उच्चतम न्यायालय
उच्चतम न्यायालय

नई दिल्ली/दक्षिण भारत। अयोध्या मामले में उच्चतम न्यायालय ने नौ नवंबर को अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया जिसे देश ने खुले दिल से स्वीकार किया और शांति व सद्भाव बरकरार रखकर एक मिसाल भी कायम की। अब कुछ कथित बुद्धिजीवी मामले को उलझाकर फिर अड़ंगा डालने की कोशिश कर रहे हैं।

उच्चतम न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका दाखिल की गई है। इसमें विभिन्न मानवाधिकार कार्यकर्ताओं समेत करीब 40 ‘बुद्धिजीवियों’ ने अनुरोध किया है कि अयोध्या मामले में दिए गए फैसले पर पुनर्विचार किया जाए। यही नहीं, वर्षों तक चले मामले और सुनवाई के दौरान न्यायालय द्वारा कई ऐतिहासिक सबूतों के अवलोकन के बावजूद इन बुद्धिजीवियों की दलील है कि फैसले में तथ्यात्मक और कानूनी त्रुटियां हैं।

आहत महसूस कर रहे ‘बुद्धिजीवी’!
इन कथित बुद्धिजीवियों में इतिहासकार इरफान हबीब, अर्थशास्त्री प्रभात पटनायक, मानवाधिकार कार्यकर्ता हर्ष मंदर, नंदिनी सुंदर और जॉन दयाल का नाम प्रमुखता से शामिल है। इन्होंने दावा किया है कि अयोध्या मामले में उच्चतम न्यायालय ने जो फैसला दिया है, ये उससे बहुत आहत हैं। इन बुद्धिजीवियों की ओर से याचिका दायर करने में वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण बड़े मददगार साबित हुए हैं।

हालांकि जानकारों की मानें तो ‘बुद्धिजीवियों’ की इस याचिका पर अनिश्चय के बादल पहले ही मंडराने लगे हैं। चूंकि तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने गत वर्ष 14 मार्च को ही साफ कर दिया था कि मामले में दलीलें पेश करने की अनुमति सिर्फ मूल मुकदमे के पक्षकारों को ही होगी। तब कुछ कार्यकर्ताओं को हस्तक्षेप की अनुमति देने से मना कर दिया गया ​था।

यह था उच्चतम न्यायालय का फैसला
बता दें कि अयोध्या मामले में नौ नवंबर को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने फैसला सुनाया ​था कि 2.77 एकड़ विवादित जमीन राम लला को दी जाए। साथ ही सुन्नी वक्फ बोर्ड को अन्यत्र पांच एकड़ जमीन मुहैया कराने का आदेश दिया।

फैसले के बाद भूमि विवाद के वादियों में से एक हिंदू महासभा, सुन्नी वक्फ बोर्ड को पांच एकड़ जमीन आवंटित करने के आदेश के खिलाफ उच्चतम न्यायालय पहुंची और ‘सीमित पुनर्विचार’ की मांग की। इसके अलावा, उसने विवादित ढांचे को मस्जिद घोषित करने वाले निष्कर्षों को हटाने की भी मांग की।

क्या है महासभा की दलील?
हिंदू महासभा की दलील है कि विवादित ढांचे पर मुसलमानों का कोई अधिकार या मालिकाना हक नहीं है, लिहाजा उन्हें पांच एकड़ जमीन आवंटित नहीं की जा सकती। महासभा का कहना है कि किसी भी पक्षकार ने मुसलमानों को जमीन देने का अनुरोध या कोई दलील नहीं दी थी।

महासभा के वकील विष्णु शंकर जैन ने कहा कि हिंदुओं ने यह प्रमाणित किया कि विवादित स्थल पर भगवान राम की पूजा की जाती रही है, जबकि मुस्लिम पक्षकार यह साबित नहीं कर सके कि विवादित निर्माण मस्जिद थी। अब देखना यह है कि उच्चतम न्यायालय इन याचिकाओं पर क्या फैसला लेता है।