भारत में कुछ राजनीतिक पार्टियां वित्तीय अनुशासन की अनदेखी कर रही हैं। वे मुफ्त चीजें एवं मुफ्त सुविधाएं देने का वादा कर सत्ता में आती हैं और अपना वोटबैंक पक्का करने के लिए खजाना खोल देती हैं। एक पार्टी की सरकार सोने की अंगूठियां देने जा रही है। एक और पार्टी की सरकार कह रही है कि वह दूसरी और तीसरी संतान पैदा करने वाले दंपतियों को प्रोत्साहन राशि देगी। अब तो राजनीतिक पार्टियों ने चुनाव जीतने का शानदार नुस्खा ढूंढ़ लिया है। वे एक वर्ग को सरकारी खजाने से धनराशि भेजकर इसे विकास की ओर कदम बताती हैं। जो पार्टी ज्यादा से ज्यादा मुफ्त चीजें एवं मुफ्त सुविधाएं देने की बात करती है, वह उतनी ही बड़ी जनहितैषी मानी जाती है। सवाल है- क्या इससे असल समस्याओं का समाधान होगा? जनता को शिक्षा और चिकित्सा संबंधी सुविधाएं जरूर मुफ्त मिलनी चाहिएं। इनमें उच्च कोटि की गुणवत्ता होनी चाहिए। मेहनती और ईमानदार लोगों को प्रोत्साहन देने के लिए उन्हें सस्ती कीमत पर कुछ सुविधाएं दे सकते हैं। इससे अन्य लोगों को प्रेरणा मिलेगी। वे भी मेहनत करेंगे, ईमानदारी अपनाएंगे। जो पार्टियां वोटबैंक को लुभाने के लिए तोहफे और रुपए बांट रही हैं, वे इनके लिए धन कहां से ला रही हैं? क्या नेतागण अपने बैंक खातों से दे रहे हैं? नहीं, यह धन लोगों पर लगाए गए करों से आ रहा है। इस राशि का बहुत सूझबूझ से उपयोग करना चाहिए, क्योंकि अभी देश के सामने अनेक चुनौतियां हैं। कई सरकारी स्कूल जर्जर इमारतों में चल रहे हैं। कई सरकारी अस्पतालों में मरीजों के लिए पर्याप्त बिस्तर और जरूरी दवाइयां तक नहीं हैं। सार्वजनिक परिवहन की हालत किसी से छिपी नहीं है। रोजगार के पर्याप्त अवसरों का सृजन नहीं हो रहा है।
दुनिया के जिन देशों में लोकलुभावन योजनाएं चलाई गईं, वहां वित्तीय समस्याएं कम नहीं हुईं, बल्कि कालांतर में बढ़ीं। वेनेजुएला ने तो खुद की अर्थव्यवस्था ही चौपट कर डाली। कभी इसका नाम दुनिया के समृद्ध और खुशहाल देशों में शामिल किया जाता था। इसके पास तेल का बहुत बड़ा भंडार है। इसने तेल बेचकर खूब धन कमाया था। अगर वह धन नागरिकों को आत्मनिर्भर बनाने पर खर्च किया जाता तो आज इस देश की तस्वीर कुछ और होती। इसके नेता अपनी जनसभाओं में लोकलुभावन घोषणाएं करते और देश का धन लुटाते थे। चूंकि तेल बिक रहा था, इसलिए बढ़ते खर्चों की परवाह नहीं थी। सरकारों ने निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने के बजाय राष्ट्रीयकरण पर जोर दिया और लोगों को सरकारी नौकरियां बांटीं। उन्होंने यह कहते हुए अपनी 'उपलब्धियों' का ढिंढोरा पीटा कि जनकल्याण ऐसे किया जाता है। सरकारी दफ्तरों में काबिल और मेहनती कर्मचारियों के बजाय आरामपसंद लोगों की भीड़ इकट्ठी हो गई, जिसने उद्योगों को डुबो दिया। लोगों को कौशल सीखने के लिए प्रोत्साहित करने के बजाय मुफ्त राशन, सस्ता पेट्रोल और नकद सहायता दी गई। जब इतनी चीजें मुफ्त मिल रही हों तो कौन मेहनत करेगा? तेल के भंडार होने के बावजूद वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था कमजोर होती गई। इसके नेताओं ने वैज्ञानिक शोध और अनुसंधान में रुचि नहीं दिखाई। यह देश पुरानी मशीनों को ही ढोता रहा। जब तेल की कीमतें नीचे आईं और अमेरिका के साथ तनातनी बढ़ी तो अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ने लगा। सरकार ने खर्चे पूरे करने के लिए खूब नोट छापे, जिससे मुद्रास्फीति आसमान छूने लगी। जो लोग प्रतिभाशाली थे, उन्हें देश का भविष्य दिखने लगा था, इसलिए वे विदेशों में बस गए। आज वेनेजुएला एक पस्त मुल्क है। उसे इस चक्र से बाहर निकलने का कोई रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। वित्तीय अनुशासन एक गंभीर विषय है। इसकी अनदेखी भविष्य में कई समस्याएं लेकर आती है।