संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार कार्यालय ने पीओके में जारी अशांति पर जिन शब्दों में चिंता जताई है, उससे कोरी रस्म-अदायगी का संकेत मिलता है। क्या इस कार्यालय को मालूम नहीं कि पाकिस्तान पीओके में क्या कर रहा है? जिस देश ने उस इलाके पर अवैध कब्जा कर रखा है, संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार उच्चायुक्त उसी से निष्पक्ष जांच कराने का आग्रह कर रहे हैं! उन्हें तो पाकिस्तान की कड़ी निंदा करनी चाहिए, क्योंकि इस देश ने पीओके को जुल्म, ज्यादती और तबाही के अलावा कुछ नहीं दिया। वहां क्षेत्रीय चुनावों से पहले फैली भयंकर अशांति इस बात की गवाह है कि लोगों को पाकिस्तानी सरकार और फौज पर रत्तीभर विश्वास नहीं है। वहां चुनाव आयोग फौज की कठपुतली बन चुका है। उससे और स्थानीय अधिकारियों से यह उम्मीद कैसे की जा सकती है कि वे कभी निष्पक्ष चुनाव कराएंगे? जेएएसी के नेतृत्व में हो रहे विरोध प्रदर्शन के पीछे सिर्फ स्थानीय राजनीतिक प्रतिनिधित्व में बदलाव का मुद्दा नहीं है। यह एक वजह हो सकती है, लेकिन उसके पीछे कई वजह हैं, जो लोगों के दिलो-दिमाग में लावा बनकर धधक रही हैं। पाकिस्तानी फौज ने कई स्थानीय नेताओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और आम लोगों को जेल में डाल रखा है। उनकी रिहाई की मांग की जा रही है, लेकिन उन्हें अदालतों से राहत नहीं मिल रही है, क्योंकि जजों पर रावलपिंडी का दबाव है। ऐसे में यह आशंका गलत नहीं है कि उनमें से कई लोग गुमनामी में परलोक सिधार सकते हैं या कई साल यूं ही जेल में बिताने के बाद बाहर आ सकते हैं। तब वे फौज के लिए 'खतरा' नहीं होंगे।
पीओके में पाकिस्तानी फौज की मनमानी अपनी जगह है। प्रशासनिक अधिकारी-कर्मचारी भी जनता का खून चूसते हैं। दफ्तरों में लोगों की अर्जियां रद्दी की टोकरी की शोभा बढ़ाती हैं। सड़क, पुल और नाली जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए वर्षों पहले दी गईं कई अर्जियों को दीमक खा चुकी है। लगभग चार दशक पहले जम्मू-कश्मीर में यह दुष्प्रचार बहुत जोर-शोर से किया गया था कि 'एलओसी के उस पार यानी पीओके में खुशहाली है ... वहां सब भाई-भाई हैं ... वह इलाका जन्नत है ... उधर तो भरपूर आज़ादी है ... वहां चैन ही चैन है, किसी चीज की कोई कमी नहीं है।' इन झूठे दावों पर विश्वास कर कई लोग उधर चले गए थे। आज वे अपनी किस्मत को कोस रहे होंगे। पीओके में 'खुशहाली' का तो यह हाल है कि अक्टूबर 2005 में आए भूकंप में जिन स्कूलों की इमारतें क्षतिग्रस्त हुई थीं, वहां आजतक एक ईंट नहीं लगाई गई। 'भाई-भाई' वाली बात कोरी कहानी है। पीओके में पाकिस्तानी फौज उन लोगों पर दनादन गोलियां बरसा रही है, जिनका रक्षक होने का वह दावा करती है। पाकिस्तान पीओके के कथित आज़ाद अस्तित्व की बात करता है, जो अत्यंत हास्यास्पद है। असल में उसे फौज और आईएसआई ने बंधक बना रखा है। वहां जवान से लेकर जनरल तक संसाधनों की लूट से ऐश कर रहे हैं। पीओके में महंगाई पूरे पाकिस्तान की तुलना में काफी ज्यादा है। जब कभी आटा, दाल, चावल, सब्जियों और दवाइयों की किल्लत होती है तो जनता को ये चीजें नहीं, बल्कि पुलिस के डंडे मिलते हैं। सरकार इस्लामाबाद और (पाकिस्तानी) पंजाब में आपूर्ति को सर्वोच्च प्राथमिकता देती है। कराची की ओर भी ध्यान देना पड़ता है। पीओके का नंबर सबसे आखिर में आता है। जब ऐसे हालात होंगे तो लोग सड़कों पर क्यों नहीं उतरेंगे? यह तो शुरुआत है। अगर लोगों को राहत न मिली तो पीओके में बहुत बड़ी मुहिम खड़ी हो सकती है, जिसे कुचलना पाकिस्तानी सरकार और फौज के लिए असंभव होगा।