चंद्रयान-2
चंद्रयान-2

बेंगलूरु/दक्षिण भारत। अंतरिक्ष में अनेक कीर्तिमान रचकर भारत को गौरवान्वित करने वाले इसरो ने अपनी स्थापना के 50 साल पूरे कर लिए हैं। 15 अगस्त, 1969 को अस्तित्व में आए इसरो ने देश को ऐसे कई अवसर दिए जब सबने गर्व की अनुभूति की। इसरो की पहली महत्वपूर्ण परियोजना सैटेलाइट टेलीकम्युनिकेशन एक्सपेरिमेंट प्रोजेक्ट (स्टेप) थी। इससे देश के सुदूर गांवों तक टीवी प्रसारण को मुमकिन बनाया गया। समुद्री इलाकों में मछुआरे जिस रीयल टाइम निर्देशिका पर नजर रखते हैं, उसे तैयार करने में इसरो की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

भारत की इस अंतरिक्ष एजेंसी को धैर्यपूर्वक और निरंतर अपने काम में जुटे रहने वाले संस्थान के तौर पर जाना जाता है। इस साल इसरो ने चंद्रयान-2 का प्रक्षेपण कर एक और कीर्तिमान कायम कर दिया, जब विश्व की महाशक्तियों सहित सभी देशों की निगाहें इसरो के वैज्ञाानिकों की ओर थीं। चंद्रयान-2 इसरो की ऊंची उड़ान में मील का पत्थर है जिसने विद्यार्थियों को विज्ञान के अध्ययन के लिए भी प्रेरित किया है।

गुरुवार (15 अगस्त) को जब देश स्वतंत्रता के 73वें वर्ष का उत्सव मना रहा था, तो इसरो के लिए यह दिन दुगुने उत्साह से भरा था। यह साल इसरो का स्वर्ण जयंती वर्ष भी है। इसके अलावा, यह भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के जनक विक्रम साराभाई का शताब्दी वर्ष भी है।

प्रगति के पथ पर बढ़ता गया इसरो
जब देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम की पहली बार कल्पना की गई, तो यह स्पष्ट प्राथमिकता थी कि अंतरिक्ष विज्ञान के जरिए सबसे पहले अपने नागरिकों की मदद करनी चाहिए। यही वजह है कि पृथ्वी अवलोकन और संचार पर ध्यान केंद्रित किया गया। विक्रम साराभाई की परिकल्पना थी कि हमारा देश अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के साथ आत्मनिर्भर बने।

इसरो प्रमुख के. सिवन ने कहा कि साराभाई का प्रारंभिक विचार यह था कि अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी का उपयोग आम आदमी के लाभ के लिए किया जाना चाहिए.. यह हमारे लिए मार्गदर्शक बल रहा है। हमारे सभी कार्यक्रम इस दृष्टि के आसपास केंद्रित थे, जिसके कारण कई अनुप्रयोग किए गए। सिवन ने कहा कि हम ‘नए बीजारोपण’ के पथ पर गतिशील हैं, जिनका लाभ भविष्य में मिलेगा।

50 वर्षों में बदल गए हालात
इसरो से जुड़े एक ​वरिष्ठ वैज्ञानिक ने बताया कि अंतरिक्ष एजेंसी अपने क्षेत्र से आम आदमी की जरूरतों की पूर्ति के लिए प्रतिबद्ध है। बात संचार उपग्रह की हो या रिमोट सेंसिंग और पृथ्वी के अवलोकन की, इसरो ने पिछले 50 वर्षों में बहुत प्रगति की है।

एक समय था जब इसरो अपने उपग्रहों के निर्माण और प्रक्षेपण के लिए विदेशी मदद पर ज्यादा निर्भर था। आपने सोशल मीडिया में ऐसी तस्वीरें देखी होंगी जब उपग्रह को बैलगाड़ी पर लादकर प्रक्षेपण स्थल तक लाया गया। अब हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। इसरो के वैज्ञानिक अपनी प्रतिभा और परिश्रम से ऐसे मिशन को अंजाम दे चुके हैं जिनकी वजह से कई देशों के लिए यह पसंदीदा एजेंसी बन चुकी है। वे अपने उपग्रहों के प्रक्षेपण में इसरो की मदद लेते हैं। मिसाल के तौर पर, पिछले तीन वर्षों में ही इसरो ने कुल 239 वाणिज्यिक उपग्रहों का प्रक्षेपण किया है।

कई परियोजनाओं में भागीदारी
इसरो अब अमेरिका की मशहूर अंतरिक्ष एजेंसी नासा के साथ बतौर भागीदार परियोजनाओं में काम कर रहा है। इसके अलावा चंद्रमा पर खोज के लिए जापान के साथ परियोजना, मंगल ग्रह संबंधी खोज के लिए नासा के साथ संयुक्त परियोजना और शुक्र व सौर प्रणाली से जुड़ी परियोजनाओं पर काम कर रहा है। देशवासियों को इसरो के एक और कीर्तिमान का इंतजार है।

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