कश्मीर में जो लोग पाकिस्तान के इशारों पर अलगाववाद का राग अलापते रहे हैं, उन्हें इस घटना की जानकारी जरूर होनी चाहिए। पीओके में सशस्त्र बलों के हाथों मारे गए लोग क्या मांग रहे थे? सस्ता आटा, सस्ती बिजली और महंगाई से थोड़ी राहत। इतनी-सी बात पर मुनीर के सिपाहियों ने उनकी लाशें बिछा दीं! पाकिस्तान किसी कश्मीरी का हमदर्द नहीं है। वह लोगों को भ्रमित करने के लिए एक मुद्दा ज़िंदा रखना चाहता है, इसलिए हर मंच से कश्मीर की रट लगाता रहता है। इस घटना से यह भी साबित हो गया कि जिन्ना ने जिस मजहबी राष्ट्र का सपना देखा था, वह धोखे के सिवा कुछ नहीं है। अगर वह सच होता तो आटा मांगने पर कत्ले-आम न होता। पाकिस्तान ने पीओके को बंधक बना रखा है। वह जनता को सिर्फ जज्बाती नारे दे सकता है। नौजवानों को बम-बंदूक थमा सकता है। वह भूखे पेट को रोटी नहीं दे सकता। घर-घर बिजली पहुंचाना उसके बस की बात नहीं है। किसी को इस भ्रम में नहीं रहना चाहिए कि ऐसी घटना भविष्य में नहीं होगी। आने वाले वर्षों में पीओके समेत पाकिस्तान के विभिन्न इलाकों में ऐसे नजारे देखने को मिल सकते हैं, क्योंकि इस पड़ोसी देश ने न तो बांध निर्माण की ओर ध्यान दिया, न खेती की उन्नत विधियां विकसित कीं, न किसानों को बेहतर बीज उपलब्ध कराए और न कृषि शोध एवं अनुसंधान के क्षेत्र में कुछ किया।</p>
<p style="text-align:justify;">अब तो पाकिस्तान में हर साल आटे के लिए लंबी-लंबी कतारें लगती हैं। कई बार लोगों में भयंकर झड़पें तक हो जाती हैं। आटे की बोरी पर कब्जा करने की कोशिश में लोग जान गंवा चुके हैं। जबकि भारत में क्या हो रहा है? यहां अनाज के ढेर लगे हैं। खलिहान भरे पड़े हैं। जिसे जितना आटा चाहिए, उतना ले जाए। सरकार मुफ्त राशन दे रही है सो अलग। आटा, चावल, दाल, तेल, नमक, मिर्च, सब्जी ... किसी चीज की कोई कमी नहीं है। सोचिए, जो लोग एलओसी के इस पार यानी जम्मू-कश्मीर में हैं, वे कितने सौभाग्यशाली हैं! शुक्र मनाएं कि यहां तिरंगा लहरा रहा है, भारतीय सशस्त्र बल अपनी जान की बाजी लगाकर लोगों की रक्षा कर रहे हैं। जो लोग उस पार हैं या बहकावे में आकर उधर चले गए, आज उन्हें आटा मांगने पर दनादन गोलियां मिल रही हैं। सस्ती बिजली के बदले सांसें छीनी जा रही हैं। यह है पाकिस्तान का सच! जो मुल्क अवाम को रोटी नहीं दे सकता, सस्ती बिजली नहीं दे सकता, उस पर गोलियां बरसाता है, वह किसी और को क्या दे देगा? जो खुद नफरत में डूबा हुआ है, उसके पास दूसरों को देने के लिए क्या होगा? भारत में करोड़ों उपभोक्ताओं को नाम मात्र के शुल्क या मुफ्त में बिजली मिल रही है। केंद्र सरकार जिस तरह सौर ऊर्जा अपनाने पर जोर दे रही है, उससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि इस दशक के आखिर तक भारत बिजली उत्पादन में बड़ा कीर्तिमान रच देगा। यहां बिजली बहुत सस्ती हो जाएगी। हाल में पश्चिम एशिया में अशांति के कारण जब एलपीजी सिलेंडरों की आपूर्ति में कुछ दिक्कतें आईं तो घरों में इंडक्शन चूल्हों का उपयोग बढ़ गया। अगर सबकुछ ठीक रहा तो भविष्य में एलपीजी पर निर्भरता कम हो जाएगी। जो (अलगाववादी) इतनी उज्ज्वल संभावनाओं वाले देश के बजाय बदहाल पाकिस्तान के साथ अपना भविष्य देखता है, वह अपने और अपने परिवार के लिए बदहाली का सौदा करता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 09:07:25 +0530</pubDate>
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                <title>टीएफआर: दावे, चिंता और सच्चाई</title>
                                    <description><![CDATA[इतने लोगों को रोजगार कहां से देंगे?]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76644/tfr-claims-concern-and-truth"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/tfr.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">जब से अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क ने भारत की कुल प्रजनन दर (टीएफआर) के बारे में टिप्पणी की है, कई यूट्यूबर और टीवी चैनल ऐसा माहौल बनाने में जुट गए हैं कि देश में जनसंख्या वृद्धि रुक गई है, भविष्य में सिर्फ बुजुर्ग दिखाई देंगे और युवा तो कहीं ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेंगे! जनसंख्या जैसे विषय पर पर्याप्त अध्ययन के बाद ही कोई राय देनी चाहिए। पिछले पांच दशकों की बात करें तो यह सच है कि भारत में टीएफआर में गिरावट आई है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि जनसंख्या वृद्धि पर पूर्ण विराम लग गया है और भविष्य में कामकाज करने के लिए युवा ही नहीं बचेंगे। जनसंख्या आज भी बढ़ रही है, बस उसकी रफ्तार कुछ कम हो गई है। देश में लाखों युवा बेरोजगार बैठे हैं। वे बीस हजार रुपए की नौकरी के लिए दफ्तरों के चक्कर लगा रहे हैं, लेकिन कुछ लोगों को अचानक इस बात की चिंता सताने लगी है कि भविष्य में कामकाजी लोग नहीं रहेंगे! जो अभी काम ढूंढ़ रहे हैं, उनका क्या? पश्चिमी देशों के कुछ उद्यमी अलग ही दुनिया में रहते हैं। वे अपने वातानुकूलित कक्ष में बैठकर अंग्रेजी में जो कुछ लिख देते हैं, दुनिया में उसे अंतिम सत्य मान लिया जाता है। वे खुद को घनघोर बुद्धिजीवी साबित करने के लिए नए-नए शिगूफे छोड़ते रहते हैं। वे कहते हैं कि 'भविष्य में पृथ्वी जैसा कोई दूसरा ग्रह खोज लिया गया तो उस पर बसाने के लिए लोग कम पड़ जाएंगे ... हम इतने लोग कहां से लाएंगे?' कोई इनसे पूछे, 'पृथ्वी जैसा दूसरा ग्रह खोज भी लिया तो क्या आम आदमी वहां जा पाएगा?' ऐसे अभियानों पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं। क्या कोई पश्चिमी उद्योगपति अपनी जेब से यह रकम देगा? कभी नहीं; हमारे लिए यह पृथ्वी ही संसार है। अंतरिक्ष अनुसंधान करना अच्छी बात है, लेकिन हमें रहना पृथ्वी पर ही है। पृथ्वीवासियों का कल्याण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। क्या आज ऐसा हो रहा है?</p>
<p style="text-align:justify;">दरअसल पश्चिमी उद्योगपति जनसंख्या को लेकर ऐसे राग इसलिए अलापते रहते हैं, ताकि उन्हें सस्ते मजदूर मिलें, तैयार ग्राहक मिलें, बहुत बड़ा बाजार मिले। आज पढ़ाई, इलाज, आवास, खानपान, परिवहन सबकुछ इतना महंगा हो गया है कि लोग एक बच्चे का पालन-पोषण बड़ी मुश्किल से कर पाते हैं। भारत में ऐसे युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है, जो विवाह नहीं करना चाहते। अगर करते हैं तो संतान को जन्म नहीं देना चाहते, क्योंकि उन्होंने पढ़ाई और नौकरी में जो कुछ बर्दाश्त किया है, उसे अगली पीढ़ी पर नहीं डालना चाहते। एलन मस्क की तरह जिन कथित बुद्धिजीवियों को भारत के आम आदमी के जीवन से जुड़ीं समस्याओं की कोई जानकारी नहीं होती और वे टीएफआर बढ़ाने की बातें करते रहते हैं, उन्हें गर्मी के मौसम में कम से कम एक दिन ट्रेन के जनरल डिब्बे में सफर करना चाहिए। उन्हें दो दिन किसी सरकारी अस्पताल में भर्ती होकर अपने अनुभव लिखने चाहिएं। उन्हें तीन दिन दफ्तरों में नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र देने चाहिएं। चौथे दिन वे सारे उपदेश भूल जाएंगे। आज भारत की जनसंख्या 140 करोड़ से ज्यादा बताई जा रही है। जिस दिन यह 170 करोड़ हो जाएगी, तब क्या स्थिति होगी? इतने लोगों को रोजगार कहां से देंगे? क्या हवा सांस लेने लायक रहेगी? क्या पेयजल सबको सुलभ हो पाएगा? क्या सरकारी अस्पतालों में पर्याप्त चिकित्सा सुविधाएं मिल पाएंगी? आज का युवा जनसंख्या विस्फोट की भारी कीमत चुका रहा है। जब लोग मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं, तब ज्यादा संतानोत्पत्ति की अपील करना कहां की अक्लमंदी है? हां, इस बात पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि आज भी कई लोग आधा दर्जन से लेकर डेढ़ दर्जन तक बच्चे पैदा कर रहे हैं। उन्हें न बच्चों की शिक्षा से मतलब है, न देश के संसाधनों की कोई परवाह है। ऐसे लोगों के लिए उचित कानून बनाकर उन्हें कठोर दंड देना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 08:59:28 +0530</pubDate>
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                <title>सीजेपी का फ्लॉप शो</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76639/cjps-flop-show"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/show.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) को सोशल मीडिया पर जो प्रसिद्धि मिली, वह दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन के दौरान कहीं दिखाई नहीं दी। यह कहना गलत नहीं होगा कि उसका पहला ही प्रदर्शन 'फ्लॉप शो' साबित हुआ। कहां तो ये दावे किए जा रहे थे कि देश का युवा सीजेपी को हाथोंहाथ लेगा, वह इसका झंडा उठाकर निकल पड़ेगा, लेकिन युवा तो आया ही नहीं! विरोध प्रदर्शन में वे ही चेहरे ज्यादा दिखाई दिए, जो 'किसान आंदोलन' से लेकर अन्य विरोध प्रदर्शनों में दिखाई देते रहे हैं। प्रदर्शनकारियों में आधी भीड़ तो यूट्यूबरों और उन लोगों की थी, जो फोटो-वीडियो लेकर अपने सोशल मीडिया अकाउंट में कुछ जान डालना चाहते थे। हालांकि उन्हें निराश नहीं होना पड़ा। कई लोग ऐसे थे, जिन्हें यह तक नहीं पता था कि प्रदर्शन क्यों हो रहा है! वे केंद्रीय शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगते दिखाई दिए, लेकिन जब उनसे मंत्री का नाम पूछा गया तो बगलें झांकने लगे। कुल मिलाकर न यह प्रदर्शन नया था, न इसके लोग नए थे। हां, कॉकरोच के मुखौटे जरूर नए थे, जो युवाओं को आकर्षित नहीं कर पाए। युवा समझ चुका है कि यह देश में अस्थिरता और हुड़दंग फैलाने की मंशा रखने वालों का जमघट है। वह इसका हिस्सा नहीं बनना चाहता। वह कॉकरोच नहीं बनना चाहता। वह एक जिम्मेदार नागरिक बनना चाहता है। जो लोग इस प्रदर्शन में आए, उनमें से ज्यादातर दोपहर तक सेल्फी लेकर चलते बने! प्रदर्शन के पक्ष में माहौल बनाने के लिए कोशिशें खूब हुईं। सोशल मीडिया पर महफिल जमी। ऐसा दिखाया गया कि अभिजीत दीपके कोई महान उद्धारक बनकर आ रहे हैं, जो एक छड़ी घुमाएंगे और सारी समस्याएं दूर हो जाएंगी।</p>
<p style="text-align:justify;">सीजेपी वालों की मंशा जरूर रही होगी कि दिल्ली पुलिस उन्हें विरोध प्रदर्शन की इजाजत न दे, ताकि उसके बाद उन्हें यह कहने का मौका मिले कि 'हमारी आवाज दबाई जा रही है' और वे पूरे देश में बवाल मचाते फिरें। पुलिस ने प्रदर्शन की इजाजत देकर उस दांव की हवा निकाल दी। कुछ लोगों के मन में यह सोचकर लड्डू फूट रहे थे कि इधर युवाओं का हुजूम उमड़ेगा, उधर पुलिस के हाथ-पांव फूलेंगे ... वह अभिजीत दीपके को शांति के लिए खतरा बताकर गिरफ्तार करेगी। अगर गिरफ्तार नहीं करेगी तो दिल्ली से बाहर जाने के लिए कह देगी और सीजेपी के पास यह कहने का बहाना होगा कि भारत में असहिष्णुता बढ़ गई है। ऐसा कुछ नहीं हुआ। उनके मन में फूट रहे लड्डू बाद में फीके निकले। जब ख़याली पुलावों के सहारे सुधार करने निकलते हैं तो ऐसा ही होता है। बड़ा सवाल है- सीजेपी सोशल मीडिया पर तेजी से उभरी, उसे पूरा मौका दिया गया, वह शक्ति प्रदर्शन करने आई, लेकिन यह 'फ्लॉप शो' कैसे हुआ? दरअसल लोग सोशल मीडिया पर उभरने वाली हर चीज से कुछ ज्यादा ही उम्मीद लगा बैठते हैं। ये धरातल पर कमाल दिखा पाएं, यह जरूरी नहीं है। इसमें कोई शक नहीं कि युवाओं में आक्रोश है। पेपर लीक, धांधली, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, अत्याचार जैसे मुद्दों को लेकर युवाओं में नाराजगी है। जब वे सोशल मीडिया पर देखते हैं कि कुछ लोग पैसे और पहचान के दम पर गलत तरीके से आगे बढ़ रहे हैं, सरकारी दफ्तरों में रिश्वतखोरी है और भ्रष्ट अधिकारी बेलगाम हैं, पढ़ाई-लिखाई के बावजूद रोजगार नहीं मिल रहा है, परिवार और रिश्तेदारों से ताने सुनने पड़ रहे हैं सो अलग ... ऐसे में युवाओं के आक्रोश को भुनाने के लिए कोई मंच बनाया जाता है तो लोग उसकी ओर ध्यान देते हैं। यह स्वाभाविक है। वे भले ही उसके प्रदर्शन का हिस्सा न बनें, लेकिन मन में यह विचार रहता है कि शायद कुछ बेहतर हो जाए! यह सोचकर वे उसके सोशल मीडिया अकाउंट से जुड़ जाते हैं। सीजेपी के इस प्रदर्शन ने साबित कर दिया कि देश के युवाओं को केंद्र सरकार से शिकायत जरूर है, वहीं उम्मीद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से ही है। मोदी यह उम्मीद न टूटने दें। युवाओं की हर समस्या का समाधान होना चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
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                <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 09:02:05 +0530</pubDate>
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                <title>बच्चे कहां कहें अपने मन की बात?</title>
                                    <description><![CDATA[मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा करना भविष्य में घातक सिद्ध हो सकता है]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76631/where-should-children-express-their-feelings"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/students.jpg" alt=""></a><br /><p>केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्कूलों के लिए राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण नीति के मसौदे पर समीक्षा बैठक के बाद जो जानकारी साझा की, उससे पता चलता है कि केंद्र सरकार विद्यार्थियों के बेहतर मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रतिबद्ध है। यह एक ऐसा विषय है, जिस पर हमारे देश में खुलकर बात नहीं की गई। शारीरिक स्वास्थ्य के साथ मानसिक स्वास्थ्य भी बहुत जरूरी है। बच्चे स्कूली दिनों में कई मानसिक समस्याओं का सामना करते हैं, लेकिन उनके आस-पास ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है, जहां वे अपनी बात कह सकें। कई बच्चों को स्कूल का माहौल अच्छा नहीं लगता। उन्हें शिक्षकों से शिकायत रहती है, लेकिन उनके बारे में बोलने से डरते हैं। यह डर बाद में किसी मानसिक समस्या का रूप ले सकता है, जो उस व्यक्ति को जीवनभर परेशान करता है। एक युवती, जो आज खुद शिक्षिका हैं, अपने स्कूली दिनों को याद करते हुए भावुक हो जाती हैं। जब वे एक मशहूर स्कूल की छात्रा थीं तो वहां एक शिक्षिका उनकी पिटाई करने के बहाने ढूंढ़ती रहती थीं। शिक्षिका उन्हें पूरी कक्षा के सामने अपमानित करती थीं और इस बात का पूरा ध्यान रखती थीं कि छात्रा का आत्मविश्वास तोड़ा जाए। वह युवती जो अपनी कक्षा की सबसे शांत छात्राओं में से एक थीं, उनकी शिक्षिका उन पर शरारत करने, पढ़ाई के दौरान बात करने, इधर-उधर देखने, ध्यान कहीं और होने का आरोप लगाकर दंडित करती थीं। वर्षों बाद जब किसी कार्यक्रम में दोनों की मुलाकात हुई तो वह युवती चाह कर भी उन्हें प्रणाम नहीं कर पाईं, क्योंकि मन में इतनी कड़वाहट भरी थी, जिसे अब तक नहीं भुला पाई हैं। पुरानी बातें जिस दिन उन्हें याद आ जाती हैं, उनका पूरा दिन खराब हो जाता है। वे आज तक नहीं समझ पाईं कि वह शिक्षिका उन्हें बेवजह क्यों पीटती थी? अगर उस समय स्कूल में कोई ऐसी व्यवस्था होती, जहां जाकर वे अपने मन की बात कहतीं और वहां से उचित परामर्श पातीं तो आज उनका मानसिक स्वास्थ्य बहुत अच्छा होता।</p>
<p style="text-align:justify;">हर बच्चे की मानसिक स्थिति एक जैसी नहीं होती है। कुछ बच्चे बड़े भावुक और संवेदनशील होते हैं। वे कठोर बात बर्दाश्त नहीं कर पाते। पिछले साल राजस्थान के एक बड़े स्कूल का मामला बहुत चर्चा में रहा था। उसकी चौथी कक्षा की एक छात्रा ने छत से कूदकर जान दे दी थी। माता-पिता ने आरोप लगाए थे कि बच्ची को कई दिनों से परेशान किया जा रहा था। उसने शिक्षिका से मदद भी मांगी थी, लेकिन उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। बाद में, जब मीडिया ने उस मामले को प्रमुखता से उठाया तो स्कूल की मान्यता रद्द हुई, कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। अगर समय रहते इस ओर ध्यान दिया जाता तो वह घटना नहीं होती। मानसिक स्वास्थ्य की उपेक्षा करना भविष्य में घातक सिद्ध हो सकता है। राजस्थान में एक प्रतिभाशाली छात्र को दुर्भाग्य से ऐसा माहौल मिला, जिसकी उसने कभी कल्पना नहीं की थी। उसके संयुक्त परिवार के कुछ सदस्य उसकी पढ़ाई-लिखाई के सख्त खिलाफ थे। जब वह स्कूल जाने के लिए घर से निकलता तो वे उसे कोई काम करने के लिए कह देते थे। जब वह यह कहते हुए इन्कार करता कि मुझे स्कूल जाने में देर हो रही है, तो वे उसे खरी-खोटी सुनाते थे। जब वह कक्षा में प्रथम आता तो वे उसका हौसला बढ़ाने के बजाय कहते- 'क्या फायदा है पढ़ाई-लिखाई का, जब तुम्हें भी एक दिन यहीं बेरोजगारों के साथ भटकना है?' एक दिन तो हद ही हो गई। परिवार में किसी वृद्ध व्यक्ति का निधन हो गया था। इस घटना के हफ्तेभर बाद उस लड़के की वार्षिक परीक्षा थी। जब वह परीक्षा के लिए निकला तो परिवार के एक बुजुर्ग सदस्य ने यह कहते हुए उसका रास्ता रोक लिया कि 'घर पर रहो, यहां काफी काम है ... परीक्षा तो हर साल आती है!' ये कड़वे अनुभव बाद में उसके लिए कई शारीरिक और मानसिक बीमारियों की वजह बने। बचपन खुशहाल होना चाहिए। उसके साथ ऐसी यादें जुड़ी हों, जो चेहरे पर हमेशा मुस्कान लाएं। जो बातें बच्चों के कोमल मन पर आघात करें, उन्हें परामर्श और सूझबूझ से दूर करना चाहिए। इसके लिए हर स्कूल में उचित व्यवस्था होनी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 09:16:50 +0530</pubDate>
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                <title>इंटरनेट युग के ढोंगी </title>
                                    <description><![CDATA[दूसरों को प्रवचन देने से पहले उन्हें अपने जीवन में उतारना चाहिए]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76626/hypocrites-of-the-internet-age"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/internet.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">मथुरा में एक कथित प्रवचनकर्ता बाबा द्वारा कई युवतियों से दुष्कर्म और ब्लैकमेलिंग का मामला सिर्फ एक शख्स के अपराधों की कहानी नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई ढोंगी पकड़े गए हैं, जो साधु का पवित्र वेश धारण कर अनैतिक कर्म कर रहे थे। मथुरा से पकड़े गए शख्स का मामला इसलिए चौंकाता है, क्योंकि आरोपी बहुत मेधावी छात्र रहा है। वह आईआईटी उत्तीर्ण करने के बाद एक कंपनी में उच्च वेतन पर नौकरी कर चुका है। उसे तकनीक की बहुत अच्छी जानकारी है, जिसका इस्तेमाल उसने अपना जाल फैलाने में किया। उसने इंटरनेट के जरिए प्रवचन दिए और अपना साम्राज्य बनाने लगा। उसे इसमें कामयाबी मिलनी शुरू हुई थी कि मामला यौन शोषण के आरोपों तक जा पहुंचा। धर्म तो आत्मज्ञान का मार्ग दिखाता है। जो व्यक्ति सच्ची भक्ति में लीन रहता है, उसका मन सांसारिक प्रलोभनों से दूर हो जाता है। उसे किसी तरह का साम्राज्य खड़ा करने की कामना नहीं होती। वह दुष्कर्म और ब्लैकमेलिंग जैसे घिनौने कृत्यों की कल्पना तक नहीं कर सकता। अगर कोई व्यक्ति ऐसे कुकृत्य करता है तो उसका धर्म से कोई संबंध नहीं है। वह मनुष्य कहलाने के योग्य भी नहीं है। हमारे पूर्वजों ने इसीलिए कहा था- 'पाणी पीओ छाण, गुरु बणाओ जाण' अर्थात् पानी पीना हो तो उसे पहले छानें, ताकि वह स्वच्छ हो जाए और किसी को गुरु बनाना हो तो उसे पहले जानें, परखें। यदि उसमें उचित गुण पाएं तो ही उसे गुरु स्वीकार करें। जो व्यक्ति खुद को सबसे बड़ा ज्ञानी, सर्वशक्तिमान बताए, बड़ी-बड़ी डींगें हांके, हमेशा धन इकट्ठा करने में दिलचस्पी लेता रहे और जिसका चरित्र अच्छा न हो, ऐसे व्यक्ति से तुरंत दूर चले जाने में भलाई है। अन्यथा भविष्य में पछताना पड़ सकता है।</p>
<p style="text-align:justify;">दूसरों को प्रवचन देने से पहले उन्हें अपने जीवन में उतारना चाहिए। इसके लिए अध्ययन, मनन और चिंतन करना पड़ता है। गुरु के मार्गदर्शन में तपस्या करनी होती है। हमारे देश में रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि अरविंद जैसे महान संत हुए हैं। उन्होंने तपस्या का मार्ग अपनाया था। उसके बाद वे पूजनीय हुए थे। अब इंटरनेट ने उन लोगों के लिए काफी आसानी पैदा कर दी है, जो भक्ति और तपस्या करना नहीं चाहते। वे कैमरे के सामने स्क्रिप्ट बांच लेते हैं। एआई की मदद से अच्छा वीडियो तैयार कर लेते हैं। फिर उसके जरिए अपना माहौल बनाने निकल पड़ते हैं। चूंकि उनके मन में न तो असली वैराग्य होता है, न उन्हें भक्ति की समझ होती है और न ही विषय-वासनाओं से कोई विरक्ति होती है, इसलिए जब थोड़ी-सी कामयाबी मिल जाती है तो सारी हदें पार कर देते हैं। वे जितनी तेजी से उभरते हैं, उतनी ही तेजी से पतन को प्राप्त होते हैं। उनके अनुयायियों को तब बड़ा झटका लगता है, जब कच्चा चिट्ठा खुलकर सामने आता है। जब किसी ढोंगी का नकली आभामंडल टूट जाता है, तब कुछ लोगों को धर्म पर सवाल उठाने का मौका मिल जाता है। वे सभी साधु-संतों को एक जैसा मानकर टीका-टिप्पणी करने लगते हैं। यह अनुचित है। सभी लोग एक जैसे नहीं हो सकते। किसी एक व्यक्ति के कृत्यों के आधार पर सबको उसी श्रेणी में खड़ा कर देना उन सबके साथ अन्याय है। आज भी देश में ऐसे संत हैं, जो बहुत अनुशासित रहकर जनकल्याण कर रहे हैं। वे मान-अपमान से कोसों दूर रहते हैं। उन्हें धन-संपदा का ढेर डिगा नहीं सकता। वे खुद को भक्तिमार्ग का एक पथिक ही समझते हैं। करोड़ों लोग ऐसे संतों से प्रेरणा लेते हैं। उनका यश अमर रहता है।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 09:39:47 +0530</pubDate>
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                <title>ऐसा कब तक चलेगा?</title>
                                    <description><![CDATA[ऐसे मामलों में सख्ती से जांच होनी चाहिए]]></description>
                
                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76619/how-long-will-this-go-on"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/delhi.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">दिल्ली के मालवीय नगर में स्थित एक होटल में भीषण आग लगने से 20 से ज्यादा लोगों की मौत होना अत्यंत दु:खद है। किसी ने नहीं सोचा होगा कि आग की लपटों में इस तरह इन्सानी जानें भस्म हो जाएंगी। हमारे देश में आए दिन ऐसे हादसे हो रहे हैं। कहीं आग लग जाती है, तो कहीं इमारत ढह जाती है। उनमें आम लोग मरते हैं। हादसे के बाद सोशल मीडिया पर तस्वीरें वायरल होती हैं। जनता आक्रोश जताती है। कुछ अधिकारियों का निलंबन होता है। मुआवजे की घोषणा कर दी जाती है। उसके बाद सबकुछ शांत! फिर किसी नए हादसे का इंतजार होता है। आखिर, ऐसा कब तक चलेगा? दिल्ली का जो होटल आग की चपेट में आया, वहां निर्माण संबंधी अनुमति को लेकर कई सवाल खड़े हो रहे हैं। अगर किसी ने नियमों का उल्लंघन करते हुए ज्यादा मंजिलें बना दीं तो उस समय अधिकारी क्या कर रहे थे? क्या वे तमाशबीन बने हुए थे? सवाल सिर्फ इस एक हादसे का नहीं है। जब भी कहीं आग लगती है, इमारत ढहती है तो यह बिंदु सामने आता है। अधिकारी समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं करते? वे उस समय कहां व्यस्त रहते हैं? अगर अधिकारी अपना कर्तव्य ठीक ढंग से निभाएं, नियम-विरुद्ध काम करने की अनुमति किसी स्थिति में न दें तो ऐसे हादसों को काफी हद तक टाला जा सकता है। सरकार भी ऐसे अधिकारियों को सिर्फ निलंबित करती है। यह कोई सजा नहीं है। बाद में, ये वापस बहाल हो जाते हैं। ऐसे मामलों में सख्ती से जांच होनी चाहिए। जो अधिकारी दोषी पाया जाए, उसे नौकरी से बर्खास्त करना चाहिए। उसकी संपत्ति की जांच होनी चाहिए। कोई अधिकारी इतना लापरवाह और भ्रष्ट है कि उसके कारण लोगों को जान गंवानी पड़ रही है तो उसके लिए उचित जगह दफ्तर नहीं, बल्कि जेल है।</p>
<p style="text-align:justify;">कुछ दिन बाद जब मानसून अपनी पूरी ताकत के साथ आएगा तो कई इलाकों से हादसों की खबरें आएंगी। यह कोई नई बात नहीं है। ऐसा हर साल होता है। कहीं राह चलते लोग गड्ढे में गिर जाते हैं। कोई शख्स अपना परिवार पालने के लिए नौकरी करने जाता है, लेकिन बीच रास्ते में करंट के कारण जान गंवा बैठता है। कहीं आवारा पशु किसी वाहन से टकरा जाता है। कहीं सड़क इतनी खराब है कि वहां गिरने से कई लोगों के हाथ-पांव टूटते हैं। क्या हम पहले से अनुमान लगाकर इन हादसों को टालने के लिए उचित कदम नहीं उठा सकते? यह कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है। कहां हादसे होते हैं, कहां कैसी समस्या है - अधिकारी इन बातों से अपरिचित नहीं हैं। उन्हें थोड़ी इच्छाशक्ति दिखानी होगी। आग लगने के बाद कार्रवाई करने से कहीं बेहतर है, आग लगने की आशंका को कम या खत्म कर दें। कई बार ऐसी खबरें आती हैं कि किसी इलाके में आग लगी तो दमकल बुलाई गई, लेकिन वाहन को आगे आने में परेशानी हुई, क्योंकि रास्ता ही नहीं था। अधिकारी आंखें मूंदे रहे और लोग अतिक्रमण करते रहे। जो रास्ता कभी वाहनों के लिए छोड़ा गया था, उस पर इतनी दीवारें खड़ी कर दी गईं कि अब राहगीर सही-सलामत निकल जाए, यही काफी है। कई दुकानदार अपनी दुकान के आगे सामान की नुमाइश लगाते हैं। वे उसे इतनी आगे बढ़ा देते हैं कि रास्ता अवरुद्ध हो जाता है। इससे वाहनों के निकलने के लिए पर्याप्त जगह नहीं बचती। कई बार लड़ाई-झगड़े होते हैं, लेकिन हालात नहीं बदलते। प्रशासन अतिक्रमण हटाने के नाम पर कोई अभियान चलाता है तो कुछ दिन नुमाइश नहीं लगती। उसके बाद वही ढाक के तीन पात! इस तरह हादसे नहीं रुकेंगे, बल्कि बढ़ते जाएंगे। इन्हें रोकने के लिए अधिकारियों को नियमों का सख्ती से पालन कराना होगा। इस काम में आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करें और लोगों की जान बचाएं।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 09:12:28 +0530</pubDate>
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                <title>घुसपैठ और भ्रम का जाल</title>
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                                    <content:encoded><![CDATA[<a href="https://www.dakshinbharat.com/article/76612/web-of-infiltration-and-confusion"><img src="https://www.dakshinbharat.com/media/400/2026-06/learn.jpg" alt=""></a><br /><p style="text-align:justify;">पश्चिम बंगाल में भाजपा सरकार द्वारा बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकाल भगाने की कार्रवाई शुरू किए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय मीडिया का एक वर्ग उनके पक्ष में माहौल बनाने में जुट गया है। उससे प्रभावित होकर भारत में भी कुछ लोग सोशल मीडिया पर घुसपैठ के मुद्दे पर नरम रुख अपना रहे हैं। यह भ्रम का जाल है। हमें इससे दूर रहना चाहिए। मीडिया का उक्त वर्ग ऐसी कहानियां दिखा रहा है, जो घुसपैठियों के साथ ज्यादा से ज्यादा उदारता बरतने की अपील करती हैं। एक घुसपैठिया कहता है कि वह बचपन में भारत आ गया था, क्योंकि मां-बाप उसे यहां ले आए थे। आज वह 38 साल का है। उसने यहीं शादी की थी। यहीं उसके बच्चे हुए। बच्चों की भी शादियां कर दीं। अब उसे बांग्लादेश जाने के लिए 'मजबूर' किया जा रहा है! क्या इन घुसपैठियों ने भारत आकर हम पर कोई उपकार किया है कि इन्हें आगे भी बर्दाश्त करें? अगर मां-बाप का हाथ पकड़कर भारत आए थे तो अब उन्हीं से सवाल पूछें- मुझे यहां क्यों लाए थे? क्या भारत सरकार ने यहां आकर शादी करने का न्योता भेजा था? यह कोई करुण कथा नहीं, बल्कि पिछली सरकारों के ढीले रवैए का एक उदाहरण है। ये लोग बांग्लादेश से उठकर यहां आ जाते हैं। उसके बाद शादियां करते हैं। बच्चों को जन्म देते हैं। यहां के संसाधनों पर मौज करते हैं। जब सरकार इन्हें निकालती है तो अपनी समस्याएं गिनाने लगते हैं। क्या आपकी समस्याओं के लिए भारत सरकार या पश्चिम बंगाल सरकार जिम्मेदार है? जब बांग्लादेश बने लगभग साढ़े पांच दशक हो गए, वहां एक सरकार है, जनप्रतिनिधि हैं, अदालतें हैं, तो बांग्लादेशी नागरिक अपने अधिकार उनसे मांगें। अब वही पुरानी कैसेट न चलाएं कि बांग्लादेश जाकर क्या करेंगे, कहां रहेंगे? इन सवालों के जवाब बांग्लादेशी सरकार से लें, उसके प्रधानमंत्री से लें।</p>
<p style="text-align:justify;">हाकिमपुर सीमा चौकी पर कई बांग्लादेशी महिला-पुरुष अपने बच्चों को लेकर जा रहे हैं। उन्होंने बच्चों को गोद और कंधों पर बैठा रखा है। उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर डालकर कुछ लोगों को केंद्र सरकार और प. बंगाल सरकार को कोसने का सुनहरा मौका मिल गया है। वे इसे बच्चों के साथ अन्याय बता रहे हैं। वे सरकार पर निशाना साधने के बजाय इन घुसपैठियों से सवाल क्यों नहीं करते? क्या इन्होंने हमारे देश में अवैध ढंग से प्रवेश कर अपने ही बच्चों का भविष्य दांव पर नहीं लगाया था? क्या इन्होंने उनके साथ अन्याय नहीं किया? शुक्र मनाएं कि भारत सरकार ने बहुत मानवता दिखाई है। अगर चीन, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में पकड़े जाते तो लेने के देने पड़ जाते। कोई बांग्लादेशी नागरिक भारत में घुसपैठ करता है तो उसके साथ भविष्य में जो कानूनी कार्रवाई होगी, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होगा। भारत सरकार और प. बंगाल सरकार को पूरा हक है कि वे घुसपैठियों की पहचान करें, उन्हें चेतावनी दें, जेल में डालें और देश से बाहर निकालें। उन्हें आज स्वदेश जाने का मौका दिया जा रहा है। इसका उन्हें आगे बढ़कर फायदा उठाना चाहिए। यह समझें कि अभी मुफ्त में छूट रहे हैं। अगर भविष्य में सख्ती हुई तो यह मौका हाथ से निकल जाएगा। उस सूरत में जेल जाने, सजा पाने की नौबत आ सकती है। बांग्लादेशी घुसपैठिए कोई मेहमान नहीं हैं कि इनके स्वागत-सत्कार के लिए हम पलक-पांवड़े बिछाएं। कुछ कथित बुद्धिजीवी इन घुसपैठियों को राशन, मकान, रोजगार जैसी सुविधाएं दिलाने के लिए अदालतों में चले जाते हैं। वे इतनी चिंता भारतीय नागरिकों की नहीं करते, जितनी घुसपैठियों की करते हैं। इनकी दलीलें बहुत चल गईं। अब सरकार को सख्ती बढ़ानी चाहिए।</p>]]></content:encoded>
                
                                                            <category>ओपीनियन</category>
                                    

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                <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 09:23:44 +0530</pubDate>
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