दिल्ली के जंतर-मंतर पर सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के दौरान विपक्ष के नेताओं में जेन ज़ी का हमदर्द बनने की होड़ मच गई थी। हर कोई जोशीले बयान देकर खुद को क्रांतिकारी साबित करना चाहता था। वहीं, रांची में प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के बाद सब खामोश हैं या बहुत नपे-तुले शब्दों में बयान दे रहे हैं। कथित क्रांति की जो ज्वाला दिल्ली में धधक रही थी, उसे रांची का रास्ता दिखाई नहीं दे रहा है। ये दोहरे मापदंड क्यों? सरकार भाजपा की हो या कांग्रेस की, या किसी अन्य पार्टी की, युवाओं से जुड़े कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जो भविष्य में उनके लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होंगे। पेपरलीक तो सिर्फ एक मुद्दा है। मान लीजिए कि अगले 10 वर्षों तक कोई पेपरलीक नहीं होगा, लेकिन उन युवाओं का क्या होगा जिन्हें किसी परीक्षा में सफलता नहीं मिलेगी? उन युवाओं का क्या होगा जो बार-बार परीक्षाएं देंगे और नतीजे देखकर निराश होंगे? अगर भविष्य में वे भी कोई संगठन खड़ा कर हंगामा करेंगे तो सरकार क्या करेगी? भारत की आज़ादी के बाद दो तरह के चलन को काफी बढ़ावा मिला, जिसके नतीजे आज सरकारों के लिए सिरदर्द बन गए हैं। पहला, हर विद्यार्थी को डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी अफसर बनने का सपना दिखाया जाता है। अगर नहीं बने तो क्या होगा - इस बारे में कुछ नहीं बताया जाता है। दूसरा, पढ़ाई-लिखाई का मकसद आराम की ज़िंदगी समझा जाता है। सरकारों ने भी इन्हें बदलने के लिए कुछ नहीं किया। किस राजनीतिक पार्टी में इतनी हिम्मत है कि वह इन दोनों बिंदुओं को चुनौती दे? जो ऐसा करेगी, अपना वोटबैंक गंवाएगी।
युवा भी सच सुनने को तैयार नहीं हैं। कई तो इसलिए डॉक्टर बनना चाहते हैं, क्योंकि उन्हें बचपन से ही इसका सपना दिखाया गया था। उन पर रिश्तेदारों, पड़ोसियों, दोस्तों आदि का दबाव होता है। उन्हें खुद से भी पूछना चाहिए- 'क्या मैं सच में डॉक्टर बनना चाहता हूं? क्या यह मेरा फैसला है?' हमारे देश में ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाएंगे, जब कोई एक लड़का पटवारी या क्लर्क बन गया तो पूरा मोहल्ला इन्हीं परीक्षाओं की तैयारी में लग गया। राजस्थान के झुंझुनूं जिले के एक गांव में किसी लड़के का चयन वायुसेना में हो गया। इस घटना के बाद उसके ताऊ, चाचा, रिश्तेदारों, पड़ोसियों ... सबके लड़के वायुसेना भर्ती की तैयारी में जुट गए। एक लड़का जो सीए की पढ़ाई कर रहा था, वह भी उस मंडली में शामिल हो गया। हालांकि, उनमें से किसी का चयन वायुसेना में नहीं हुआ। कई लोग ऐसे हैं, जिनकी पढ़ने-पढ़ाने में कोई रुचि नहीं है, लेकिन वे बीएड करके बैठे हैं कि एक दिन मास्टरजी बन जाएंगे। राजस्थान के गांव का एक व्यक्ति, जो नब्बे के दशक में बिहार से बीएड करके आया था, का आज तक शिक्षक भर्ती परीक्षा में चयन नहीं हुआ। उसने समय रहते कपड़ों की दुकान खोल ली, जो बढ़िया चल निकली। उसने बीएड इसलिए की थी, क्योंकि उसके पिता सरकारी शिक्षक थे, जिन्होंने बहुत मजे में नौकरी की थी। वे न कभी छात्रों को पढ़ाने पर ध्यान देते थे, न कभी परीक्षा के नतीजों की परवाह करते थे। ठाठ से अपना साइड बिजनेस करते रहे और एक दिन सेवानिवृत्त हो गए। भरपूर पेंशन, समाज में रौब, रिश्तेदारों में विशेष सम्मान मिला सो अलग। उनका रुतबा देखकर कई लोगों ने बीएड की, लेकिन सफलता किसी को नहीं मिली। अगर उस शिक्षक के बेटे ने बीएड करने के बजाय कपड़ों के व्यापार से संबंधित कोई प्रशिक्षण लिया होता तो अपने पेशे में बहुत उन्नति करता। हर विद्यार्थी डॉक्टर नहीं बन सकता, इंजीनियर नहीं बन सकता, अफसर नहीं बन सकता और न ही हर विद्यार्थी शिक्षक बन सकता है। हमारी शिक्षा पद्धति ऐसी होनी चाहिए, जो हर विद्यार्थी की नैसर्गिक प्रतिभा को पहचाने और उसे उपयुक्त क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करे।