नारों में स्वदेशी, उपयोग में विदेशी क्यों?

आज के ज्यादातर नेताओं की वाणी में ओज नहीं है

नेता कहते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं

वरिष्ठ कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने 'मेक इन इंडिया' और 'वोकल फॉर लोकल' के बारे में जो टिप्पणी की है, उससे कई सवाल पैदा होते हैं। क्या ये पहल सच में सिर्फ नारों तक सीमित रह गई हैं? अगर ऐसा है तो कांग्रेस के पास सुनहरा मौका है। वह उन राज्यों में इनसे बेहतर पहल लागू कर मिसाल कायम करे, जहां उसकी सरकारें हैं। महात्मा गांधी ने 'स्वदेशी' को बढ़ावा देने के लिए बहुत गंभीर प्रयास किए थे। कांग्रेस की सरकारों ने उन प्रयासों को बढ़ावा देने के लिए क्या किया? महात्मा गांधी ने चरखा चलाकर अंग्रेजों को चुनौती दी थी। वह कोई उपकरण मात्र नहीं था। चरखा स्वदेशी का महान प्रतीक था। बापू सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक हर काम में स्वदेशी चीजों का उपयोग करते थे। आज कांग्रेस समेत सभी पार्टियों के कितने नेता ऐसा करते हैं? सत्ता पक्ष स्वदेशी अपनाने के लिए आह्वान कर रहा है, विपक्ष उसके प्रयासों में सिर्फ खोट ढूंढ़ रहा है। क्या ऐसे 'मेक इन इंडिया' और 'वोकल फॉर लोकल' को बढ़ावा मिलेगा? सबसे पहले खुद आदर्श स्थापित करें। उसके बाद बात करें। जो नेता और अधिकारी सुबह विदेशी टूथपेस्ट काम में लेते हैं, विदेशी साबुन-परफ्यूम लगाते हैं, विदेशी ब्रांड के कपड़े पहनते हैं, विदेशी कार में बैठकर दफ्तर जाते हैं, जो अपने बच्चों को स्थानीय सरकारी विद्यालयों या महाविद्यालयों में पढ़ाने के बजाय विदेश भेजते हैं, जिनकी कलाई पर विदेशी घड़ी सुशोभित है, जो स्थानीय जूते-चप्पल पहनने के बजाय विदेशी ब्रांडों से लगाव रखते हैं, जो अक्सर सैर-सपाटे के लिए विदेश निकल जाते हैं ... उनके शब्दों पर जनता कैसे विश्वास करेगी? महात्मा गांधी के घोर आलोचक भी इस बात से सहमत होंगे कि वे जो कहते थे, वह पहले खुद करते थे। आज के ज्यादातर नेताओं की वाणी में ओज नहीं है, क्योंकि वे कहते कुछ और हैं, करते कुछ और हैं।

पश्चिम एशिया में सैन्य संघर्ष भड़कने के बाद भारतीय मुद्रा पर दबाव बढ़ गया था। डॉलर के मुकाबले रुपए में गिरावट आई थी। तब सत्ता पक्ष और विपक्ष में आरोप-प्रत्यारोप का नया दौर शुरू हो गया था। क्या ऐसे रुपया मजबूत होगा? भारतीय मुद्रा की ताकत बढ़े, इसके लिए सत्ता पक्ष, विपक्ष और जनता को मिलकर काम करना होगा। सारी जिम्मेदारियां जनता पर डाल देना ठीक नहीं है। पहले नेतागण यह दिखाएं कि वे अपने जीवन में स्वदेशी को बढ़ावा देने के लिए क्या कर रहे हैं? 'मेक इन इंडिया' और 'वोकल फॉर लोकल' को बढ़ावा देने में जो रुकावटें आ रही हैं, उन्हें कौन दूर करेगा? क्या नेताओं और अधिकारियों का कर्तव्य नहीं है कि वे इस दिशा में गंभीरता से काम करें? 'मेक इन इंडिया' पहल उसी स्थिति में सफल हो सकती है, जब उसके अनुकूल माहौल हो। अगर आज कोई युवा अपना उद्यम शुरू करना चाहे तो उसके सामने अनगिनत समस्याएं आती हैं। उसे सरकारी तंत्र से अपेक्षित सहयोग नहीं मिलता है। कई इलाकों में तो बिजली का कनेक्शन लेने के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं, रिश्वत देनी होती है। कौनसी पार्टी ऐसा दावा कर सकती है कि उसके शासन में लोगों को इस चक्करबाज़ी और रिश्वतखोरी से निजात मिल गई? जिन देशों में उद्योगों की स्थिति मजबूत है, वह सरकारों द्वारा बनाई गईं नीतियों की वजह से मजबूत है। हमारे देश में कई नीतिगत सुधारों के बावजूद धरातल पर पर्याप्त असर दिखाई नहीं दे रहा है, क्योंकि वहां मौजूद समस्याओं को दूर करने में नौकरशाही उदासीन है। 'वोकल फॉर लोकल' की सबसे ज्यादा चर्चा दीपावली से पहले होती है। उस समय चीनी झालरों का खूब विरोध किया जाता है। इसे यहीं तक सीमित न रखा जाए। गुणवत्तापूर्ण स्वदेशी उत्पाद बनाएं और लोग उनकी मांग करें, तब यह पहल सफल होगी और भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत बनेगी। 

About The Author: News Desk