तृणकां को एक और झटका, इस राज्यसभा सांसद ने पार्टी और उच्च सदन से दिया इस्तीफ़ा

तृणकां में नहीं रुक रही बगावत

Photo: AITCofficial FB Page

नई दिल्ली/दक्षिण भारत। तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक ने गुरुवार को उच्च सदन और पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया। उन्होंने कहा कि उन्होंने यह फ़ैसला पश्चिम बंगाल की जनता द्वारा भाजपा को दिए गए जनादेश को ध्यान में रखते हुए लिया है।

सुखेंदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव के बाद, बराइक इस हफ़्ते पार्टी छोड़ने वाले तीसरे तृणकां सांसद हैं। सूत्रों के मुताबिक, बराइक ने राज्यसभा अध्यक्ष सीपी राधाकृष्णन से मुलाकात की और अपना इस्तीफा सौंप दिया।

बाद में भाजपा नेता निशिकांत दुबे के घर के बाहर पत्रकारों से बात करते हुए बराइक ने कहा, 'पश्चिम बंगाल की जनता ने भाजपा को अपना जनादेश दिया है। तृणकां नहीं जीती। पश्चिम बंगाल की जनता के जनादेश को देखते हुए, मैं पार्टी से इस्तीफ़ा दे रहा हूं।'

पश्चिम बंगाल के सांसद ने अपने इस्तीफ़े के पत्र में लिखा, 'मैं इसके ज़रिए राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा देता हूं, जिसे कृपया तत्काल प्रभाव से स्वीकार किया जाए।'

उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान सहयोग के लिए राज्यसभा सचिवालय के चेयरमैन, डिप्टी चेयरमैन और अधिकारियों का भी धन्यवाद किया।

पश्चिम बंगाल के आदिवासी नेता बराइक, उपभोक्ता मामलों, खाद्य और सार्वजनिक वितरण पर संसदीय स्थायी समिति और आदिवासी मामलों पर सलाहकार समिति के सदस्य के तौर पर काम कर रहे थे।

तृणमूल कांग्रेस से कई लोगों के पार्टी छोड़ने के सिलसिले के बीच उनका इस्तीफ़ा आया है। सोमवार को राज्यसभा सांसद सुखेंदु शेखर रॉय ने उच्च सदन से इस्तीफ़ा दे दिया और इसके बाद पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेदों का हवाला देते हुए तृणमूल कांग्रेस छोड़ने का फ़ैसला भी घोषित कर दिया।

राज्यसभा सांसद सुष्मिता देव ने भी बुधवार को संसद और पार्टी से इस्तीफ़ा दे दिया। बाद में देव ने नई दिल्ली में असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा से मुलाक़ात की, जिससे भविष्य की राजनीतिक योजना को लेकर अटकलें तेज़ हो गईं।

बराइक के इस्तीफ़े के साथ, तृणमूल कांग्रेस ने इस हफ़्ते अपने तीन राज्यसभा सदस्य खो दिए हैं, जिससे ममता बनर्जी की अगुवाई वाली पार्टी को एक और झटका लगा है।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में हार और पार्टी के भीतर हुई बगावत के कारण तृणकां संकट का सामना कर रही है। इन घटनाओं ने पार्टी की संगठनात्मक और विधायी ताकत को काफी कमज़ोर कर दिया है।

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