अनुच्छेद 370 हटाए जाने के सात साल पूरे होने पर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेताओं द्वारा जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा बहाल किए जाने की मांग का क्या मतलब है? क्या वे चाहते हैं कि केंद्र शासित प्रदेश उसी पुराने दौर में लौट जाए? उसके एक मंत्री के इन शब्दों से तो यही लगता है- 'हम मांग करते हैं कि हमारा विशेष दर्जा और हमसे छीने गए अधिकार बहाल किए जाएं।' जम्मू-कश्मीर से ऐसे कौनसे अधिकार छीन लिए गए, जो ये नेता वापस चाहते हैं? जिस अनुच्छेद 370 की याद में ये भावुक हुए जा रहे हैं, उसने जम्मू-कश्मीर में अलगाववाद और भेदभाव को बढ़ावा दिया था। वह संपूर्ण भारत के साथ जुड़ाव पैदा करने में बड़ी बाधा बना हुआ था। क्या 21वीं सदी में जम्मू-कश्मीर में ऐसी व्यवस्था स्वीकार की जानी चाहिए, जब भारत की संसद द्वारा बनाए गए कानून वहां स्वत: लागू न हों? याद करें, अनुच्छेद 370 हटाए जाने से पहले कितनी प्रशासनिक जटिलता पैदा होती थी! उस समय वहां अलग झंडा लहराता था। एक संप्रभु राष्ट्र में इसकी इजाजत बिल्कुल नहीं होनी चाहिए। जब देश के अन्य राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की तुलना में अलग संवैधानिक व्यवस्था रहेगी तो राष्ट्रीय एकता की बात भूल ही जाएं। अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर में उद्योगों को पनपने ही नहीं दिया था। निवेश के मार्ग में भारी बाधाएं आती थीं। इससे जनता को नुकसान हुआ था। युवाओं में बेरोजगारी फैली, कमाई के अवसर सीमित रहे। उक्त अनुच्छेद ने खास तरह की राजनीतिक विचारधारा के लिए उपजाऊ जमीन तैयार की थी। उस विचारधारा के समर्थक कभी संतुष्ट नहीं रहते थे। वे हमेशा भारत को लाल आंखें दिखाते रहते थे। वे प्रेस वार्ताओं में आग उगलते थे, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती थी।
अनुच्छेद 370 वह दीवार थी, जो अपने विशेष प्रावधानों के कारण कुछ वर्गों को संपत्ति, सरकारी नौकरी और अन्य अधिकारों तक पहुंचने से रोकती थी। नेशनल कॉन्फ्रेंस और अन्य पार्टियों के वे नेता जो विशेष दर्जा बहाल करने की मांग कर रहे हैं, के बच्चे बेहतरीन शिक्षण संस्थानों में पढ़ते हैं। वे आम लोगों के उन बच्चों के बारे में क्यों नहीं सोचते, जिनकी प्रगति के रास्ते अनुच्छेद 370 ने रोके थे? वास्तव में, इस अनुच्छेद के कारण जम्मू-कश्मीर की सत्ता कुछ परिवारों तक सीमित रही। घूम-फिरकर वे ही शासन करते थे, वे ही नीतियां बनाते थे। विशेष संवैधानिक व्यवस्था का फायदा उन परिवारों को ही मिला था। आम कश्मीरियों के मन में यह बात बैठाने की कोशिश की गई कि वे सबसे अलग हैं। जब अन्य राज्यों से कोई व्यक्ति वहां जाता तो उसे चिढ़ाने के लिए कई तरीके अपनाए जाते थे। लोगों का यह अनुभव रहा है कि जब उन्होंने किसी स्थानीय व्यक्ति से समय पूछा तो उसने घड़ी देखकर पाकिस्तान का मानक समय बताया था। किसी स्थानीय व्यक्ति ने पूछा, 'आप कहां से आए हैं?' जब शहर का नाम बताया (जैसे- दिल्ली, बेंगलूरु, जयपुर आदि) तो उसने मुस्कुराकर कहा, 'अच्छा, आप इंडिया से आए हैं!' कई लोग पाकिस्तान के साथ एकजुटता का प्रदर्शन करते हुए, उसके द्वारा बताई गईं तारीखों पर त्योहार मनाते थे। कुछ तो अलगाववाद में इतने आगे बढ़ गए थे कि उन्होंने पाकिस्तानी इलाकों के नाम पर जम्मू-कश्मीर के इलाकों के नकली नाम रख दिए थे। वे कई शब्दों का उच्चारण उसी तरह करने लगे थे, जैसे पाकिस्तानी करते हैं। इस सारे फर्जीवाड़े पर तब निर्णायक प्रहार हुआ, जब अनुच्छेद 370 को हटाने की घोषणा हुई। तब से अब तक हालात बहुत बेहतर हुए हैं। अगर मोदी सरकार भी पिछली सरकारों की तरह तुष्टीकरण करती तो समस्याओं में भारी बढ़ोतरी होती। अनुच्छेद 370 में इतनी खामियां थीं कि उसे देर-सबेर जाना ही था। जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है। इसके निवासी भारत के सम्मानित नागरिक हैं। उनके पास वे सभी अधिकार हैं, जो भारत के नागरिकों को मिले हुए हैं। इसलिए नेतागण अनर्गल बयान देने के बजाय लोगों की भलाई पर ध्यान दें।
इस मांग का क्या मतलब?
अनुच्छेद 370 ने जम्मू-कश्मीर को क्या दिया था?
इस अनुच्छेद ने प्रशासनिक जटिलता पैदा की थी