प्रणय कुमार
शिक्षाविद् एवं वरिष्ठ स्तंभकार
9588225950
देश के अनेक विश्वविद्यालयों द्वारा विद्यार्थियों की उपाधियों, अंकपत्रों, पत्राचार, निमंत्रण-पत्रों, साइन-बोर्डों तथा अन्य आधिकारिक अभिलेखों में 'इंडिया' के स्थान पर 'भारत' लिखने का निर्णय केवल एक प्रशासनिक परिवर्तन नहीं है। यह भारत की सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक स्मृति और राष्ट्रीय स्वाभिमान के पुनर्जागरण का उद्घोष है। यह परिवर्तन उस वैचारिक मंथन का परिणाम है, जो लंबे समय से शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्रीय अस्मिता के प्रश्न पर देशभर में चल रहा है। हाल में मध्य प्रदेश के देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर, रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर तथा गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर ने अपने सभी आधिकारिक दस्तावेजों में 'इंडिया' के स्थान पर 'भारत' लिखने का निर्णय लिया है। इसी क्रम में राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय, ग्वालियर की कार्यपरिषद ने भी अपने आधिकारिक अभिलेखों में 'भारत' लिखने का प्रस्ताव पारित किया। 'शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास' के अनुसार मध्य प्रदेश, राजस्थान, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गुजरात तथा महाराष्ट्र के कम-से-कम सत्रह विश्वविद्यालयों एवं शैक्षणिक संस्थानों ने इस दिशा में औपचारिक संकल्प पारित किए हैं। स्पष्ट है कि यह अब किसी एक विश्वविद्यालय का निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित एक व्यापक शैक्षिक अभियान का स्वरूप ग्रहण कर रहा है। इन निर्णयों के पीछे शैक्षिक क्षेत्र में सक्रिय 'शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास' की वर्षों की सतत वैचारिक साधना और संवाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। न्यास से जुड़े भारतीय भाषा मंच ने देशभर के विश्वविद्यालयों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं के समक्ष निरंतर यह प्रश्न रखा कि किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र की वास्तविक पहचान उसके अपने नाम से होती है।
वस्तुत: भारत केवल एक भौगोलिक सीमा या राजनीतिक व्यवस्था का नाम नहीं है। यह एक प्राचीन सभ्यता, जीवंत संस्कृति और निरंतर प्रवाहित राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक है। हजारों वर्षों की ज्ञान-परंपरा, दर्शन, अध्यात्म, साहित्य, विज्ञान, लोकजीवन, संघर्ष और आत्मबल ने उसकी पहचान निर्मित की है। यह भी उल्लेखनीय है कि हर भाषा की अपनी प्रकृति, परंपरा और सांस्कृतिक स्मृति होती है। शब्द केवल ध्वनियां नहीं होते; वे इतिहास, भाव, मूल्य, अर्थ और पहचान के वाहक होते हैं। इसी कारण किसी व्यक्ति, स्थान अथवा राष्ट्र की संज्ञा का सामान्यत: अनुवाद नहीं किया जाता। नाम केवल संबोधन नहीं होता, बल्कि अस्तित्व और अस्मिता का प्रतीक होता है। यदि किसी व्यक्ति का नाम 'काव्य' हो तो उसे 'पोएट्री' और 'सुंदर' हो तो 'हैंडसम' कहकर नहीं पुकारा जाएगा। इसी प्रकार किसी राष्ट्र की भी अपनी मौलिक पहचान उसके वास्तविक नाम से ही होती है। भाषा की इसी संवेदनशीलता की उपेक्षा के कारण अंग्रेज़ीकरण की प्रवृत्ति ने अनेक विकृतियां उत्पन्न की हैं। राम का 'रामा', कृष्ण का 'कृष्णा', शिव का 'शिवा' और तनुज का 'तनुजा' आदि कर देने से केवल उच्चारण नहीं बदलता, बल्कि कई बार शब्द का अर्थ और लिंग भी परिवर्तित हो जाता है। यदि व्यक्तियों के नामों के साथ ऐसा परिवर्तन स्वीकार्य नहीं हो सकता, तो करोड़ों लोगों की सभ्यतागत पहचान वाले राष्ट्र के नाम के साथ यह असावधानी कैसे स्वीकार की जा सकती है?
'भारत' कोई सामान्य शब्द नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता का स्वनाम है। इसकी जड़ें हमारी प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा में हैं। ऋग्वैदिक साहित्य, महाभारत, विष्णु पुराण तथा अनेक प्राचीन ग्रंथों में 'भारत' और 'भारतवर्ष' का उल्लेख मिलता है। प्रसिद्ध श्लोक - 'उत्तरं यत् समुद्रस्य हिमाद्रेश्चैव दक्षिणम्। वर्षं तद् भारतं नाम भारती यत्र सन्तति:' - सहस्राब्दियों से इस भूमि की सांस्कृतिक पहचान का उद्घोष करता आया है। भारतीय परंपरा के अनुसार इस राष्ट्र का नामकरण चक्रवर्ती सम्राट महाराज भरत के नाम पर हुआ। इसके विपरीत 'इंडिया' एक बाह्य नाम है, जिसकी उत्पत्ति सिंधु (इंडस) के विदेशी उच्चारण से हुई और जिसे औपनिवेशिक शासन ने आधिकारिक रूप से स्थापित किया।
विश्व के अनेक देशों ने स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद अपने मूल नामों और सांस्कृतिक प्रतीकों को पुन: प्रतिष्ठित किया। अधिक दूर क्यों जाएं, हमारे पड़ोस के देश 'सीलोन' ने 'श्रीलंका' और 'बर्मा' ने 'म्यांमार' कहे जाने में गर्व की अनुभूति की। वस्तुतः प्रत्येक स्वाभिमानी राष्ट्र अपने स्वनाम को अपनी सांस्कृतिक पहचान का आधार मानता है। ऐसे में भारत द्वारा अपने वास्तविक नाम 'भारत' को प्रतिष्ठित करने का आग्रह न तो असामान्य है और न ही अभूतपूर्व; यह प्रत्येक स्वतंत्र राष्ट्र का स्वाभाविक अधिकार है। यह भी उल्लेखनीय है कि संविधान सभा में 'भारत' नाम को लेकर गंभीर और सार्थक चर्चा हुई थी। अनेक सदस्यों ने आग्रह किया था कि संविधान में राष्ट्र का मूल नाम 'भारत' ही होना चाहिए। यद्यपि तत्कालीन ऐतिहासिक परिस्थितियों में अनुच्छेद 1 में 'इंडिया दैट इज भारत' का स्वरूप स्वीकार किया गया, तथापि संविधान सभा की बहस यह स्पष्ट करती है कि 'भारत' केवल एक भाषाई विकल्प नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अस्मिता का प्रश्न था।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने अनेक अवसरों पर कहा है कि 'भारत' एक विशिष्ट संज्ञा है, उसका अनुवाद नहीं किया जा सकता। जैनाचार्य विद्यासागर महाराज भी निरंतर यह प्रश्न उठाते रहे कि जब मद्रास का चेन्नई, कलकत्ता का कोलकाता, बॉम्बे का मुंबई, गुरुगांव का गुरुग्राम हो सकता है, तो 'इंडिया' का 'भारत' क्यों नहीं हो सकता? उनके अनुसार, यह केवल नाम परिवर्तन का नहीं, बल्कि मानसिक दासता से मुक्ति का प्रश्न है। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह 'दिनकर' की प्रसिद्ध पंक्तियां - 'भारत नहीं स्थान का वाचक, गुण विशेष नर का है; एक देश का नहीं शील यह, भूमंडल भर का है' - यह स्पष्ट करती हैं कि 'भारत' एक भूभाग का नहीं, बल्कि एक जीवन-मूल्य और सभ्यतागत आदर्श का नाम है। क्या यह भाव 'इंडिया' शब्द से व्यक्त हो सकता है? स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी जनमानस की वाणी 'भारत' ही थी। 'भारत माता की जय', 'वंदे मातरम्' और 'जय हिंद' जैसे उद्घोष राष्ट्रीय चेतना के प्रतीक बने। प्रश्न है- यदि कोई 'इंडिया माता की जय' कहे तो क्या उससे वही भाव प्रकट होगा जो 'भारत माता की जय' से होता है? इससे स्पष्ट है कि राष्ट्र की आत्मा सदैव 'भारत' नाम से ही स्वयं को अभिव्यक्त करती रही है। हाल के वर्षों में भी राष्ट्रीय जीवन में 'भारत' के प्रयोग की प्रवृत्ति निरंतर बढ़ी है। जी-20 शिखर सम्मेलन के निमंत्रण-पत्रों में 'प्रेसिडेंट ऑफ भारत' का प्रयोग हो अथवा अनेक सरकारी दस्तावेजों और संस्थानों द्वारा 'भारत सरकार' तथा 'भारत' शब्द को प्राथमिकता देना, ये सभी संकेत इस बात के द्योतक हैं कि देश की सांस्कृतिक चेतना अपने वास्तविक नाम की ओर स्वाभाविक रूप से लौट रही है।
शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं होती है। वह राष्ट्रीय चेतना का निर्माण भी करती है। जब किसी विद्यार्थी को मिलने वाली उपाधि, अंकपत्र या प्रमाण-पत्र पर 'भारत' अंकित होगा, तो वह केवल एक शब्द नहीं पढ़ेगा, बल्कि अपनी सभ्यता, संस्कृति और राष्ट्रीय पहचान का भी बोध करेगा। आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालयों द्वारा आरंभ किए गए इस ऐतिहासिक अभियान का अनुसरण अन्य शैक्षणिक संस्थान, विश्वविद्यालय, राज्य सरकारें और केंद्र सरकार भी करें। जिस दिन देश के प्रत्येक अंकपत्र, उपाधि, शासकीय दस्तावेज, न्यायिक अभिलेख, सार्वजनिक संस्थान और प्रशासनिक व्यवहार में स्वाभाविक रूप से 'भारत' प्रतिष्ठित हो जाएगा, उस दिन यह केवल शब्द का परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि राष्ट्रीय आत्मबोध के एक नए अध्याय का उद्घाटन होगा। निष्कर्षत: कहा जा सकता है कि भारत केवल हमारे देश का नाम नहीं है; वह हमारी सभ्यता की स्मृति, संस्कृति की चेतना, इतिहास की निरंतरता और राष्ट्रीय आत्मा का स्वर है। इसलिए 'इंडिया' से 'भारत' की यह यात्रा किसी शब्द-परिवर्तन का अभियान नहीं, बल्कि स्वत्व, स्वाभिमान, सांस्कृतिक आत्मविश्वास और सभ्यतागत पुनर्जागरण की पुनर्प्रतिष्ठा है। जब कोई राष्ट्र स्वयं को अपने वास्तविक नाम से पुकारना प्रारंभ करता है, तभी वह अपनी आत्मा, अपने इतिहास और अपनी सांस्कृतिक विरासत के साथ पूर्णत: एकाकार होता है।