पाकिस्तान में लगभग 125 साल पुराने गुरुद्वारे को ढहाए जाने की घटना अत्यंत निंदनीय है। यह पड़ोसी देश दुनिया को धार्मिक सहिष्णुता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर उपदेश देता है, लेकिन खुद उन पर बिल्कुल अमल नहीं करता है। इतना पुराना गुरुद्वारा ऐतिहासिक दृष्टि से भी बहुत अहमियत रखता है। यह अविभाजित भारत और स्वतंत्रता संग्राम का साक्षी रहा है। उस समय किसी ने सोचा नहीं होगा कि एक दिन ऐसा आएगा, जब यह धरती पराई हो जाएगी। पाकिस्तान में वर्ष 1947 से ही हिंदुओं और सिक्खों के धार्मिक स्थलों पर हमले हो रहे हैं। वहां मंदिरों और गुरुद्वारों की संख्या हजारों में थी, जो अब गिनती के बचे हैं। वे भी कट्टरपंथियों की आंखों में खटक रहे हैं। उन्हें जानबूझकर तोड़ा जा रहा है। लाहौर, जो सांस्कृतिक दृष्टि से बहुत संपन्न था, में ऐसे कई खंडहर हैं, जो कभी सुंदर मंदिर होते थे। हमारे पूर्वजों ने केपीके से लेकर सिंध तक भव्य मंदिर और गुरुद्वारे बनवाए थे। कभी वहां पूजा-प्रार्थनाएं होती थीं, लेकिन अब उनका अस्तित्व खतरे में है। जुलाई 2023 में ऐतिहासिक गुरुद्वारा 'रोड़ी साहिब' पाकिस्तान की घोर उपेक्षा के कारण ढह गया था। इस देश ने उसके संरक्षण की ओर कोई ध्यान नहीं दिया था। आखिरकार, बारिश में उसकी दीवारें गिर गईं। अगस्त 2021 में, रहीम यार ख़ान जिले के भोंग शहर में स्थित गणेश मंदिर पर कई कट्टरपंथियों ने हमला कर दिया था। उन्होंने मंदिर में जमकर तोड़फोड़ की और मूर्तियों को खंडित किया था। उस घटना का वीडियो वायरल होने से पाकिस्तान की चौतरफा निंदा हुई थी। बाद में, पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय ने स्वत: संज्ञान लेने का नाटक करते हुए कार्रवाई का आदेश दिया। कुछ लोगों की गिरफ्तारियां भी हुईं, लेकिन सख्त सजा किसी को नहीं दी गई। प्राय: ऐसे मामलों में कुछ दिन बाद आरोपियों को छोड़ दिया जाता है। इससे उनका दुस्साहस बढ़ता है। वे भविष्य में अल्पसंख्यकों के किसी अन्य धार्मिक स्थल पर जाकर उपद्रव मचाते हैं।
दिसंबर 2022 में, लाहौर स्थित गुरुद्वारा 'शहीद भाई तारू सिंह' पर कट्टरपंथियों ने ताला जड़ दिया था। उन्होंने गुरुद्वारे की जमीन पर अवैध कब्जा कर दुकानें बना ली थीं। पाकिस्तानी कट्टरपंथियों ने उसे गुरुद्वारा मानने से ही इन्कार कर दिया था। ये घटनाएं सोशल मीडिया के कारण चर्चा में आईं। इससे पहले, हिंदुओं-सिक्खों के अनगिनत धार्मिक स्थलों के साथ ऐसा हुआ था। ताज्जुब की बात है कि कनाडा और अमेरिका में रहकर 'खालिस्तान' के नाम पर भारत को आंखें दिखाने वाले कुछ गुमराह लोगों को यह सब दिखाई नहीं देता है। वे पाकिस्तान में हो रहे गुरुद्वारों के अपमान पर खामोश रहते हैं। वहां जब किसी सिक्ख व्यक्ति पर हमला होता है तो 'खालिस्तान' के हिमायती चुप्पी साध लेते हैं। जब किसी सिक्ख बालिका का अपहरण और जबरन धर्मांतरण होता है तो वे उदासीनता दिखाते हैं। उनके मुंह से एक शब्द नहीं निकलता है। वे एक काल्पनिक दुनिया में रहते हैं कि इधर भी पंजाब, उधर (पाकिस्तान) भी पंजाब ... इसलिए सरहद पार वाले हमारे साथ भाईचारा निभाएंगे! पाकिस्तानियों का भाईचारा यह है कि वर्ष 1947 में वहां जो अल्पसंख्यक लगभग 24 प्रतिशत थे, वे आज लगभग 3 प्रतिशत पर आ गए हैं। सिक्खों की आबादी एक प्रतिशत भी नहीं है। ये लोग कहां गए? क्या 'खालिस्तान' के समर्थकों ने कभी इस्लामाबाद से यह सवाल पूछा? पूछेंगे भी नहीं, क्योंकि इसके लिए अक्ल और हिम्मत, दोनों की ज़रूरत होती है। वे विदेश में रहकर भारत के खिलाफ नारे लगाते-लगाते इन दोनों को ही आईएसआई के कदमों में गिरवी रख आए हैं।