भारत की चुनाव प्रणाली से सीखे अमेरिका

भारत में चुनाव को लोकतंत्र का उत्सव माना जाता है

अब हर वोट का हिसाब रखना आसान हो गया है

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारतीय चुनाव प्रणाली की शक्ति और सामर्थ्य को खुलकर स्वीकार किया है। इतने विशाल और विविधतापूर्ण देश में चुनाव कराना कोई मामूली बात नहीं है। कई देशों की कुल आबादी से ज्यादा लोग तो भारत में एक दिन में मतदान कर देते हैं। अमेरिका, जो आधुनिक तकनीक और संसाधनों के मामले में महाशक्ति माना जाता है, का प्रशासन अपने 23 करोड़ मतदाताओं तक पहुंचते-पहुंचते हांफने लगता है, जबकि भारत इससे लगभग 4.2 गुना मतदाताओं के लिए पूरी व्यवस्था करता है। यहां चुनाव को लोकतंत्र का उत्सव माना जाता है। ट्रंप  यह जानकर हैरान हैं कि वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में 64 करोड़ से ज्यादा लोगों ने वोट डाले थे! यही नहीं, हर मतदाता के पास फोटो युक्त मतदाता पहचान पत्र है। ट्रंप को और भी हैरानी होगी, अगर उन्हें पता चले कि भारत में नब्बे के दशक की शुरुआत में ही फोटो युक्त मतदाता पहचान पत्र आ गए थे। इस दस्तावेज तक सभी मतदाताओं की आसान पहुंच है। अमेरिका में अभी तक ऐसा नहीं हुआ है। भारत में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में हजारों उम्मीदवार खड़े होते हैं। उनका पूरा रिकॉर्ड रखने, मतदान के लिए इंतजाम करने, मतगणना करने और नतीजे घोषित करने तक लाखों कर्मचारी बहुत मेहनत करते हैं। ईवीएम का इस्तेमाल भारत की वैज्ञानिक काबिलियत का एक और प्रमाण है, जिसने चुनाव प्रक्रिया का सरलीकरण किया है। पहले, मतपत्रों की छपाई में करोड़ों रुपए खर्च होते थे। मतदान के दौरान कई विवाद भी होते थे, जो मतगणना तक पीछा नहीं छोड़ते थे। ऐसे मामले अदालतों में चले जाते थे, जिन्हें सुलझाना काफी मुश्किल होता था। ईवीएम ने ऐसी कई समस्याएं खत्म कर दीं। अब हर वोट का हिसाब रखना आसान हो गया है।  

भारत में वीवीपीएटी व्यवस्था मतदाता को अपने मत की कागजी पुष्टि देखने का अवसर देती है। कितने 'विकसित' देशों में ऐसी व्यवस्था है? अमेरिका में चुनावों के अधिकांश नियमों के निर्माण और उनका पालन कराने की जिम्मेदारी राज्यों एवं स्थानीय प्रशासन के पास है। वहां मतदाता पंजीकरण, पहचान सत्यापन, डाक मतदान और मतदान की अन्य प्रक्रियाओं में कई जटिलताएं हैं। भारत में जब चुनाव होते हैं तो लोकतांत्रिक मशीनरी एक साझा नियम-पुस्तिका के तहत चलती है। यहां सभी राज्यों में मतदाता पहचान पत्र को मान्य दस्तावेज समझा जाता है। अमेरिका के कई राज्यों में पहचान सत्यापन के तौर-तरीकों में अंतर देखने को मिलता है। उसके लिए एक कथन सुनने को मिलता है- '50 राज्य और 50 तरह की चुनाव व्यवस्थाएं!' अमेरिकी प्रणाली विकेंद्रीकरण पर जोर देती है, जो कई बार उसकी कमजोरी बन जाती है। मौजूदा हालात में ट्रंप की यह मांग प्रासंगिक है कि मतदाता पंजीकरण के समय नागरिकता का प्रमाण और मतदान के लिए पहचान पत्र अनिवार्य किया जाए। वे चुनावों में धांधली के आरोप लगा चुके हैं। वहां बड़ा सवाल यही है कि मतदाता की पहचान कैसे सत्यापित की जाए? जबकि भारत इस समस्या का दशकों पहले समाधान कर चुका है। अमेरिका को भारत के अनुभवों से सीखते हुए अपनी चुनाव प्रणाली को बेहतर बनाना चाहिए। उसे अपने हर मतदाता का फोटो युक्त मतदाता पहचान पत्र जरूर बनाना चाहिए। मतदाताओं का पंजीकरण करने, मतदाता सूची को निरंतर अद्यतन करने, सूची का रखरखाव करने की प्रक्रिया एक जैसी रखनी चाहिए। अपात्र लोगों के नाम हटाकर मतदाता सूची को शुद्ध करना जरूरी है। अगर ट्रंप भारत की चुनाव प्रणाली में अपने देश के लिए कोई सबक देखते हैं तो यह स्वागत-योग्य है। एक-दूसरे के अनुभवों से सीखने और मतदाताओं के विश्वास को मजबूत करने से लोकतंत्र मजबूत होता है।

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