शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे
शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे

मुंबई/दक्षिण भारत। महाराष्ट्र में शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस के गठबंधन वाली सरकार के अस्तित्व में आने के साथ ही आगे की राह कैसी होगी, इस पर खूब चर्चा हो रही है। चूंकि मौजूदा गठबंधन में शिवसेना की विचारधारा बाकी दोनों पार्टियों से काफी अलग है, ऐसे में सोशल मीडिया पर यह सवाल खूब पूछा जा रहा है कि कहीं मुख्यमंत्री पद के लिए शिवसेना ने यह जुआ तो नहीं खेल लिया। यही नहीं, कुछ यूजर्स तो ‘महाराष्ट्र के महाभारत’ की तुलना ‘कर्नाटक के सियासी नाटक’ से कर रहे हैं और यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि कहीं उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के कुमारस्वामी न बन जाएं!

विश्लेषकों का मानना है कि शिवसेना, राकांपा और कांग्रेस गठबंधन के लिए सरकार चलाना बड़ी चुनौती साबित होगा। खासतौर से उद्धव ठाकरे के लिए मुख्यमंत्री पद किसी कांटों के ताज से कम नहीं होने वाला। यह भी कहा जा रहा है कि अगर भविष्य में ‘तीन पहियों’ की गाड़ी पर ‘तीन ड्राइवर’ दावा करने लग जाएं तो यह किस राह जाएगी!

बहरहाल शिवसेना के खेमे में उल्लास है, उत्साह की लहर है क्योंकि पहली बार ठाकरे परिवार से कोई शख्स मुख्यमंत्री पद संभालने जा रहा है। चूंकि अब तक शिवसेना हिंदुत्व की विचारधारा पर चलती रही है और समय-समय पर प्रखर हिंदुत्व का नारा बुलंद करती रही है। क्या नए गठबंधन में वह उसी तरह खुलकर हिंदुत्व का पक्ष ले पाएगी?

हिंदुत्व समर्थक मतदाताओं को साधना अब कठिन
अभी शिवसेना के प्रवक्ता टीवी चैनलों पर होने वाली चर्चा में कांग्रेस को लेकर बहुत सजगता बरत रहे हैं और ऐसे शब्दों के इस्तेमाल से बच रहे हैं जिनसे कल तक कांग्रेस पर जमकर प्रहार करते थे। क्या शिवसेना भविष्य में भी अपने इसी रुख पर कायम रह पाएगी? शिवसेना के साथ वर्षों से जुड़े मतदाताओं में उन लोगों की बड़ी तादाद है जो हिंदुत्व के समर्थक और कांग्रेस की नीतियों के विरोधी रहे हैं। नए राजनीतिक ​परिवेश में शिवसेना के लिए उन मतदाताओं को साधना कठिन होगा।

महाराष्ट्र में ‘बड़े भाई’ का दर्जा
इसके अलावा, गठबंधन सरकार में मतभेदों के बीच समाधान की राह निकालना भी आसान नहीं होगा। मुख्यमंत्री पद पाने के बाद शिवसेना की महत्वाकांक्षाएं बढ़ना स्वाभाविक है और वह महाराष्ट्र में राजनीतिक दलों के बीच ‘बड़े भाई’ का दर्जा पाना चाहेगी। हालांकि सीटों के लिहाज से वह भाजपा से काफी दूर रही है। क्या खुद को विस्तार देने की चाह में शिवसेना का राकांपा और कांग्रेस से टकराव नहीं होगा?

कांग्रेस पर भी उठेंगे सवाल
अभी शिवसेना महाराष्ट्र की सत्ता का नेतृत्व करने के लिए तैयारियों में जुटी है लेकिन आने वाले दिन उद्धव के लिए किसी ‘​अग्निपरीक्षा’ से कम नहीं होंगे। चुनाव से पहले भाजपा से गठबंधन और बाद में राकांपा-कांग्रेस के साथ जाने पर शिवसेना विधायकों से जनता सवाल जरूर करेगी, जो उन्हें असहज कर सकते हैं। वहीं, कांग्रेस पर भी ‘सांप्रदायिक’ ताकतों को बढ़ावा देने के आरोप लगेंगे। इन सबके बीच राकांपा प्रमुख शरद पवार फायदे में नजर आते हैं जो विपक्ष में बैठने की बात कहकर सरकार में शामिल हो गए।

शिवसेना के सामने दोहरी चुनौती
अब शिवसेना के सामने दोहरी चुनौती होगी। उसे गठबंधन सहयोगियों के साथ सरकार चलाते हुए महाराष्ट्र की जनता की विभिन्न समस्याओं का समाधान करना होगा। वहीं, पार्टी और गठबंधन विधायकों में पनपने वाले असंतोष का भी ध्यान रखना होगा। अगर कहीं भी असंतुलन पैदा हुआ तो ‘महाराष्ट्र का महाभारत’ ‘कर्नाटक के सियासी नाटक’ को दोहरा सकता है।