कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के भारी हंगामे के बाद धर्मेंद्र प्रधान का केंद्रीय शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा भारतीय राजनीति की एक ऐसी घटना है, जिससे सभी नेताओं और सरकारों को कुछ सबक लेने चाहिएं। उक्त संगठन के उदय को सीजेआई की एक कथित टिप्पणी और पेपर लीक से जोड़कर देखा जा रहा है, जबकि वास्तविकता इससे थोड़ी अलग है। अगर ये दोनों घटनाएं न होतीं, तो भी सीजेपी के निर्माण और हंगामे के लिए भरपूर मसाला मौजूद था। क्या देश में समस्याओं की कमी है? जंतर-मंतर पर जो कुछ हुआ, चाहे उसके पीछे विदेशी हाथ बताया जाए या उसे विपक्षी दलों की चाल करार दिया जाए, इतना याद रखें- जो विरोधी होते हैं, वे मौका ढूंढ़ते हैं और उसका फायदा उठाते हैं। दिल्ली में हाल का पूरा घटनाक्रम जवाबदेही की अहमियत पर जोर देता है। सरकारी अधिकारी हों या कर्मचारी, या कोई मंत्री, उनकी जवाबदेही तय करनी होगी। अगर कुछ गलत हुआ है तो जिम्मेदारों के खिलाफ कार्रवाई जरूर होनी चाहिए। जनता में यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि 'पद, पहचान और पैसे वालों' का कुछ नहीं बिगड़ता है। इस धारणा को बदलना होगा। युवाओं से जुड़े मामलों को हल्के में न लें। पढ़ाई, परीक्षा और रोजगार बहुत संवेदनशील मुद्दे हैं। आज युवाओं में हताशा है। पढ़ाई पर लाखों रुपए खर्च करने के बाद जब भविष्य अंधकारमय नजर आता है तो सीजेपी जैसे संगठनों को उभरने का मौका मिलता है। यह सोचकर सोशल मीडिया की अनदेखी बिल्कुल न करें कि 'इससे कुछ नहीं होता।' यहां कोई बात जंगल की आग से भी जल्दी फैलती है। अब देश में करोड़ों लोगों के पास इंटरनेट सुविधा है। ज्यादातर लोग किसी-न-किसी सोशल मीडिया मंच से जुड़े हुए हैं। उनके पास सूचनाएं पहुंचती हैं। जब कोई ज्वलंत मुद्दा लोगों का ध्यान आकर्षित करता है तो वे एकजुट हो जाते हैं।
जनता से संवाद करते रहें। लोगों की समस्याओं का बेहतर ढंग से समाधान कैसे हो - इस पर दृढ़ता से काम होना चाहिए। लोगों को यह महसूस होना चाहिए कि सरकार हमारी समस्या सुन रही है, वह समाधान करने के लिए गंभीर है। समय पर समाधान होने से असंतोष पैदा नहीं होता है। इससे टकराव टलता है। राजनीतिक एवं प्रशासनिक तंत्र पर लोगों का विश्वास मजबूत होना चाहिए। वर्तमान में इन दोनों के बारे में लोगों की क्या राय है? यह जानने के लिए कहीं जाने की जरूरत नहीं है, सिर्फ सोशल मीडिया देख लें। पिछले पांच वर्षों में ऐसे वीडियो बहुत वायरल हुए हैं, जिनमें कोई पुलिसकर्मी रिश्वत लेता हुआ, आम आदमी से बदसलूकी करता हुआ, कोई सरकारी अधिकारी आम आदमी को परेशान करता हुआ, कोई बैंक कर्मचारी आम ग्राहक को बार-बार चक्कर लगवाता हुआ, कोई शिक्षक अनैतिक कर्म करता हुआ या छात्रों को बेरहमी से पीटता हुआ दिखाई दिया। ऐसे वीडियो लोगों को झकझोर देते हैं। वे सोचते हैं- अगर पीड़ित व्यक्ति की जगह हम या हमारा कोई प्रियजन होता तो क्या होता? जब किसी भ्रष्ट सरकारी अधिकारी और कर्मचारी के घर से नोटों का ढेर निकलता है तो लोगों के मन में गहरा आक्रोश पैदा होता है। शातिर लोग इन घटनाओं को एक मौके की तरह देखते हैं। वे उसमें गुंजाइश तलाशते हैं और आक्रोश को हवा देते हैं। जनता को लगता है कि सरकार कोई सख्त फैसला नहीं लेगी और अदालत से फैसला आने में वर्षों लग जाएंगे। इसलिए वह 'शीघ्र न्याय' के लिए ऐसे लोगों का साथ देती है। याद करें, जब कोई खतरनाक बदमाश एनकाउंटर में मारा जाता है तो आम लोगों की कैसी प्रतिक्रिया होती है? वे खुश होते हैं, क्योंकि जानते हैं कि मामला कानूनी तरीके से आगे बढ़ता तो समय पर न्याय मिलना मुश्किल था। लोगों का इस तरह विश्वास कमजोर होना लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं है। इस विश्वास को समय रहते मजबूत करने के लिए ठोस उपाय करें।