क्रांति या भ्रांति?

कुछ यूट्यूबरों को सीजेपी संस्थापकों में तारणहार मिल गया है

क्या ग़ैर-भाजपा शासित राज्यों के मंत्री भी इस्तीफा देंगे?

केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद सोशल मीडिया पर जिस कथित जेन जी क्रांति की बातें हो रही हैं, उसके खतरनाक संकेतों को नज़रअंदाज़ करना भविष्य में घातक सिद्ध हो सकता है। कुछ यूट्यूबरों को कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापकों में तारणहार मिल गया है। उन्हें लगता है कि ये हर समस्या का समाधान कर देंगे। कुछ ऐसी ही हवा अन्ना आंदोलन के बाद बह रही थी, जब अरविंद केजरीवाल और उनके साथियों को देखकर बहुत लोग यह शर्त लगाते थे कि एक बार इनकी सरकार बनने दीजिए, फिर तो दिल्ली की तस्वीर और तकदीर, दोनों बदल जाएंगी! उसके बाद आम आदमी पार्टी (आप) ने दिल्ली और पंजाब में सरकारें बनाईं। वर्तमान में पंजाब में उसी की सरकार है। क्या वहां महंगाई, बेरोजगारी, नशाखोरी, सरकारी स्कूलों व अस्पतालों की खस्ता हालत, भ्रष्टाचार और प्रदूषण जैसी समस्याएं नहीं हैं? 'आप' के कई वरिष्ठ नेता भ्रष्टाचार के मामले में जेल जा चुके हैं। जब सरकारें समस्याओं का समाधान नहीं कर पाती हैं, उनकी कार्यशैली से लोगों को परेशानी होने लगती है, तब क्रोध और कुंठा का जन्म होता है। ऐसे समय में कुछ लोग आगे आते हैं। भारत की जनता उनसे ज्यादा ही उम्मीदें लगा लेती है। कालांतर में जब उम्मीदें टूटती हैं तो गहरा पछतावा होता है। याद करें, जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में कांग्रेस के खिलाफ आंदोलन हुआ था तो बिहार में कितने युवा नेता उभरे थे? वे महाविद्यालयों से निकले ही थे। लोगों को विश्वास हो चला था कि ये सबकुछ ठीक कर देंगे। बाद में, उनमें से कई नेता कांग्रेस के साथ चले गए। एक महाशय तो कुशासन, भ्रष्टाचार और जंगलराज के प्रतीक बन गए थे। उन्हें आज भी घोटालों के लिए याद किया जाता है। इसलिए सीजेपी के विरोध प्रदर्शन के दौरान जो चेहरे चर्चा में आए, उन्हें अपना आदर्श बनाने में जल्दबाजी न करें। खासकर युवाओं को इस मामले में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि उन्हें अनुभव कम है। उन पर भावनाएं जल्दी हावी हो जाती हैं।

जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान भगवान श्रीराम और देवी-देवताओं के बारे में अभद्र टिप्पणियां की गई थीं। कई लोगों ने खुद को आधुनिक दिखाने के लिए आपत्तिजनक नारे लगाए थे। वे अनुचित संकेत करते दिखाई दिए थे। किसी क्रांतिकारी के लिए चरित्र की पवित्रता पहली शर्त होती है। भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, चंद्रशेखर आज़ाद जैसे महान क्रांतिकारियों का चरित्र भी महान था। जब प्रदर्शनकारी संसद भवन की ओर जा रहे थे तो कई लोगों के हाथों में ऐसे प्लेकार्ड थे, जिन्हें कोई विवेकशील व्यक्ति अपने परिवार को कभी नहीं दिखा सकता है। एक प्लेकार्ड खूब चर्चा में रहा, जिसमें श्रीमद्भगवद्गीता के श्लोक को मजाकिया ढंग से पेश किया गया था। इस प्रदर्शन में मुस्लिम, सिक्ख और ईसाई समुदाय के लोगों ने भी भाग लिया था। वे अपने धर्म के बारे में और किसी अन्य धर्म के बारे में कोई गलत टीका-टिप्पणी नहीं कर रहे थे। यह अच्छी बात है, लेकिन हिंदू युवा ही हिंदू धर्म के अवतारों और पूजनीय प्रतीकों का मजाक उड़ा रहे थे। ये लोग सरकार का विरोध करते-करते हिंदू धर्म को निशाना बनाने लगे थे। क्या हमें इसे स्वीकार करना चाहिए? इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि सरकार को जिम्मेदारी और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। हर नागरिक को उसका जायज हक मिलना चाहिए। किसी ने गलत किया है तो पीड़ित को न्याय मिलना चाहिए। अगर मंत्री के इस्तीफे में हर समस्या का समाधान ढूंढ़ेंगे तो उसके असर बहुत गहरे होंगे। कल्पना करें, किसी राज्य सरकार के शिक्षा बोर्ड द्वारा आयोजित परीक्षा का पेपर दूर-दराज के स्कूल में एक कर्मचारी ने लीक कर दिया। अब क्या होगा? गलती कर्मचारी की थी, लेकिन शिक्षा मंत्री की कुर्सी जाएगी। फिर यह सिलसिला यहीं नहीं रुकेगा। जिन राज्यों में कांग्रेस और अन्य (विपक्षी) दलों की सरकारें हैं, वहां कोई गड़बड़ हुई तो भाजपा भी संबंधित मंत्रियों के इस्तीफे मांगेगी। क्या वे मंत्री कुर्सी छोड़ेंगे? क्या सीजेपी उनके खिलाफ आंदोलन करेगी? इसका जवाब देना चाहिए।

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