राजस्थान के जयपुर शहर में एक युवती द्वारा सरकारी नौकरी और जायदाद हासिल करने के लिए 'सुपारी' देकर अपनी मां की हत्या करवाने का मामला समाज में घटते नैतिक मूल्यों और रिश्तों पर संकट को दर्शाता है। कहीं कोई युवती अपने मंगेतर को पहाड़ी से धक्का दे रही है, कोई अपने पति की जीवन लीला समाप्त कर उसे नीले ड्रम में भर रही है, तो कोई हनीमून पर हत्याकांड को अंजाम दे रही है। महिलाओं को भी दहेज के नाम पर बहुत प्रताड़ित किया जा रहा है। ये घटनाएं हमें संकेत दे रही हैं कि हमारे पारिवारिक एवं सामाजिक ताने-बाने में कुछ समस्याएं आ गई हैं, जिनकी ओर हमें ध्यान देना चाहिए। जयपुर में जिस युवती पर अपनी मां की हत्या करवाने का आरोप लगा है, वह उच्च शिक्षित है। उसने सिर्फ 23 साल की उम्र में इतने जघन्य हत्याकांड की साजिश कैसे रच ली? क्या ऐसे लोगों को कानून का कोई डर नहीं है? कानून से पहले तो ईश्वर का डर होना चाहिए। उसका न्याय अटल है। अगर यह युवती कानून को धोखा देकर अपनी मां की जगह सरकारी नौकरी हासिल कर भी लेती तो उसे कर्मफल जरूर भोगना पड़ता। कुछ स्टैंडअप कॉमेडियन कर्मफल का मजाक उड़ाने के लिए हल्के शब्दों का प्रयोग करते हैं, जबकि यह बहुत गंभीर विषय है। युवाओं को इस मामले में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि उनके सामने पूरा जीवन है। भावावेश या गुमराही में लिया गया एक गलत फैसला सबकुछ बर्बाद कर सकता है। देश में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए केंद्र सरकार को कुछ जरूरी कदम उठाने होंगे। भारत में जिस तरह सरकारी नौकरियों का अति-महिमामंडन किया जा रहा है, वह ठीक नहीं है। कई लोगों ने इसे जीवन-मरण का प्रश्न बना लिया है। वे दस-दस साल सरकारी नौकरी की तैयारी में लगा देते हैं।
हम भारत को विकसित देश बनाने की बातें करते हैं, लेकिन सरकारी नौकरियों के लिए इतना जुनून किसी भी विकसित देश में देखने को नहीं मिलता है। वहां जितनी सरकारी नौकरियां हैं, उनके साथ जवाबदेही भी है। भ्रष्टाचार के मामलों में सख्त कार्रवाई होती है। भारत सरकार युवाओं को पढ़ाई के साथ ऐसे कौशल सीखने के लिए प्रोत्साहित करे, जिनके जरिए वे भविष्य में कमाई कर सकें। सिर्फ सरकारी नौकरियों के भरोसे बैठकर देश को अमेरिका, चीन, जापान की तरह विकसित नहीं बनाया जा सकता। सरकार को सोशल मीडिया पर प्रसारित ऐसे वीडियो पर प्रतिबंध लगाना चाहिए, जिनमें किसी सरकारी अधिकारी या कर्मचारी का राजा-महाराजा की तरह बखान किया जाता है। इन वीडियो में संगीत की जोशीली धुन के साथ उस व्यक्ति के वाहनों के काफिले, अपने वाहन से उसके नीचे उतरने के तरीके, सीढ़ियां चढ़ने के तरीके, कुर्सी पर बैठने के ढंग आदि को ऐसे दिखाया जाता है, जैसे ये सर्वशक्तिमान हों। पिछले कुछ वर्षों में इनके साथ 'दबंग', 'सिंघम' जैसे शब्द धड़ल्ले से लिखे जा रहे हैं। यह सब क्या है? कहीं ये अधिकारी-कर्मचारी ही अपने वीडियो किसी से बनवाकर खुद को सेलिब्रिटी की तरह पेश नहीं कर रहे हैं? सरकार को इसकी जांच करनी चाहिए। जयपुर की घटना ने एक और बात साबित कर दी- अगर पुलिस ध्यान देकर तफ्तीश करे तो वह अपराध की जड़ तक पहुंच सकती है। इस हत्याकांड में सीसीटीवी फुटेज के विश्लेषण से कड़ियां जुड़ती गईं। आखिर में आरोपियों के चेहरों से नकाब उतर गए। कोई व्यक्ति कितना ही शातिर क्यों न हो, अगर वह अपराध करेगा तो उससे कहीं-न-कहीं गलती होगी। अक्लमंद और अनुभवी जांचकर्ता उसे पकड़ सकता है, क्योंकि सत्य की खोज में ईश्वर भी उसकी मदद करता है।