भारत में 25 जून, 1975 को तत्कालीन कांग्रेस सरकार द्वारा लगाए गए आपातकाल को हमेशा याद रखना जरूरी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्य कहा कि आपातकाल हमारे संविधान पर सीधा हमला था। उस दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं को निलंबित कर दिया गया था। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सख्त पाबंदियां थोपी गई थीं। कई राजनेताओं, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल में डालकर उन पर घोर अत्याचार किए गए थे। युवाओं को मालूम होना चाहिए कि जिस आज़ादी की खुली हवाओं में वे सांस ले रहे हैं, वह मुफ्त में नहीं मिली है। उसके पीछे लाखों लोगों का संघर्ष, त्याग और बलिदान है। युवाओं को आपातकाल के बारे में इसलिए भी मालूम होना चाहिए, ताकि भविष्य में कोई व्यक्ति खुद को सर्वशक्तिमान न समझने लगे। लोकतंत्र के सामने कई खतरे होते हैं। चाहे वे दिखाई न दें, लेकिन उनके अस्तित्व को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता है। उनमें से एक खतरा है- तानाशाही। जब शीर्ष पद पर बैठा कोई व्यक्ति अपनी शक्ति और सत्ता के अहंकार में डूब जाता है तो उसके चापलूस सलाहकार ऐसी राय दे देते हैं, जो लोकतंत्र के लिए घातक सिद्ध होती है। हालांकि जनता जुल्म सहकर देर-सबेर ऐसे तानाशाहों का नशा उतार ही देती है। आपातकाल के दौरान मीडिया का गला घोंटने की कोशिशें खूब हुई थीं। आज कई लोग इंटरनेट के जरिए प्रसारित सच्ची-झूठी सामग्री को ही मीडिया समझकर अनर्गल टीका-टिप्पणी कर देते हैं। उन्हें आपातकाल में कलम के सिपाहियों के संघर्ष के बारे में जानना चाहिए। उस दौरान पत्रकारों पर कड़ी नजर रखी जाती थी। सत्ता से टकराने वाले, कठोर सवाल पूछने वाले पत्रकारों पर दबाव डालने के लिए तत्कालीन सरकार ने कई हथकंडे अपनाए थे। कई बार ऐसी नौबत आती कि पत्रकार दिनभर भूखे-प्यासे रहकर लोगों से मिलते, उनकी तकलीफें जानते और रिपोर्ट तैयार करते। रात को जब रिपोर्ट पेज पर लगती तो एक सरकारी अधिकारी आकर उस पर कैंची चला देता था। अगले दिन वह हिस्सा पाठकों तक खाली पहुंचता था।
आपातकाल के सबसे विवादास्पद पहलुओं में से एक था- बड़े पैमाने पर चलाया गया नसबंदी अभियान। इसके तहत लाखों लोगों की जबरन नसबंदी की गई थी। सरकारी कर्मचारियों पर नसबंदी के लक्ष्य पूरे करने का दबाव डाला गया था। लोगों को मजबूर किया जाता था कि अगर वे विभिन्न सरकारी योजनाओं के लाभ प्राप्त करना चाहते हैं तो पहले अपनी नसबंदी करवाएं। ऐसे भी मामले आए, जब लोगों को यह कहकर सरकारी गाड़ियों में बैठाया गया कि 'आपको उपहार दिए जाएंगे।' बाद में उनकी नसबंदी कर दी गई। उन्हें पता भी नहीं चला कि उनके साथ कितना बड़ा धोखा हो गया! आज जब केंद्र सरकार 'संविधान हत्या दिवस' मनाकर आपातकाल के क्रूरतापूर्ण अध्यायों को सामने ला रही है तो विपक्ष के राजनेताओं को दिक्कत हो रही है। उनके समर्थक अपने सोशल मीडिया पेजों पर लिख रहे हैं कि 'वह दौर बीत गया ... अब उसे याद करने का कोई फायदा नहीं है ... अगर बात करनी है तो रोजगार के बारे में करें।' सवाल है- उस दौर के बारे में बात क्यों न करें? कोई दौर बीत गया, इसका यह मतलब तो नहीं कि अब उसके बारे में सब चुप्पी साध लें? फिर तो ब्रिटिश उपनिवेशवाद के बारे में भी बात नहीं करनी चाहिए, क्योंकि ब्रिटिश शासक दशकों पहले देश छोड़कर चले गए! रोजगार के बारे में बात जरूर होनी चाहिए। बेरोजगारों को रोजगार मिलना चाहिए। इससे कौन इन्कार कर रहा है? हमें अपने अतीत से सबक लेना चाहिए। जो गलतियां पूर्व में हुईं, उन्हें दोहराने से बचना चाहिए। हमारे पूर्वजों ने सदियों की गुलामी के बाद आजादी का सवेरा देखा था। हमारा कर्तव्य है कि इस आजादी को कायम रखें। इसकी हर तरह से रक्षा करें। किसी भी व्यक्ति, पार्टी, सरकार, संस्था और संगठन को यह मौका कभी न दें कि वह खुद को इस देश से बड़ा समझने का भ्रम पाल ले।