संसद के मानसून सत्र का आगाज बहुत हंगामे के साथ हुआ है। पहले ही दिन सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच खींचतान शुरू हो गई। इस पर पूरे देश की नजर है। सांसद किसी भी पार्टी के हों, उनकी कोशिश होनी चाहिए कि यह सत्र उत्पादक हो। इससे देश की प्रगति को बढ़ावा मिलना चाहिए। सत्ता पक्ष को ज्यादा विनम्र, धैर्यवान और सहिष्णु होना चाहिए। वहीं, विपक्ष को हर बात में हंगामा खड़ा करने के मौके ढूंढ़ने के बजाय रचनात्मक भूमिका निभानी चाहिए। संसद के सत्र पर देश के करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। सांसदों को हर मुद्दे की गंभीरता समझते हुए पूरी लगन से भाग लेना चाहिए। संसदीय परंपराओं का पालन करते हुए बहस होनी चाहिए। सभी पार्टियां इस बात का खास ध्यान रखें कि उनके मुद्दों, सवालों और जवाबों में तथ्यों का समावेश हो। प्रश्नकाल और शून्यकाल में किसी तरह की बाधा न डालें। राष्ट्रहित से जुड़े मुद्दों पर चर्चा के दौरान विभिन्न बिंदुओं को लेकर असहमति जताना विपक्ष का अधिकार है, लेकिन अपना पूरा समय असहमति जताने में ही खर्च न करें। राष्ट्रहित को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। नीट पेपरलीक और एनटीए की जवाबदेही जैसे ज्वलंत मुद्दे दलगत राजनीति की भेंट न चढ़ जाएं। युवाओं में बढ़ती हताशा चिंता का बड़ा विषय है। सांसद आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर इनके समाधान तलाशें। युवाओं के दिलो-दिमाग में आक्रोश घर करता जा रहा है। पढ़े-लिखे बेरोजगारों की भीड़ बढ़ती जा रही है। सीजेपी जैसे संगठन उनके आक्रोश को भुनाने की कोशिश कर रहे हैं। समाधान क्या होना चाहिए, यह उन्हें भी मालूम नहीं है। सरकार को युवाओं को विश्वास दिलाना होगा कि पेपरलीक रोकने के लिए सुनिश्चित तैयारी की जाएगी। इसके लिए तकनीकी सुधार, सुरक्षा प्रोटोकॉल, संस्थागत सुधार, कानूनी उपाय और छात्र-केंद्रित नीतियों पर मुहर लगनी चाहिए।
इनके अलावा भी कई मुद्दे हैं, जिन पर विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश करेगा। लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण के संबंध में दक्षिणी राज्यों की कुछ चिंताएं हैं। सरकार को तार्किक ढंग से जवाब देकर उनकी चिंताओं को दूर करना होगा। महंगाई का मुद्दा हमेशा चर्चा में रहता है। इस बार भी रहेगा। पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण और वाहनों पर उसके असर का मुद्दा समाज से लेकर सोशल मीडिया तक सुर्खियों में है। कहीं अफवाहों का जोर है, कहीं आधे-अधूरे तथ्य पेश कर लोगों को भ्रमित किया जा रहा है। सरकार को इस मुद्दे पर वैज्ञानिक शोध और रिपोर्टों का जिक्र करते हुए जवाब देना चाहिए। इस बार मानसून की बेरुखी के कारण कई जगह सूखे जैसे हालात हैं। फसलों को नुकसान हो रहा है। जलाशय खाली होते जा रहे हैं। अगर पर्याप्त बारिश न हुई तो खाद्यान्न उत्पादन और पेयजल आपूर्ति संबंधी चुनौतियां बढ़ सकती हैं। इसका क्या समाधान होना चाहिए? भविष्य में ऐसी स्थिति पैदा न हो, इसके लिए कौनसे वैज्ञानिक तौर-तरीके अपनाए जा सकते हैं? इन सवालों पर गंभीरता से चर्चा होनी चाहिए। श्रीराम मंदिर के चढ़ावे में कथित हेराफेरी की जांच जारी है। विपक्ष इसे आक्रामक ढंग से मुद्दा बना रहा है। बेशक उक्त घटना से करोड़ों रामभक्तों को पीड़ा हुई है। अब चढ़ावा और मंदिर प्रबंधन में पारदर्शिता कैसे आए, इस पर सांसदों को चर्चा करनी चाहिए। केंद्र सरकार ने पश्चिमी एशिया में भीषण अशांति के बावजूद ईंधन की किल्लत पैदा नहीं होने दी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान के बाद लोगों ने राष्ट्रहित में जिस तरह एकजुटता दिखाई, उसके लिए सबका अभिनंदन होना चाहिए। भविष्य में एलपीजी, पेट्रोल और डीजल पर निर्भरता कम करने के लिए असरदार उपायों का जिक्र जरूर होना चाहिए।