अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को जो ताजा धमकी दी है, उसमें उनकी ताकत कम, डर ज्यादा झलकता है। अगर ईरान उनकी हत्या को अंजाम देने में कामयाब हो जाता है तो क्या होगा? जब ट्रंप खुद को पहले ही से इस स्थिति के लिए तैयार बताते हैं तो ऐसी चर्चाओं को बल मिलना स्वाभाविक है कि 'अमेरिकी राष्ट्रपति अजेय नहीं हैं ... वे किसी दिन लपेटे में आ सकते हैं।' अब्राहम लिंकन और जॉन एफ केनेडी भी अमेरिका के राष्ट्रपति थे, जिनका सुरक्षा चक्र टूट गया था। डोनाल्ड ट्रंप पर पहले हमले की कोशिशें हो चुकी हैं। वे चुनाव प्रचार के दौरान एक जनसभा में बाल-बाल बचे थे। अब ईरान के नए सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह सैयद मोज्तबा खामेनेई ने जिन शब्दों में अपने पिता की हत्या का बदला लेने की कसम खाई है, उससे साफ होता है कि यह लड़ाई अभी रुकने वाली नहीं है। ईरान के पास अमेरिका की तुलना में संसाधन कम हैं, लेकिन इस देश के संकल्प को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है। ट्रंप ने जिस स्तर पर ईरान में तबाही मचाई, उससे उन पर पलटवार का खतरा मंडराता रहेगा। वे कब तक इससे सुरक्षित रहेंगे, यह अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों की सतर्कता पर निर्भर करेगा। ईरानी नेतृत्व के खिलाफ घातक कार्रवाई करना ट्रंप का बड़ा मकसद है। उनके आदेश के बाद पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई का खात्मा किया गया, जिससे दुनिया हैरान रह गई थी। अगर ईरानी पलटवार की आंच ट्रंप तक पहुंच जाती है तो महाशक्ति की साख को बट्टा लग जाएगा।
अगर उस स्थिति में अमेरिकी नेतृत्व इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि हमला ईरानी सरकार द्वारा कराया गया था तो व्हाइट हाउस की प्रतिक्रिया बहुत व्यापक हो सकती है। ट्रंप पहले ही कह चुके हैं कि उनकी अनुपस्थिति में उपराष्ट्रपति जेडी वेंस तत्काल प्रभाव से सेना के सर्वोच्च कमांडर बन जाएंगे और किसी भी जवाबी कार्रवाई का अधिकार उनके पास रहेगा। ईरान के सैन्य अड्डों, मिसाइल ठिकानों, कमांड एवं कंट्रोल नेटवर्क, नौसैनिक क्षमताओं और अन्य रणनीतिक परिसंपत्तियों पर बड़े पैमाने पर हमले हो सकते हैं। इससे ईरान का पूरा ढांचा तबाह हो सकता है। इस देश में भारी अफरा-तफरी फैल सकती है। आम जनता को भोजन, पानी, इलाज जैसी मूलभूत सुविधाएं हासिल करने में बहुत संघर्ष का सामना करना पड़ सकता है। ईरानी मुद्रा का पहले ही काफी अवमूल्यन हो गया है। जब खामेनेई के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे थे, तब उसकी सबसे बड़ी वजह अवमूल्यन ही था। अब ईरानी मुद्रा की सेहत के बारे में कोई बात नहीं कर रहा है। अमेरिका अपनी आर्थिक नीतियों को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है। उसके राष्ट्रपति को निशाना बनाए जाने की स्थिति में वह ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध थोप सकता है। हालांकि यह देश दशकों से प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। इसके नागरिकों ने महंगाई, अभाव और पाबंदियों के साथ जीना सीख लिया है। बड़ा सवाल है- क्या ट्रंप ईरान को शांति और सुलह के रास्ते पर ले आएंगे? अभी दूर-दूर तक इसकी कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। ट्रंप को महाशक्ति का राष्ट्रपति होने का गुरूर है। वहीं, ईरानी नेतृत्व के सामने अपना अस्तित्व बचाने की चुनौती है। यह देश अमेरिका और इज़राइल, जिनकी आर्थिक ताकत, तकनीक और सैन्य बल के सामने कहीं नहीं टिकता है, के संयुक्त हमलों का सामना करने के बावजूद अडिग है। अब उसे और तबाही का डर नहीं है, क्योंकि यह पहले ही बहुत हो गई है। दोनों देशों को टकराव का रास्ता छोड़ना चाहिए। इनके जंगी जुनून का असर करोड़ों लोगों पर पड़ रहा है। अपने अहंकार को एक तरफ रखकर शांति वार्ता करें। इससे ही समाधान निकलेगा।