पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने जम्मू-कश्मीर के बारे में जो टिप्पणियां की हैं, वे बिल्कुल बेबुनियाद हैं। पड़ोसी देश के राष्ट्रपति को भारत में मानवाधिकारों की कुछ ज्यादा ही चिंता होने लगी है। उन्हें अपने देश के हालात क्यों नहीं दिखाई देते? जरदारी पाकिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़ीं खबरें ध्यान से पढ़ लेंगे तो अन्य देशों की चिंता करना छोड़ देंगे। बलोचिस्तान में क्या हो रहा है? पाकिस्तानी फौज निर्दोष बलोच अवाम पर जुल्म के पहाड़ तोड़ रही है। कई बलोच पुरुष वर्षों से लापता हैं। वे फौजी कार्रवाई में मारे गए या जिंदा हैं - इस बारे में स्थिति स्पष्ट नहीं है। एक बुजुर्ग बलोच, जिनका बेटा कई साल पहले लापता हो गया, कहते हैं कि 'अगर पाकिस्तानी फौज मुझसे यह कह दे कि हमने आपके बेटे को मार दिया है, तो मैं ज़िंदगीभर अपने घर की छत पर पाकिस्तान का झंडा लगाऊंगा ... बस कोई मुझे तसल्ली दिला दे कि मेरा बेटा जिंदा नहीं है।' क्या यह मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं है? क्या जरदारी को बलोचिस्तान दिखाई नहीं देता है? क्या बलोचिस्तान की ओर देखते समय चश्मा धुंधला पड़ जाता है या फौज ने उधर न देखने का हुक्म सुना रखा है? जरदारी जवाब दें। क्या पाकिस्तानी राष्ट्रपति भूल गए कि उनके देश में अहमदी समुदाय के साथ कैसा बर्ताव होता है? उनके लिए घोर अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया जाता है, जो मानवाधिकारों का स्पष्ट उल्लंघन है। हर व्यक्ति को गरिमापूर्ण ढंग से जीवन जीने का अधिकार है। इसमें आस्था के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है, लेकिन पाकिस्तान में ऐसा धड़ल्ले से हो रहा है।
पाकिस्तानियों की एक और आदत को समझना जरूरी है। इन्हें अन्य देशों में मानवाधिकारों की चिंता तो होती ही है। जब ये वहां जाते हैं तो ज्यादा से ज्यादा अधिकारों की मांग करते हैं। यूरोप में इन दिनों क्या हो रहा है? वहां पाकिस्तानी अन्य लोगों से ज्यादा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहते हैं। वे विशेष धार्मिक अधिकार चाहते हैं। यही नहीं, वे हर सरकारी दफ्तर में अपने लिए ज्यादा से ज्यादा प्रतिनिधित्व चाहते हैं। वे स्थानीय समुदाय की युवतियों से शादियां करते हैं। जबकि ये अपने देश में क्या करते हैं? वहां अल्पसंख्यकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पाबंदी लगाते हैं। उनकी नाबालिग बेटियों का अपहरण कर जबरन धर्मांतरण कराते हैं। उसके बाद बड़ी उम्र के पुरुषों के साथ उनकी शादियां कराते हैं। क्या यह मानवाधिकारों का उल्लंघन नहीं है? पाकिस्तानी विदेशों में हर छोटे-बड़े पद पर काबिज होना चाहते हैं, लेकिन अपने देश में किसी अल्पसंख्यक को प्रधानमंत्री के पद पर बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। पाकिस्तान में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सेना प्रमुख, आईएसआई प्रमुख समेत कई पद ऐसे हैं, जिन पर अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले किसी व्यक्ति को नियुक्त नहीं किया जा सकता है। वह व्यक्ति कितना ही काबिल क्यों न हो, कितना ही बड़ा देशभक्त क्यों न हो, वह अयोग्य रहेगा। उसकी वफादारी पर सवालिया निशान लगा रहेगा। वह उक्त पदों तक कभी नहीं पहुंच सकता है। अगर पाकिस्तानी राष्ट्रपति में जरा-सा भी साहस बचा हो तो एक बार इस संबंध में अपने काबिल और देशभक्त अल्पसंख्यकों के बारे में बोलकर दिखाएं। सिर्फ इतना कह दें कि 'हमारे अल्पसंख्यक भाइयों-बहनों को भी इन पदों को सुशोभित करने का अवसर मिलना चाहिए।' उसके बाद कितने दिनों तक राष्ट्रपति भवन में रह पाएंगे? रावलपिंडी से तुरंत फोन आ जाएगा कि 'जरदारी या तो माफी मांगें या अपने घर जाएं।' सब जानते हैं कि उस सूरत में जरदारी माफी मांगकर अपनी कुर्सी बचाएंगे, क्योंकि ग़ैरत का सौदा ये बहुत पहले कर चुके हैं।