अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध रोकने के लिए हुए अंतरिम समझौते की स्याही भी नहीं सूखी थी कि एक बार फिर धमाके होने लगे हैं। इसकी आशंका पहले से थी। न तो अमेरिका शांति समझौता करने के लिए प्रतिबद्ध है, न ईरान की ऐसी नीयत है। जो कथित बुद्धिजीवी कह रहे थे कि 'मध्यस्थ की भूमिका निभाने से पाकिस्तान का कद बहुत बढ़ गया है और भारत की विदेश नीति दमदार नहीं रही', वे अब खामोश हैं। वास्तव में, यह पहले से साफ नजर आ रहा था। हमने 11 अप्रैल के संपादकीय (पाकिस्तान: मध्यस्थ या मोहरा?) में इस घटना के संकेत दे दिए थे- '... समझौता होने से पहले ऐसी तस्वीर है तो इसका भविष्य क्या होगा? ... दोनों तरफ के नेता आस्तीनें चढ़ा रहे हैं। अगर ऐसे माहौल में कोई समझौता हो गया तो वह कितने दिन टिकेगा? ट्रंप ने पाकिस्तान को बहुत सोच-समझकर बीच में लिया है।' इस सैन्य संघर्ष ने अमेरिकी राष्ट्रपति को बड़ी उलझन में डाल दिया। वे ईरान पर निर्णायक विजय चाहते थे। वे सबको दिखाना चाहते थे कि 'मैंने ईरान को घुटनों पर लाकर दुनिया को सुरक्षित बना दिया, अन्यथा एक बड़ी परमाणु तबाही हो सकती थी।' ट्रंप यह कहकर नोबेल शांति पुरस्कार के सबसे बड़े दावेदार बनना चाहते थे। हालांकि उनकी दावेदारी खटाई में पड़ गई। वे न तो ईरान को अपनी शर्तों पर झुका सके, न उस पर निर्णायक विजय प्राप्त कर सके। उन्होंने इस देश की सैन्य क्षमता का बहुत गलत आकलन किया था। ईरान को जान-माल का नुकसान बहुत हुआ, लेकिन उसने हार स्वीकार नहीं की। वह बिल्कुल नहीं झुका। उसे जहां मौका मिला, वहां पलटवार किया। इससे ट्रंप की छवि को गहरी चोट पहुंची है।
ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की अंतिम यात्रा में उमड़ी भारी भीड़ को देखकर ट्रंप भी हैरान हैं। उन्होंने इस दृश्य की कल्पना नहीं की थी। अमेरिकी राष्ट्रपति का अनुमान था कि खामेनेई की अंतिम यात्रा में गिनती के लोग आएंगे और ईरानी जनता इस बात के लिए आभार जताएगी कि व्हाइट हाउस ने हमें एक 'तानाशाह' से मुक्ति दिला दी। ट्रंप ईरानी समाज को समझ नहीं पाए। वे रेज़ा पहलवी को आगे कर सोशल मीडिया पर क्रांति के सब्ज बाग दिखाते रहे। आयतुल्लाह अली खामेनेई के शासन में ढेरों खामियां रही होंगी। उन पर विरोधियों के दमन और जनता पर अत्याचार के गंभीर आरोप लगे थे। उनके शासन में अर्थव्यवस्था बदहाल हो चुकी थी। उनके खिलाफ लोग आवाज़ उठा रहे थे। हालात जिस दिशा में जा रहे थे, उससे प्रतीत होता था कि जनता खुद ही साल-डेढ़ साल में खामेनेई को कुर्सी से उतार देगी। अमेरिका ने धावा बोलकर पूरी कहानी पलट दी। अब खामेनेई शहीदों में शुमार हो गए हैं। लोग उनके फैसलों की आलोचना से परहेज कर रहे हैं। रेज़ा पहलवी के अरमानों पर पानी फिर गया। ट्रंप हड़बड़ी में फैसले ले रहे हैं। उनका अगला कदम क्या होगा, संभवत: वे खुद नहीं जानते। उनके बयानों को कोई गंभीरता से नहीं लेता है। उनकी छवि को पलीता बहुत पहले लग गया था। अब अमेरिका में कई लोग उन्हें राष्ट्रपति से ज्यादा एक कॉमेडियन समझने लगे हैं। भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी करने के लिए ठोस कदम उठाने होंगे। पश्चिम एशिया में तनाव के बावजूद केंद्र सरकार ने बहुत अच्छा प्रबंधन किया। अब हमें इतना आत्मनिर्भर जरूर बनना चाहिए कि जब विदेश में कोई युद्ध हो तो उसके शोले हमारे रसोईघर तक न पहुंचें। केंद्र सरकार को गैस सिलेंडरों के विकल्प पर तेजी से काम करना चाहिए।