झारखंड में झामुमो सरकार के लिए आगे कुआं, पीछे खाई जैसी स्थिति पैदा हो गई है। उच्च न्यायालय ने जेपीएससी की 11वीं से 13वीं परीक्षाओं के माध्यम से चयनित सरकारी कर्मियों की नियुक्तियां रद्द करने से संबंधित अधिसूचनाओं के अमल पर रोक लगा दी है। पहले, सरकार ने प्रदर्शनकारियों के दबाव में 44 भर्ती परीक्षाएं रद्द करने की घोषणा की थी। बाद में, जिन लोगों की नौकरियां गईं, वे मैदान में आ डटे। उच्च न्यायालय का क्या फैसला आएगा, किसे राहत मिलेगी, किसकी नौकरी जाएगी, अदालती लड़ाई यहीं तक सीमित रहेगी या उच्चतम न्यायालय में जाएगी - जैसे सवाल अपनी जगह हैं। कई युवा तो ऐसे हैं, जो अन्य विभागों की नौकरी छोड़कर आए थे। वे रातोंरात सड़क पर आ गए हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, न ही आखिरी बार हो रहा है। सरकारी नौकरियों की मांग बढ़ती जा रही है। उनसे जुड़े विवादों में भी बढ़ोतरी हो रही है। कई भर्तियां अटकी पड़ी हैं। कई भर्ती परीक्षाओं के मामले अलग-अलग न्यायालयों में चल रहे हैं। देश के इन युवाओं का कैसा भविष्य होगा? दुनिया के जितने भी विकसित और समृद्ध देश हैं, वहां सरकारी नौकरियों के प्रति ऐसा आकर्षण बिल्कुल भी देखने को नहीं मिलता है। आखिर, हमसे कहां गलती हुई कि रोटी कमाने को ही जीवन का उद्देश्य समझ बैठे हैं? क्या हम सिर्फ रोटी के लिए धरती पर आए हैं? जब अंग्रेजी राज में कथित आधुनिक शिक्षा की शुरुआत हुई थी, तब कहा जाता था कि यह लोगों को जीने का सलीका सिखाएगी। आज पढ़-लिखकर युवा धरने पर बैठ रहा है कि मुझे नौकरी दें। वह नौकरी मांगते हुए कहीं पटरियां उखाड़ता है, कहीं पत्थर फेंकता है, कहीं हंगामा खड़ा करता है।
भारत में बेरोजगारों का सैलाब कहां से आ गया? क्या इस देश में हमेशा ही बेरोजगारी थी? क्या किसी ग्रंथ में उल्लेख मिलता है कि नालंदा, तक्षशिला या अन्य विश्वविद्यालयों में पढ़ने के बाद युवा बेरोजगार घूमते थे और राजा के महल के सामने धरना देते थे कि हमें सरकारी नौकरी दें? हमारे ऋषि-मुनि सच्चे मायनों में मनुष्य बनाते थे। वे जो कुछ पढ़ाते थे, वह जीवन में काम आता था। आज जो बेरोजगारी दिखाई दे रही है, उसकी जड़ें अंग्रेजी राज से जुड़ी हुई हैं। लोगों के दिलो-दिमाग में यह बात घर कर गई कि सरकारी नौकरी ही सबकुछ है। उन्होंने अपने पुश्तैनी काम का सम्मान करना बंद कर दिया। समाज में ऐसी कहावतें जोर-शोर से फैलीं- 'पढ़े फारसी जोते खेत, किस्मत निकली कोरी रेत; पढ़े फारसी बेचे आटा, यह देखो किस्मत का घाटा; पढ़े फारसी बेचे तेल, यह देखो कुदरत का खेल!' क्या पढ़ाई-लिखाई के बाद खेती करना, आटा बेचना या तेल बेचना अपराध है? अगर शिक्षित व्यक्ति ये काम करेगा तो उसमें सफल होने की संभावना ज्यादा होगी। कई लोगों ने ऐसा करके दिखाया है। समाज को यह सोच बदलनी होगी कि पढ़ाई-लिखाई का उद्देश्य 'कुर्सी वाली नौकरी' है। इस सोच ने कई परिवारों के जमे-जमाए धंधे उजाड़ दिए। उनकी संतानें किसी काम में रुचि भी लें तो कहा जाता है- 'बेटा, यह काम तेरे लिए नहीं है। तू तो पढ़ ले।' पढ़ाई का महत्त्व अपनी जगह है। इससे कोई इन्कार नहीं कर सकता। क्या बच्चों को कामकाज में रुचि लेने से रोकना उनकी जिज्ञासा का दमन करना नहीं है? कई लोग कहते हैं- 'हमने अपनी बेटी को इसलिए पढ़ाया है, ताकि उसे चूल्हा-चौकी न करना पड़े!' यह भी 'पढ़े फारसी...' की तरह एक गलत सोच को बढ़ावा देने की कोशिश है। खाना बनाना, कपड़े धोना, घर की सफाई करना, बर्तन साफ करना - जैसे काम सबको जरूर सीखने चाहिएं। जिन्हें ये काम नहीं आते, वे दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं और कभी-न-कभी पछताते हैं। हर काम का सम्मान करें। इसी से बेरोजगारी दूर होगी और घरों में खुशहाली आएगी।