प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'मन की बात' कार्यक्रम की 137वीं कड़ी में ऐसे लोगों को पहचान दिलाई है, जो अपने सकारात्मक कार्यों से सामाजिक उत्थान में उल्लेखनीय योगदान दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश के रामपुर जिले के पटवाई गांव के युवाओं द्वारा स्वच्छता के लिए किए गए प्रयास प्रशंसनीय हैं। पहले, इस गांव में स्वच्छता की स्थिति ठीक नहीं थी, लेकिन आकाश और रोहन नामक युवकों ने आगे बढ़कर मुहिम शुरू की, जिससे अन्य लोग जुड़ गए। इन युवाओं के हौसलों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये अब तक गंगा के चार घाट साफ कर चुके हैं। इसके अलावा, एक टन से ज्यादा प्लास्टिक कचरा हटा चुके हैं। इनकी मेहनत के कारण कई तालाब और सार्वजनिक स्थान चमक गए हैं। अगर इस मुहिम का प्रसार पूरे भारत में हो जाए तो हमारा देश पूरी दुनिया में सबसे स्वच्छ हो जाए। अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि 'भारत में तो जगह-जगह कूड़े के ढेर लगे हैं ... सरकार क्या कर रही है?' उन्हें यह सवाल भी पूछना चाहिए- हम क्या कर रहे हैं? अगर लोग गंदगी फैलाना बंद कर दें तो यह स्वच्छता की ओर सबसे बड़ा कदम होगा। जापान, सिंगापुर और ब्रिटेन जैसे देशों का उदाहरण दिया जाता है कि वे बहुत साफ-सुथरे हैं। असल में, वहां लोग बहुत जागरूक हैं। जब नागरिक सार्वजनिक स्वच्छता का ध्यान रखेंगे तो देश को स्वच्छ रखना बहुत आसान हो जाएगा। स्वच्छता सिर्फ एक नारा बनकर न रह जाए। अगर लोग आगे आकर 'मोर्चा' संभालें, सार्वजनिक स्थानों की सफाई करें तो यह देश कुछ ही दिनों में स्वच्छता के मामले में शीर्ष पर आ सकता है।
इस बार अमरनाथ यात्रा के दौरान पशुओं के अपशिष्ट को बायोगैस में बदलने का जो प्रयोग किया गया, वह अद्भुत है। हमारे देश के पास पशुधन की कमी नहीं है। गांवों में कई परिवारों के पास एक से ज्यादा बड़े पशु होते हैं। वहां यह प्रयोग सफलतापूर्वक आगे बढ़ाया जा सकता है। इस साल मार्च में जब पश्चिम एशिया में तनाव बहुत बढ़ गया था, तब कई गैस एजेंसियों के सामने ग्राहकों की लंबी कतारें लग गई थीं। उस समय वे लोग निश्चिंत थे, जिनके घरों में बायोगैस की सुविधा थी। सोशल मीडिया पर उनकी बहुत चर्चा हुई थी। यह जानकर आश्चर्य हुआ था कि इन परिवारों ने वर्षों से गैस सिलेंडर नहीं लिए, क्योंकि बायोगैस के कारण जरूरत ही नहीं पड़ी थी। अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस के दाम कितने बढ़ते हैं, उन्हें इसकी चिंता नहीं होती है। उन्हें गैस सिलेंडर का इंतजार नहीं करना पड़ता है। अगर ऐसी व्यवस्था गांवों के घर-घर में हो जाए तो एलपीजी खरीदने पर खर्च होने वाली धनराशि की बचत हो जाए। चूंकि हर गांव में व्यक्तिगत संयंत्र लगाना संभव नहीं है, इसलिए पंचायत स्तर पर सामुदायिक बायोगैस संयंत्र लगाने पर जोर देने की जरूरत है। इससे ज्यादा संख्या में परिवार जुड़ेंगे। इसके लिए उनसे हर महीने पशु अपशिष्ट और मामूली शुल्क लिया जा सकता है। यह व्यवस्था देश के आयात बिल का बोझ काफी हल्का कर सकती है। बायोगैस संयंत्र से निकलने वाली स्लरी से जैविक खाद बनाई जा सकती है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता बढ़ेगी। साथ ही, फसलों के उत्पादन में वृद्धि से किसान लाभान्वित होंगे। आजादी के बाद, भारत में बायोगैस को बढ़ावा देने के लिए प्रयास हुए थे, लेकिन सीमित संसाधनों और लोगों को पर्याप्त जानकारी न मिलने के कारण ज्यादा सफलता नहीं मिली थी। अब देश के पास संसाधन ज्यादा हैं। जानकारी पहुंचाने के लिए कई मंच हैं। आत्मनिर्भर रसोईघर बनाने के लिए इस समय का सदुपयोग करना चाहिए।