अद्भुत देश भारत!

हर देश की अपनी समस्याएं हैं

भारत खान-पान के मामले में स्वर्ग है

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारतीय चुनाव प्रणाली की शक्ति एवं सामर्थ्य के बारे में की गई टिप्पणी के बाद ऐसे अनेक क्षेत्रों की चर्चा होना स्वाभाविक है, जिनमें भारत कई 'विकसित' देशों से बहुत आगे है। हमारे देश में साजिशन नकारात्मकता का बहुत प्रचार किया गया, इसलिए लोगों को इस बात पर आसानी से विश्वास नहीं होता है। भारत में कई लोगों को लगता है कि कथित विकसित देशों में हर कोई सुखी है, वहां सोना बरस रहा है और अपने देश की हर चीज खराब है। इसमें कोई शक नहीं कि भारत में कुछ समस्याएं हैं, लेकिन ऐसा सिर्फ भारत में नहीं है। हर देश की अपनी समस्याएं हैं। अपनी तमाम समस्याओं के बावजूद, भारत खान-पान के मामले में स्वर्ग है। जितने पकवान यहां बनते हैं, उतने किसी देश में नहीं बनते हैं। यहां आज भी रोटी बहुत सस्ती है। फलों और सब्जियों का तो कहना ही क्या! गांवों-कस्बों में दस-बीस रुपए की ताजा सब्जी पूरा परिवार खा सकता है। ऐसा अमेरिका में संभव नहीं है। एक भारतीय नागरिक ने जापान में तरबूज का भाव पूछा तो हैरान रह गया। वहां एक मामूली तरबूज की कीमत भारतीय मुद्रा में लगभग एक हजार रुपए थी, जबकि उससे ज्यादा अच्छा तरबूज यहां बीस-तीस रुपए में बड़ी आसानी से मिल सकता है। गांवों में तो और सस्ता मिल सकता है। अमेरिका में एक किलो आलू की कीमत लगभग 200 रुपए है। भारत की सब्जी मंडियों में बीस-तीस रुपए किलो के भाव में अच्छे आलू मिल जाते हैं। अगर घर के किसी कोने में खाली जगह हो और वहां आठ-दस आलू यूं ही लगा दें तो धरती माता उन्हें कई गुना करके वापस देती है। ब्रिटेन में हरी सब्जियां बहुत महंगी बिकती हैं। अमरूदों के भाव बहुत ज्यादा होते हैं। वहीं, भारतीय मंडियां इन चीजों से भरी पड़ी हैं और कीमतें सामान्य हैं।

भारत में फरवरी के आखिर में जैसे ही गर्मी बढ़ने लगती है, कई लोग मौसम को कोसने लगते हैं। वे कहते हैं कि 'काश, हम किसी ठंडे मुल्क में पैदा होते तो बात ही कुछ और होती।' उन्हें एक बार रूस के याकुत्स्क का चक्कर लगाकर आना चाहिए। वहां माइनस पचास डिग्री से. तक तापमान चला जाता है। हर कहीं बर्फ ही बर्फ देखने को मिलती है। सर्दियां बहुत कठोर होती हैं। गर्मियों की अवधि छोटी होती है, जिसमें आलू, गाजर, पत्तागोभी, चुकंदर जैसी गिनती की सब्जियां उगा सकते हैं। सर्दियों में सब्जियां दूसरे इलाकों से मंगानी पड़ती हैं, जो बहुत महंगी होती हैं। बाहर निकलने से पहले भारी-भरकम ऊनी कोट, दस्ताने, टोपी, जूते पहनने पड़ते हैं। अगर नहीं पहनेंगे तो शरीर का कोई हिस्सा सुन्न पड़ सकता है, जिसे बाद में हटाने की नौबत आ सकती है। एक पर्यटक का कान सुन्न पड़ गया था, जिसे तुरंत चिकित्सा सहायता लेनी पड़ी थी। अगर थोड़ी देर और हो जाती तो ज़िंदगीभर पछताते। भारत पर सूर्यदेव अपनी अपार कृपा बरसाते हैं। ठंडे देशों के लोग यहां आकर धूप सेकते हैं, ताकि तन-मन को थोड़ा सुकून मिले। अगर हमने इतनी धूप का सदुपयोग करने के लिए कोई तकनीक विकसित की होती तो आज ऊर्जा के मामले में आत्मनिर्भर होते। हमें एलपीजी सिलेंडरों के लिए विदेशों पर निर्भर नहीं होना पड़ता और हर साल अरबों डॉलर बचते सो अलग। भारत के तीज-त्योहार अर्थव्यवस्था को ऊर्जावान बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दीपावली पर दीपक, तेल और बाती से ही लाखों लोगों तक धन का प्रवाह हो जाता है। ऐसा अर्थशास्त्र कितने देशों के पास है? हमारे हर त्योहार का कोई-न-कोई वैज्ञानिक आधार जरूर होता है। हमें इन पर गर्व करना चाहिए। अगर हमारे नेता और अधिकारी गंभीरता एवं ईमानदारी से काम करें, जनता अपनी जिम्मेदारी ठीक ढंग से निभाए तो भारत सबसे समृद्ध और खुशहाल देश बन सकता है।

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