कब प्राप्त होंगे ये लक्ष्य?

उत्तराखंड ने मिसाल कायम की है

इरादे मजबूत हों तो सरकारें ऐसा कर सकती हैं

उत्तराखंड ने पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। यह इस राज्य की बड़ी उपलब्धि है। इसके पीछे केंद्र और राज्य सरकार, स्थानीय प्रशासन, शिक्षकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की बड़ी भूमिका रही है। उत्तराखंड के समस्त निवासी बधाई के हकदार हैं, जिन्होंने अपने राज्य को पूर्ण साक्षर बनाने में योगदान दिया। अब अन्य राज्यों की बारी है। वे भी आगे आएं, कोशिश करें और पूर्ण साक्षर राज्य बनें। उत्तराखंड ने तो मिसाल कायम कर दी है। यह विश्वास है कि भविष्य में अन्य राज्य भी इस लक्ष्य को प्राप्त कर लेंगे। हम आज़ादी के इतने दशकों बाद 'साक्षरता' की बात कर रहे हैं! इससे यह संकेत मिलता है कि हमारी कोशिशों में कहीं न कहीं कमियां रही हैं। हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश को पूर्ण साक्षरता का लक्ष्य तो प्राप्त करना ही चाहिए। साथ ही, इससे बड़ा लक्ष्य निर्धारित कर उसकी प्राप्ति के लिए पूर्ण मनोयोग के साथ जुट जाना चाहिए। कितना अच्छा हो, अगर कोई राज्य यह कहे कि हमने बेरोजगारी पर 100 प्रतिशत विजय प्राप्त कर ली है! यह मुश्किल जरूर है, असंभव नहीं है। अगर इरादे मजबूत हों तो राज्य सरकारें ऐसा कर सकती हैं। इसके लिए व्यावसायिक शिक्षा एवं प्रशिक्षण की जरूरत है। सरकारें चाहें तो ये सुलभ करा सकती हैं। युवाओं को स्थानीय संसाधनों और संभावनाओं के आधार पर प्रशिक्षित किया जाए। ग्रामीण युवाओं को इस योग्य बनाया जाए कि उन्हें पलायन न करना पड़े। गांव में अपना घर-द्वार छोड़कर शहर में किराए के मकान में रहना, भीड़ में धक्के खाना और कठोर संघर्ष का सामना करना बहुत मुश्किल होता है। यह व्यवस्था जवानी का एक बड़ा हिस्सा निचोड़ लेती है। इसमें सुधार होना चाहिए।

पूर्ण साक्षरता की तरह पूर्ण स्वच्छता का लक्ष्य भी होना चाहिए। विदेशी पर्यटक हमारे 'सिविक सेंस' का मजाक बनाते हैं। हम उन्हें पूरी तरह गलत नहीं ठहरा सकते हैं। अगर आस-पास देखेंगे तो ऐसे कई लोग नजर आएंगे, जो अच्छे-खासे पढ़े-लिखे हैं, महंगा मोबाइल फोन रखते हैं, महंगी गाड़ियों में घूमते हैं, लेकिन वे सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता का ध्यान नहीं रखते हैं। हाल में राजस्थान के जयपुर शहर में एक बगीचा बनाया गया। वहां लोग सुबह-शाम सैर और व्यायाम आदि के लिए आने लगे। महीनेभर में ऐसे लोगों का जमघट लगने लगा, जिनका सबसे बड़ा मकसद बगीचे में गंदगी फैलाना है। वे प्लास्टिक की खाली बोतलें फेंक देते हैं। तंबाकू, गुटखा जैसे पदार्थों का सेवन करते हैं और इधर-उधर थूकते हैं। बिस्किट, चिप्स जैसी चीजें खाकर खाली पैकेट वहीं छोड़ देते हैं। अगर कोई उन्हें यह कहते हुए समझाए कि 'हमें बगीचे को स्वच्छ रखना चाहिए', तो वे झगड़ा करने लगते हैं। जवाब देते हैं, 'अकेले हम ही गंदगी फैला रहे हैं क्या? अन्य लोग भी ऐसा करते हैं। पहले उन्हें समझाकर आएं।' जब यह रवैया रहेगा तो 'स्वच्छ राजस्थान' और 'स्वच्छ भारत' का निर्माण कैसे होगा? आज हमारे देश के कई सार्वजनिक स्थानों पर कचरा फैला हुआ है। उसके लिए अंग्रेजों या किसी विदेशी आक्रांता को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते हैं। इसकी जिम्मेदारी हम सबको लेनी होगी। यह हमारा देश है। इसमें हम रहते हैं। इसे स्वच्छ बनाने के लिए कोई दूसरा नहीं आएगा। सार्वजनिक स्थानों की स्वच्छता सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। हर नागरिक को इसे स्वीकार करना होगा। हमारे देश के लोग जब जापान, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में घूमकर आते हैं तो यह कहते हुए स्वच्छता की तारीफ करते हैं- 'वहां सड़क पर एक तिनका तक नहीं था।' इन देशों में लोग इतने जागरूक हैं कि वे खुद ही कचरा नहीं फैलाते हैं। क्या हमें अपने देश को इतना स्वच्छ बनाने से कोई मना कर रहा है? हम भी ऐसा कर सकते हैं। बस, इरादा चाहिए, जागरूकता चाहिए और आगे बढ़कर जिम्मेदारी निभाने का साहस चाहिए।

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